माला-1062: नाम में अनन्यता कैसे प्राप्त की जा सकती है?, श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: भगवत प्राप्ति के समय आप ज्ञान मार्ग में थे या भक्ति मार्ग में?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवत प्राप्ति किसी एक मार्ग से नहीं होती — यह गुरु कृपा से होती है। जब हम भगवान का भजन करते हैं, वही भक्ति कहलाती है; भजन से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह ज्ञान कहलाता है; और भजन से जब संसार के प्रति मोह मिटता है, वही वैराग्य कहलाता है। इन तीनों का मूल सूत्र एक ही है — गुरु कृपा। महाराज जी कहते हैं कि आरंभ में वे सन्यास मार्ग पर थे, परंतु प्रथम भगवत भाव का अनुभव भक्ति मार्ग में हुआ। अंततः सब मार्ग गुरु कृपा में विलीन हो जाते हैं।


प्रश्न 2: यदि आप विश्व को एक संदेश देना चाहें, तो क्या देंगे?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “अध्यात्म के बिना जीवन शून्य है।”
बिना अध्यात्म के जीवन व्यर्थ चिंताओं, वासनाओं और भय में उलझा रहता है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन में अध्यात्म को जागृत करे, क्योंकि यही परम शांति और निश्चिंतता का स्रोत है। अध्यात्म का अर्थ है — भगवान के चरणों का आश्रय लेकर निरंतर सुमिरन करना, आत्मस्वरूप का चिंतन करना, और संयम व नियम का पालन करना। जब व्यक्ति शास्त्रों के अनुसार अपने जीवन को ढालता है, तभी सही अर्थ में उसका जीवन सार्थक बनता है।


प्रश्न 3: भक्त अपने मन के प्रश्नों और संशयों का त्याग कैसे करे?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि जब कोई सच्चा भक्त बन जाता है, तो उसके मन में संशय रह ही नहीं जाता।
भक्त वह है जो अपने हर आचरण को भगवान के अनुकूल बनाता है। जब भक्ति प्रगाढ़ हो जाती है, तो प्रश्न उठने ही बंद हो जाते हैं क्योंकि उत्तर भक्ति के अनुभव में पहले से मौजूद रहता है। संशय तभी मिटता है जब शास्त्रों का अध्ययन और संतों का संग हो। सत्संग से विवेक जागृत होता है और विवेक से मोह व भ्रम दूर होते हैं। इसलिए महाराज जी कहते हैं — “बिन सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिन सुलभ न सोई।”


प्रश्न 4: नाम में अनन्यता कैसे प्राप्त की जा सकती है?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि जैसे चंदन को घिसने से उसमें अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही जब भक्त निरंतर नाम-जप करता है, तो उसके भीतर ज्ञानाग्नि जागृत होती है।
राधा नाम या कृष्ण नाम की रगड़ से विक्षेप, मल और आवरण भस्म हो जाते हैं। आरंभ में नाम-जप से मन में जलन और बेचैनी होती है — वह पापों के नष्ट होने का ताप है। इसे सहन करना ही साधना है। महाराज जी कहते हैं — “जो नाम-जप के ताप को सहन कर गया, वही महात्मा हो गया।” इसलिए निरंतर जप करते रहें, भले कठिनाई हो, लेकिन नाम ही सब विकारों का शुद्धिकारक है।


प्रश्न 5: क्या इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त हो सकता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “आप भगवान के अंश हैं, इसलिए आपमें वही शक्ति है जो महापुरुषों में है।”
केवल शरीर को देखकर खुद को निर्बल न समझें; आत्मा पूर्ण है। जब तक भजन नहीं करेंगे, तब तक यह सत्य अनुभूत नहीं होगा। नाम-जप से पाप मिटते हैं, मन निर्मल होता है, और वही मोक्ष का द्वार खोल देता है। संत समागम करें, नाम-जप करें, और अपने आचरण को शुद्ध रखें — तो इसी जन्म में मुक्ति संभव है।


प्रश्न 6: हमें कैसे ज्ञात हो कि हमारे गुरुदेव हमसे प्रसन्न हैं या नहीं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि गुरु की प्रसन्नता का संकेत केवल एक है — भजन की उन्नति
जब साधक निरंतर नाम-जप और गुरु की आज्ञा में रहता है, तो गुरु प्रसन्न रहते हैं।
गुरु अवज्ञा का नाम ही अप्रसन्नता है।
सेवा, समर्पण और आज्ञा का पालन — यही गुरु कृपा का द्वार है।
गुरु धन या वस्त्र से नहीं, बल्कि शिष्य के आचरण और भजन से प्रसन्न होते हैं।


