प्रश्न 1: काशी और वृंदावन की आपकी आध्यात्मिक अनुभूति में क्या अंतर है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि काशी ज्ञान का केंद्र है, जबकि वृंदावन प्रेम का स्रोत। काशी में आत्मा को ज्ञान रूपी भोजन मिलता है, परंतु वृंदावन में प्रेम की प्यास बुझती है। वहां की अनुभूति इतनी मधुर है कि जितना प्रेम का अमृत पिया जाए, उतनी ही प्यास बढ़ती जाती है। महाराज जी कहते हैं— ज्ञान से तृप्ति होती है, पर प्रेम से प्यास कभी नहीं मिटती; वह अनंत की ओर ले जाती है।
प्रश्न 2: महाराज जी, आप स्वयं अंतर्यामी हैं। मेरे मन का मनोरथ क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि हमें लौकिक या सांसारिक मनोरथों की नहीं, केवल भगवत स्मरण की अभिलाषा रखनी चाहिए। वे समझाते हैं कि जो निरंतर भगवान का स्मरण करता है, वही जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होता है। उनका संदेश स्पष्ट है— भगवत प्राप्ति का मनोरथ मत रखो, भगवत स्मरण का रखो; स्मरण ही सभी मनोरथों की पूर्णता है।
प्रश्न 3: किसी प्रतिकूलता में शरीर पर ध्यान चला जाता है, इसे कैसे संभालें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि कठिन समय में हमारा ध्यान प्रभु पर होना चाहिए, न कि शरीर पर। जब हम नाम-जप में लीन रहते हैं, तब पीड़ा का अनुभव कम हो जाता है। वे बताते हैं कि शरीर तो विनाशी है, उसे अपने कर्मों का फल भोगना ही है। इसलिए हर परिस्थिति में प्रभु का नाम जपते रहो — वही आंतरिक शांति और आनंद का सबसे बड़ा साधन है।
प्रश्न 4: करुणा और क्षमा की क्या भूमिका है?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि करुणा से ही क्षमा उत्पन्न होती है। जहां करुणा है, वहां क्रोध का स्थान नहीं। जब हृदय किसी के अज्ञान पर दया से भर जाता है, तब स्वाभाविक रूप से क्षमा उत्पन्न होती है। इसलिए जो व्यक्ति करुणामय बनता है, वह किसी से द्वेष नहीं रखता। श्री जी स्वयं करुणा के समुद्र हैं— वे अपने भक्तों के प्रत्येक दोष को प्रेम से ढक लेती हैं।
प्रश्न 5: श्रद्धा और विश्वास दृढ़ कैसे हो?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि विश्वास बहुत गुप्त चीज़ है, इसे कभी प्रकट नहीं करना चाहिए। यदि हम कहें कि हमारा विश्वास अटल है, तो माया उसकी परीक्षा ले लेती है। सच्ची श्रद्धा भीतर छिपी रहती है — वह दिखावे से नहीं, अनुभव से बढ़ती है। इसलिए गुरु और भगवान पर विश्वास रखो, पर उसे अपने भीतर गुप्त रूप से पुष्ट करो।
प्रश्न 6: साधक में जिद्दी स्वभाव या दृढ़ता कैसे आए?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि दृढ़ता तब आती है जब हृदय में भगवत प्राप्ति की सच्ची चाह जागती है। भोग-विलास में रत मन भगवान के प्रति दृढ़ नहीं हो सकता। जब नाम-जप, सत्संग और वैष्णव संग से अंतःकरण निर्मल होता है, तब भक्ति की लालसा बढ़ती है। वही लालसा दृढ़ता बनकर साधक को स्थिर करती है। नाम-जप इसका मूल साधन है।
प्रश्न 7: आश्रय का सच्चा स्वरूप क्या है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि सच्चा आश्रय वही है जब तन, मन और वाणी तीनों भगवान को समर्पित हों। शरीर से कर्म श्रीकृष्ण को अर्पित हों, मन निरंतर उनके चरणों में टिका हो, और वाणी से केवल भगवत चर्चा निकले। जब यह त्रिवेणी एक हो जाती है, तब आत्मा अनुभव करती है— “अब मैं भगवत आश्रित हूँ।”
प्रश्न 8: गुरु तत्व का स्वरूप क्या एक ही होता है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं— गुरु रूप अनेक हैं, पर तत्व एक ही है। सद्गुरु वही हैं जो अज्ञान के अंधकार को मिटाते हैं। वे बताते हैं कि श्रीकृष्ण ही गुरु रूप में अवतरित होकर जीवों को मोह से मुक्त करते हैं। इसलिए गुरु, हरि और ब्रह्म— ये तीनों एक ही परम तत्व के भिन्न रूप हैं।
प्रश्न 9: भूख न लगना और उदासी — क्या यह बीमारी है या आध्यात्मिक स्थिति?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यदि शरीर की कोई गड़बड़ी है तो वह शारीरिक कारण है, पर यदि संसार से अरुचि और प्रभु में लगाव बढ़ रहा है तो वह प्रेम का लक्षण है। जब मन केवल भगवान में रस लेने लगे और अन्य सब चीजें फीकी लगें, तो समझो— प्रेम का अंकुर फूट चुका है।
प्रश्न 10: दिव्य दृष्टि कैसे मिलती है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं— नाम में ही दिव्य दृष्टि है। नाम जप करते-करते जब पाप और वासनाएँ दूर होती हैं, तब हमारे मानस नेत्र खुलते हैं। इन्हीं नेत्रों से हम भगवान की झांकी देखते हैं। वे कहते हैं कि जैसे वाल्मीकि ने “मरा मरा” जपते-जपते राम का दर्शन पाया, वैसे ही नाम-जप ही सबसे बड़ा दिव्य ज्ञान है।
प्रश्न 11: अकेले रहने की सीमा क्या है?
