माला-1059: राधा रानी को ‘प्रेम स्वरूपा’ क्यों कहा जाता है?, श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1:

क्या बोलकर नाम जपने से वही लाभ मिलता है जो मौन रहकर जपने से मिलता है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि नाम-जप के तीन रूप होते हैं — वाचिक, उपांश और मानसिक। जब हम आवाज़ में नाम लेते हैं, उसे वाचिक जप कहा जाता है। जब केवल होंठ हिलते हैं लेकिन आवाज़ नहीं निकलती, उसे उपांश जप कहते हैं, और जब नाम भीतर मन में चलता है, वह मानसिक जप कहलाता है। इन तीनों की अपनी महिमा है। मानसिक जप सर्वोच्च माना गया है, परंतु वह सिद्ध पुरुषों का कार्य है। साधक को पहले वाचिक जप से शुरुआत करनी चाहिए ताकि मन एकाग्र हो सके। जैसे-जैसे मन स्थिर होता है, जप उपांश और फिर मानसिक रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए महाराज जी कहते हैं — “गुणा-गणना में मत फँसो, बस निरंतर जप करते रहो। जहां मन नहीं टिके, वहां आवाज़ में नाम लो — ‘राधे राधे’ — यही सर्वोत्तम साधना है।”


प्रश्न 2:

महाराज जी, यदि किसी व्यक्ति की आय गलत या मिश्रित स्रोतों से आती हो, तो उसे शुद्ध कैसे किया जाए?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि धन तभी पवित्र होता है जब उसका उपयोग भक्ति और सेवा में किया जाए। यदि आय में कोई मिश्रण या व्यावसायिक जटिलता है, तो उसका कुछ अंश सदुपयोग के लिए निकालना चाहिए — जैसे गौशाला, संत सेवा, गरीबों के इलाज, या यात्रियों की सहायता में। ऐसा करने से धन में शुद्धता आती है और वह धन “धन्य” बन जाता है। महाराज जी आगे कहते हैं कि सेवा गुप्त रूप से करनी चाहिए, नाम या यश की चाह नहीं रखनी चाहिए। यदि आप चाहते हैं कि आपका पुण्य अक्षुण्ण रहे, तो ऐसा दान करें जिसमें आपका नाम तक न लिया जाए। जब यह भाव आता है कि “जो मेरा है, वह भी प्रभु का ही है,” तब अहंकार मिटता है और धन सच्चे अर्थों में पवित्र हो जाता है।


प्रश्न 3:

महाराज जी, तर्क-वितर्क में हम सही और गलत में उलझ जाते हैं। इससे कैसे निकला जाए?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि जहाँ तर्क बढ़ जाता है, वहाँ श्रद्धा घट जाती है। बुद्धि का कार्य प्रश्न करना है, परंतु हृदय का कार्य विश्वास रखना है। इसलिए जीवन में श्रद्धा अनिवार्य है। गुरु, संत और शास्त्रों के वचन तर्क का नहीं, श्रद्धा का विषय हैं। जब हम हर बात को तर्क से तौलते हैं, तो मन उलझ जाता है और शांति खो देता है। श्रद्धा वह कुंजी है जो ज्ञान का द्वार खोलती है। यदि किसी संत की बात अभी समझ में न आए, तो भी उसे नकारना नहीं चाहिए — समय आने पर वही सत्य स्पष्ट होता है। इसीलिए महाराज जी कहते हैं — “श्रद्धा रखो, तर्क नहीं। श्रद्धा से ही ज्ञान की रोशनी मिलती है।”


प्रश्न 4:

महाराज जी, भगवान की मूर्ति को साक्षात जीवित रूप में कैसे देखा जा सकता है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं कि भगवान मूर्ति में उतने ही जीवित हैं जितनी जीवंत हमारी भावना है। यदि हम उन्हें केवल पत्थर मानते हैं, तो वे पत्थर ही दिखाई देंगे। परंतु अगर हम उन्हें साक्षात श्रीजी स्वरूप मानते हैं, तो वे हमारी आँखों से बात करेंगे। भावना ही साक्षात्कार का माध्यम है। संतों की तरह जब हमारा मन पूर्ण विश्वास से भर जाता है, तब भगवान मूर्ति से भी बोलते हैं, मुस्कराते हैं, और अपने भक्त को उत्तर देते हैं। महाराज जी कहते हैं — “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तैसी।” यानी भगवान हमारी भावना के अनुसार प्रकट होते हैं। इसलिए मूर्ति पूजा पत्थर की नहीं, भावना की पूजा है।


