प्रश्न 1: जब कोई व्यक्ति हम पर गुस्सा करता है या अपशब्द कहता है तो क्या वह हमारा ही कर्म है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि संसार में जो कुछ हमारे साथ घटता है, वह सब हमारे पूर्वजन्मों के कर्मों का फल होता है। कोई व्यक्ति जब हमें अपमानित करता है या गुस्सा करता है, तो वास्तव में वह हमारी ही कर्म-संस्कृति का परिणाम है। हमारे पाप उसी व्यक्ति की बुद्धि में प्रवेश करके हमें दंड दिलवाते हैं। यह समझने की दृष्टि विकसित हो तो हम शिकायत नहीं करेंगे, बल्कि मौन होकर उस स्थिति को स्वीकार करेंगे।
भगवान कभी अन्याय नहीं करते। हर घटना कर्म के अनुसार होती है। इसलिए यदि हम सहन कर लें, तो कर्म का शोधन हो जाता है और नया पाप नहीं बनता। लेकिन जब हम प्रतिकार करते हैं, तब नया कर्म बंध जाता है। महाराज जी कहते हैं — “सहन करना कठिन है, पर वही मुक्ति का द्वार है।”
प्रश्न 2: क्या केवल भौतिक कर्मों को श्रीजी को समर्पित कर देने से भगवत प्राप्ति संभव है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि केवल कर्म समर्पण से नहीं, बल्कि नाम-स्मरण सहित कर्म समर्पण से भगवत-प्राप्ति होती है। यदि कर्म करते हुए मन में भगवान का स्मरण नहीं है, तो वह संसारिक कर्म ही रह जाता है।
“मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है,” — जब मन विषयों का चिंतन करता है तो बंधन होता है, और जब भगवत चिंतन करता है तो मोक्ष। इसलिए हर कर्म से पहले, दौरान और बाद में भगवान को याद करें।
कर्म करें, पर स्मरण के साथ करें। यही कर्म-योग का सार है। नाम-जप ही वह शक्ति है जो कर्म को पूजा में बदल देता है।
प्रश्न 3: नाम-जप से चिदानंद तत्व का ज्ञान कैसे होता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि नाम-जप में अपार शक्ति है। जो व्यक्ति नाम का जप करता है, उसे ज्ञान, प्रेम और चिदानंद स्वतः प्राप्त होता है।
वह कहते हैं — “जो ‘राम राम’ नहीं बोल पाता था, उसने ‘मरा मरा’ कहा और इतिहास रच दिया।”
नाम जप से अज्ञान मिटता है, और भीतर का प्रकाश प्रकट होता है। चाहे किसी को शास्त्र न आते हों, पर यदि वह भावपूर्वक नाम जप करता है, तो वही उसके लिए वेद का सार बन जाता है।
संस्कृत न जानने पर भी भाव जानना ही काफी है। नाम ही सच्चा शास्त्र है। इसलिए महाराज जी कहते हैं — “डट कर भजन करो, हट कर संसार से अलग होकर नाम जप करो।”
प्रश्न 4: ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति अपना ही नुकसान क्यों करता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं कि ईर्ष्या मनुष्य का आंतरिक विष है। जो ईर्ष्या करता है, वह किसी और का नहीं, अपने ही सुख का नाश करता है।
ईर्ष्या का परिणाम पतन है। “कंचन और तिया का नेह सहज है, पर मान-बढ़ाई और ईर्ष्या को छोड़ना दुर्लभ है।”
ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों का सुख देखकर स्वयं दुखी रहता है। इसलिए महाराज जी उपदेश देते हैं कि नाम-जप के साथ दूसरों के मंगल की कामना करो। जब हम ईर्ष्या को क्षमा में बदल देते हैं, तब मन निर्मल हो जाता है।
प्रश्न 5: मंदिर निर्माण के समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराजजी कहते हैं — “मंदिर बनाना सहज है, पर उसकी नित्य पूजा की व्यवस्था करना कठिन।”