उत्तर
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि अकेलापन सिर्फ स्थान का नहीं, भाव का मामला है। मनुष्य जब भी कहता है कि वह “अकेला” है, तो वास्तव में वह प्रभु से कटा हुआ महसूस कर रहा होता है। जिस क्षण मन में प्रभु का स्मरण उठता है, उसी क्षण अकेलापन समाप्त हो जाता है।
महाराज जी कहते हैं — “जब तक हम लोगों में केवल ‘व्यक्ति’ देखते हैं, तब तक हम अकेले रहते हैं; लेकिन जब हम हर व्यक्ति में भगवान को देखने लगते हैं, तब संसार हमारा परिवार बन जाता है।”
वास्तविक एकांत वह है जहाँ भीड़ के बीच भी मन शांत रहे, क्योंकि वह हर आवाज़ में भगवान की ध्वनि सुन रहा हो। सच्चा एकांत जंगल या कक्ष में नहीं, बल्कि विचारों के शोर से मुक्त हृदय में होता है।
महाराज जी उदाहरण देते हैं — “जब हम किसी से बात करते हैं, तो समझो कि हम प्रभु से ही बात कर रहे हैं। जब कोई हमसे हंस कर बोलता है, तो वह प्रभु का ही मुस्कुराता चेहरा है। जब कोई कठोर कहता है, तो वह प्रभु की परीक्षा है।” इस भाव से देखो तो हर मिलन भी भक्ति है और हर विरह भी साधना है।
इसलिए वे कहते हैं —
“एकांत का अर्थ यह नहीं कि लोगों से कट जाओ, बल्कि यह कि भीतर से सब में प्रभु को देख पाओ।”
जब यह स्थिति आती है तो भक्त कहीं भी हो — घर में, कार्यालय में, मंदिर में या भीड़ में — उसका हृदय निरंतर प्रेमानंद में डूबा रहता है।
प्रश्न 12: श्री जी के मिलन की विकलता जल्दी शांत क्यों हो जाती है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि प्रेम की विकलता को कभी प्रकट नहीं करना चाहिए। उसे हृदय में गुप्त रखो, जैसे बीज मिट्टी में छिपा होता है। जब वह भीतर पकता है, तभी प्रेम की बेल बढ़ती है। यदि उसे दिखावा बनाओगे, तो वह सूख जाएगी। भजन में गुप्त भाव ही सबसे गहन भक्ति को जन्म देता है।
प्रश्न 13: भजन करते समय गलत विचार आते हैं, तो क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब भजन करते समय गंदे विचार आते हैं, तो वे नए नहीं होते— वो मन में छिपी वासनाएँ हैं जो अब निकल रही हैं। उन्हें देखकर दुखी न हो, बल्कि प्रसन्न हो जाओ कि मन का कूड़ा साफ़ हो रहा है। निरंतर नाम-जप करते रहो, यही झाड़ू है जो अंतःकरण को निर्मल करता है।
प्रश्न 14: क्या बच्चों को डांटना या मारना उचित है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि बच्चों को मारना कभी उचित नहीं, पर अनुशासन आवश्यक है। कभी प्रेम से, कभी गंभीरता से समझाना चाहिए। भय नहीं, सम्मानजनक अनुशासन होना चाहिए। बच्चों को धर्म, ब्रह्मचर्य और संयम के संस्कार देने चाहिए ताकि वे जीवन में ऊँचाइयों तक पहुँचें।
प्रश्न 15: मन निराश रहता है, असफलता मिलती है — क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं— “निराशा मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है।” वे बताते हैं कि हमें अपनी हार को ही साधना बनाना चाहिए। बार-बार गिरो, पर फिर उठो। जब हम हर बार भगवान का नाम लेकर संघर्ष करते हैं, तो एक दिन विजय निश्चित है। नाम-जप से ही भीतर की ऊर्जा और स्थिरता मिलती है।
प्रश्न 16: क्या गृहस्थ जीवन में रहते हुए ईश्वर की प्राप्ति संभव है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं— “गृहस्थ भी भगवान को पा सकता है, बस जीवन पवित्र होना चाहिए।” धर्मपूर्वक कमाया हुआ धन, शुद्ध भोजन और निरंतर नाम-जप — यही साधन हैं। वे बताते हैं कि विरक्त जगत का कल्याण करता है, और गृहस्थ अपने परिवार का। दोनों ही मार्ग ईश्वर की ओर ले जाते हैं यदि जीवन में संयम और नाम-स्मरण है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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