प्रश्न 7: ठाकुर सेवा में दिखावा या पाखंड भाव आ जाए तो क्या करें?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी सावधान करते हैं कि भक्ति में दिखावा सबसे घातक दोष है।
जब आराधना दूसरों को दिखाने के लिए की जाती है, तो वह भक्ति नहीं रहती, पाखंड बन जाती है।
भगवान के लिए किया गया हर कर्म गुप्त और निर्मल होना चाहिए।
जैसे माँ अपने बच्चे को पर्दे में दूध पिलाती है, वैसे ही साधक को भक्ति करनी चाहिए।
महाराज जी कहते हैं — “जितना गुप्त भजन होगा, उतना ही प्रकाशित होगा।”
भक्ति भगवान के लिए हो, संसार की प्रशंसा के लिए नहीं।


प्रश्न 8: मंत्र-जप, नाम-जप, भजन और सत्संग में प्रधानता किसे देनी चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि हर साधक को एक निश्चित संख्या में गुरु-मंत्र का जप करना चाहिए।
जैसे 11 या 21 माला प्रतिदिन, और शेष समय नाम-जप में बिताना चाहिए।
नाम-जप ऐसा है जो किसी भी अवस्था या स्थान पर किया जा सकता है।
“अपवित्र पवित्रवा सर्वावस्थांगतोऽपि या स्मरेत पुंडरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः।”
नाम-जप से मन, वाणी और शरीर तीनों शुद्ध हो जाते हैं।
संख्या का अनुशासन और नाम-जप की प्रीति — यही साधक की प्रगति का आधार है।


प्रश्न 9: क्या केवल नाम-जप से निकुंज-वास (भगवत धाम) की प्राप्ति हो सकती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — हाँ, निरंतर नाम-जप से ही भगवान का साक्षात्कार संभव है।
भले ही परिस्थितियाँ कठिन हों, देश-विदेश में रहें, यदि नाम-जप और शुद्ध आचरण साथ हैं, तो सब संभव है।
विभीषण लंका में रहकर भक्त बने, तो हम संसार में रहकर क्यों नहीं?
यदि हम दृढ़ रहें और भक्ति में लगें, तो वातावरण भी भक्तिमय हो जाएगा।
महाराज जी कहते हैं — “भक्ति में कठिनाई नहीं, केवल दृढ़ता चाहिए।”


प्रश्न 10: ठाकुर दर्शन के समय मन क्यों भटकता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब हम भगवान के दर्शन के लिए जाते हैं और मन अन्य बातों में लग जाता है, तो यह पाप का प्रभाव है।
पूर्व जन्मों के कर्मों का मल हमें निष्क्रिय बना देता है।
परंतु जब तक हमारे भीतर भगवान के दर्शन की लालसा है, तब तक कृपा विद्यमान है।
मन को न मानें, हठपूर्वक ठाकुर जी के सामने ठहरें।
सच्चा साधक वही है जो अपनी कमियों को देखता है, छिपाता नहीं।
मन भागे तो शरीर को रोके — यह साधना की निशानी है।


प्रश्न 11: जब नाम-जप किसी भी दशा में हो सकता है, तो पूजा में पवित्रता क्यों जरूरी है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि नाम-जप का अधिकार हर दशा में है, परंतु भगवान की पूजा और मंत्र-जप के लिए पवित्रता आवश्यक है।
शास्त्रों में नियम है कि पूजा में वस्त्र, शरीर और विचार तीनों शुद्ध हों।
नाम-जप से हम भीतर से पवित्र होते हैं, और जल से बाहरी पवित्रता आती है।
यह वैदिक अनुशासन है, और उसका पालन करना ही भक्ति का सम्मान है।
नाम-जप सर्वकालिक है, पर पूजा शास्त्रीय नियमों के अनुसार होनी चाहिए।


प्रश्न 12: जीवन की संध्या से पहले भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन कैसे हो सकता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “भगवान से रो-रो कर प्रार्थना करो।”
भगवत साक्षात्कार के लिए सबसे बड़ा साधन है आंसू और विरह की पुकार
जैसे रास में गोपियां भगवान के लिए रोईं, वैसे ही जब हृदय से पुकार होगी तो भगवान अवश्य प्रकट होंगे।
भगवान साधन नहीं, भाव देखते हैं।
नाम-जप और कृष्ण कथा से प्रेम बढ़ाओ;
जब हृदय प्रेम से भर जाएगा, तब हर दिशा में श्यामसुंदर ही दिखेंगे।


प्रश्न 13: ब्रह्मचर्य पालन करते हुए भी मन विकारग्रस्त हो जाए तो क्या करें?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि ऐसे समय में उपाय केवल एक है — नाम-जप की शक्ति बढ़ाना।
जितना नाम-जप करेंगे, उतना मन शांत होगा।
जब दवा का असर कम लगे, तो मात्रा बढ़ा दी जाती है — वैसे ही नाम-जप की मात्रा बढ़ाओ।
मन को पाप की दिशा में सहयोग न दो — गंदी बातें देखना, सुनना या सोचने से बचो।
नाम ही वह पहरा है जो काम, क्रोध, लोभ, मोह को भीतर प्रवेश नहीं करने देता।
धीरे-धीरे नाम की अग्नि सब विकारों को जला देगी, और मन निर्मल हो जाएगा।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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