माला-1060: गुरु-कृपा का वास्तविक अर्थ क्या है?, श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, यदि हम अपनी बीमारी को राधा रानी की कृपा मानें, तो क्या यह सही है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं कि बीमारी स्वयं कृपा नहीं है, बल्कि उस बीमारी के बीच भी भक्ति और नाम-स्मरण में टिके रहना ही कृपा का वास्तविक स्वरूप है। रोग हमारे पिछले कर्मों का परिणाम है, लेकिन जब भक्त उस पीड़ा के समय भी प्रभु का स्मरण बनाए रखता है, तो वही ईश्वर की कृपा कहलाती है। जो व्यक्ति विपत्ति में भी शांत रहता है और भजन से विचलित नहीं होता, वही कृपा का पात्र बनता है। शरीर सुखी या दुखी हो सकता है, लेकिन यदि नाम जप चलता रहे, तो वही सच्चा सौभाग्य है। महाराज जी कहते हैं — “कृपा का प्रमाण यह नहीं कि जीवन में दुख न आए, बल्कि यह है कि दुख में भी मन भगवान से न हटे।”


प्रश्न 2: महाराज जी, राधा वल्लभ लाल जी के दर्शन किस क्रम से करने चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि प्रभु-दर्शन में भावना ही प्रधान है। भक्त का भाव ही निर्धारित करता है कि उसकी दृष्टि कहाँ जाएगी। दास्य भाव वाला भक्त चरणों से दर्शन प्रारंभ करता है, जबकि प्रेम-भाव वाला भक्त नेत्रों में नेत्र मिलाकर प्रभु की छवि में लीन हो जाता है। जब तक मन मंत्र और नाम में स्थिर नहीं होता, तब तक केवल मूर्ति दिखाई देती है। लेकिन जब नाम-जप के साथ दृष्टि शुद्ध होती है, तब वही मूर्ति जीवंत हो जाती है। श्री राधा वल्लभ लाल जी कोई साधारण मूर्ति नहीं, वे स्वयंभू हैं — कृपा से प्रकट प्रभु। इसलिए दर्शन का कोई स्थिर नियम नहीं, भाव के अनुसार ही साक्षात्कार होता है।


प्रश्न 3: भगवान कहते हैं कि सब कुछ मुझमें है, पर मैं उनमें नहीं हूँ — इसका क्या अर्थ है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यह श्लोक गहन रहस्य रखता है। भगवान सर्वव्यापक हैं, वे पंचभूतों, मन, इंद्रियों, आत्मा — सबमें विराजमान हैं। लेकिन वे किसी में “प्रवेश” नहीं करते क्योंकि वे स्वयं सबका आधार हैं। प्रवेश तो वहीं संभव है जहाँ कोई रिक्त स्थान हो, पर जहाँ सब कुछ वही हैं, वहाँ प्रवेश का प्रश्न नहीं उठता। यह बात केवल तर्क से नहीं, साधना और अनुभव से समझी जा सकती है। जैसे हलवा बनाने की विधि जानने से स्वाद नहीं मिलता, उसे बनाकर खाना पड़ता है। वैसे ही भजन और नाम-जप से ही यह अनुभूति होती है कि “भगवान ही सब हैं।” जब दृष्टि पवित्र होती है, तब हर वस्तु में वासुदेव का ही दर्शन होता है।


प्रश्न 4: महाराज जी, यदि नाम-जप करते समय डर लगे कि कहीं मैं भक्ति से दूर न हो जाऊँ, तो क्या यह सही भावना है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह डर बहुत शुभ है। यह भय नहीं, बल्कि “भक्ति की सजगता” है। जो व्यक्ति हर समय इस चिंता में रहता है कि कहीं मेरा नाम-जप छूट न जाए, वही सच्चा साधक है। यह डर हमें पाप, आलस्य और विकारों से बचाता है। जब यह भावना आती है कि “गुरुदेव देख रहे हैं, भगवान सुन रहे हैं,” तो हम अपने कर्मों में सावधान हो जाते हैं। इस तरह का डर भक्त को पतन से बचाता है और उन्नति की ओर ले जाता है। महाराज जी कहते हैं — “अगर डर भगवान का है, तो वही सुरक्षा कवच है; और अगर डर संसार का है, तो वही बंधन है।”


प्रश्न 5: महाराज जी, गुरु-कृपा का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि गुरु की कृपा किसी बाहरी चमत्कार का नाम नहीं है। जब गुरु के मुख से निकला हुआ नाम-मंत्र हमारे हृदय में बस जाता है, वही गुरु की कृपा है। गुरुदेव की वाणी ही अमृत है, और जो उस वाणी पर चलता है, वह सदैव उनके संरक्षण में रहता है। “मंत्र मूलं गुरु वाक्यम” — गुरु का दिया हुआ नाम ही उनका जीवन और कृपा है। जब हम उस नाम में लीन रहते हैं, तो गुरु हमारे हृदय में स्थापित हो जाते हैं। मोक्ष और भक्ति — दोनों का द्वार गुरु की कृपा से ही खुलता है।