प्रश्न 5:

महाराज जी, गीता के अनुसार “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्…” जैसे गुण कब प्राप्त होते हैं?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी बताते हैं कि ये दिव्य गुण तब उत्पन्न होते हैं जब व्यक्ति का मन शुद्ध हो जाता है। शुद्धि तीन साधनों से आती है — सत्संग, शास्त्र स्वाध्याय और निरंतर नाम-जप। जब भोजन, विचार और इंद्रियां पवित्र हो जाती हैं, तब मन में करुणा, समता और अहंकार-रहित भाव आता है। ऐसा व्यक्ति किसी से द्वेष नहीं रखता, सबमें भगवान को देखता है। सुख-दुख में समान रहता है और सबका मित्र बन जाता है। यह अवस्था अचानक नहीं आती — यह दीर्घ साधना और भगवत कृपा का परिणाम है। महाराज जी कहते हैं — “जब मन भगवान के नाम में स्थिर हो जाता है, तब द्वेष, ममता और अहंकार सब मिट जाते हैं।”


प्रश्न 6:

महाराज जी, राधा रानी को ‘प्रेम स्वरूपा’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि राधा रानी प्रेम की मूर्तिमान शक्ति हैं। श्रीकृष्ण के हृदय का जो प्रेम है, वही जब रूप धारण करता है तो राधा बन जाता है। वे प्रेम का सागर हैं — सांद्रानंद घन रस रूपा। भगवान स्वयं राधा रूप में अपने ही प्रेम का अनुभव करते हैं। इसीलिए कृष्ण और राधा अलग नहीं, एक ही चेतना के दो रूप हैं। राधा बिना कृष्ण अधूरा है और कृष्ण बिना राधा अपूर्ण। महाराज जी कहते हैं — “प्रेम का रस राधा हैं और उस रस का रसास्वादन करने वाले स्वयं कृष्ण हैं।” राधा का चरण-स्पर्श ही वह द्वार है जिससे कृष्ण-प्रेम तक पहुंचा जा सकता है।


प्रश्न 7:

महाराज जी, भगवान परीक्षा लेते हैं या यह सब प्रारब्ध का परिणाम है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सामान्य भक्तों के जीवन में जो विपत्तियाँ आती हैं, वे प्रारब्ध का फल हैं। भगवान छोटे भक्तों की परीक्षा नहीं लेते। परीक्षा तो उन्हीं की होती है जिन्होंने उच्च अवस्था प्राप्त कर ली है, जैसे गुरु अर्जुन देव, हरिदास ठाकुर आदि। भगवान उन पर कष्ट देकर उन्हें और ऊँचा उठाते हैं। साधारण मनुष्य के लिए विपत्ति केवल पिछले कर्मों का परिणाम है। भजन ही वह शक्ति है जो ऐसे समय में मन को अडिग रखती है। महाराज जी कहते हैं — “दुख आए तो टूटो मत, नाम जप करते रहो। भगवान परीक्षा नहीं, कृपा कर रहे हैं ताकि तुम्हारा आत्मबल बढ़े।”


प्रश्न 8:

महाराज जी, पुण्य कर्म (दान, मंदिर निर्माण आदि) और नाम-जप में क्या अंतर है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज स्पष्ट कहते हैं — पुण्य से स्वर्ग मिलता है, पर भगवान नहीं मिलते। मंदिर बनवाना, गौशाला खोलना या दान देना शुभ कर्म हैं, पर वे केवल सांसारिक फल देते हैं। नाम-जप वह साधना है जो जन्म-मरण के चक्र को तोड़ती है। जो व्यक्ति नाम-जप करता है, उसका पाप भी नष्ट होता है और पुण्य का अहंकार भी मिट जाता है। यही मुक्ति का मार्ग है। महाराज जी कहते हैं — “पुण्य से सुख मिलता है, पर भजन से भगवान मिलते हैं।” इसलिए मंदिर भी बनाओ, दान भी दो, पर नाम-जप को जीवन का केंद्र बनाओ — क्योंकि केवल नाम ही कलियुग का आधार है।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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