प्रश्न 6: अहंकार और भौतिक सुखों से मुक्त होने का उपाय क्या है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मन और इंद्रियों का संयम ही अहंकार से मुक्ति का मार्ग है। वाणी को नियंत्रित करो, व्यर्थ और असत बोलना छोड़ो। कानों से निंदा और प्रपंच न सुनो। नेत्रों को असभ्य दृश्यों से दूर रखो। जब हमारे इंद्रिय-द्वार पवित्र होते हैं, तब मन शांत होता है और अहंकार स्वतः मिटने लगता है। संत-संग, शास्त्र-पाठ और नाम-जप से भीतर की पवित्रता जागती है। धीरे-धीरे भोग की इच्छा स्वयं समाप्त हो जाती है। महाराज जी कहते हैं — “संयम से चलो, सिद्धांत से डरो — तभी आनंद का अनुभव होगा।”


प्रश्न 7: महाराज जी, मैं सांस के साथ राधा नाम जपने का अभ्यास कर रही हूँ, लेकिन अनुभव नहीं हो रहा। क्या यह सही तरीका है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि नाम-जप का फल धीरे-धीरे प्रकट होता है। इसे अनुभव बनने में समय लगता है। दीर्घकाल तक श्रद्धा और निरंतरता से जप करते रहो, क्योंकि नाम पहले पापों को नष्ट करता है, फिर हृदय को शुद्ध बनाता है। जब तक पापों का बोझ भारी है, अनुभव नहीं हो पाता। इसलिए निरंतर अभ्यास और संत-संग आवश्यक है। संतों के संग से भजन में नवीन उत्साह आता है। महाराज जी कहते हैं — “सात दीर्घ काल निरंतर सत्कार सेवितो दृढ़ भूमि” — यानी लंबे समय तक भक्ति करो, तभी अनुभव की भूमि दृढ़ होगी।


प्रश्न 8: महाराज जी, जब मेहनत और सफलता के मार्ग पर बढ़ते हैं, तो आलोचना और ईर्ष्या बढ़ जाती है। मन को कैसे स्थिर रखें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जो दूसरों की राय पर जीता है, वह कभी शांति नहीं पा सकता। लोग तो भगवान को भी नहीं छोड़ते, तो हमें क्या उम्मीद करनी चाहिए? उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा — एक घोड़े वाला चाहे जिस तरह चले, लोग हर हाल में कुछ न कुछ कहेंगे। इसलिए दूसरों की बातों में उलझने के बजाय अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहो। जब तक मन सबको प्रसन्न करने में लगा रहेगा, तब तक भक्ति में स्थिरता नहीं आएगी। “लोगों का काम कहना है, साधक का काम जपना है।” यही सूत्र मन में रखो।


प्रश्न 9: महाराज जी, ओवरथिंकिंग और मानसिक चिंता से कैसे निकला जाए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह सब मन की अस्थिरता का परिणाम है। जब मन राधा नाम में नहीं लगता, तो वह व्यर्थ चिंतन में फँस जाता है। उपाय यही है — तुरंत नाम-जप में लग जाओ। जैसे ही नकारात्मक विचार आएं, ज़ोर से “राधा राधा” जपो। साथ ही शरीर को भी सेवा में लगाओ — माता-पिता की सेवा, गौ सेवा, मंदिर की सेवा। यह सब कर्म मन को शुद्ध करते हैं। महाराज जी कहते हैं — “जितना मन भटके, उतनी बार नाम लो।” धीरे-धीरे यह जप ही औषधि बनकर चिंता को मिटा देता है।


प्रश्न 10: महाराज जी, हमने अतीत में कुछ गलतियाँ की हैं, उन्हें कैसे सुधारा जाए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान का नाम सभी पापों को मिटाने में समर्थ है। गलती हो गई, तो अब उसे दोहराओ मत। सच्चे हृदय से नाम लो, और संकल्प करो — “अब यह दुबारा नहीं होगा।” भगवान कहते हैं — “अहम् त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि।” यानी, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा। काउंटर या माला, कुछ भी माध्यम हो — नाम जप निरंतर करो। नाम जप ही वह शुद्ध अग्नि है जो सारे पापों को भस्म कर देती है।


प्रश्न 11: महाराज जी, माला से नाम-जप श्रेष्ठ है या काउंटर से?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि माला या काउंटर नहीं, जप करने वाला मन और जिह्वा ही फल देते हैं। माला साधन है, साध्य नहीं। काउंटर आधुनिक साधन है — वह संख्या बताता है, जप नहीं करता। जो व्यक्ति प्रेम से “राधा राधा” बोलता है, उसका कल्याण निश्चित है। यदि काउंटर से जप करना सुविधा देता है, तो करो — भगवान नाम में प्रसन्न होते हैं, न कि साधन में। महापुरुषों ने कहा — “माला फेरत जुग गया, फिरा न मन का फेर।” इसलिए साधन कोई भी हो, मन से जप सच्चा हो तो वही मुक्ति देता है।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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