भगवान को केवल ईंटों के घर में नहीं, नियमित भोग, आरती और सेवा में वास मिलता है।
यदि प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मंदिर उपेक्षित रह जाए, तो वह पुण्य नहीं, अपराध बन जाता है।
इसलिए मंदिर बनाते समय उसकी आर्थिक व्यवस्था, पुजारी और भोग की निरंतरता सुनिश्चित करनी चाहिए। तभी वह स्थान जीवंत रहेगा और भक्तों के लिए कल्याणकारी होगा।
प्रश्न 6: क्या गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी भक्ति संभव है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं कि भगवान ने अर्जुन को भी गृहस्थ रहते हुए युद्ध करने को कहा।
इसका अर्थ है कि हम जहाँ भी हों, अपने कर्तव्य को करते हुए नाम-स्मरण करें।
“मा मुनिश्मर युद्ध च” — भगवान का यही उपदेश है।
यदि ऑफिस या व्यापार में मन पूरी तरह लगा है, तो काम पूरा होने पर उस समय को भगवान को समर्पित कर दो।
यह भी भक्ति है। धीरे-धीरे अभ्यास से ऐसा संभव है कि मन काम करता रहे, पर भीतर नाम चलता रहे।
जैसे ड्राइवर बात भी करता है, पर ध्यान सड़क पर रखता है — वैसे ही हमें भगवान पर एकाग्र रहना है।
प्रश्न 7: सेवा और सुमिरन में क्या अंतर है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं — “सेवा से तन की शुद्धता होती है, और सुमिरन से मन की।”
शरीर के माध्यम से पाप कर्म होते हैं, इसलिए सेवा से शरीर निष्पाप बनता है। जब तन पवित्र होता है, तो मन स्थिर होने लगता है।
मन पवित्र होने पर चित्त भगवान में रम जाता है, और तब आत्मा का अनुभव होता है।
जिसका मन और तन पवित्र हो जाए, वह जहाँ भी चलता है, वहाँ तीर्थत्व प्रकट करता है।
इसलिए महाराज जी का स्पष्ट संदेश है — “सेवा करो, सुमिरन करो, तन और मन दोनों को भगवान का माध्यम बनाओ।”
प्रश्न 8: जीवन में कठिनाइयों और अकेलेपन में कैसे टिके रहें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं कि भगवान का आश्रय ही सबसे बड़ा बल है।
उन्होंने अपने जीवन में असंख्य कष्ट सहे, पर भगवान के नाम और चरणों के बल से कभी नहीं टूटे।
जो व्यक्ति भगवत-आश्रय में है, उसके लिए विपत्ति भी वरदान बन जाती है।
महाराज जी कहते हैं — “सुख से डर लगता है, क्योंकि वह मोह लाता है। पर दुख भगवान के निकट लाता है।”
इसलिए नाम-जप ही जीवन की ढाल है। जब मन टूटे, तब राधे-नाम की डोर पकड़ लो।
वही तुम्हें सहारा देगा, वही तुम्हारा सच्चा साथी है।
प्रश्न 9: यदि पूर्ण गुरु न मिले तो क्या भगवान को गुरु माना जा सकता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं — “गुरु को व्यक्ति नहीं, परब्रह्म मानो।”
यदि कोई पूर्ण गुरु न मिले, तो भगवान को गुरु मानो, और श्रद्धा से नाम-जप करो।
गुरु साक्षात परब्रह्म हैं — “गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वर।”
सच्चा गुरु वही है जो अपने में भगवान को प्रकट करता है। जब तक ऐसा भाव न हो, तब तक “वंदे कृष्णं जगतगुरुम्” का स्मरण करते हुए भगवान को ही गुरु मानो।
प्रश्न 10: क्या भाग्य जीवन को नियंत्रित करता है या पुरुषार्थ?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी महाराज जी कहते हैं कि जब तक प्रयास आध्यात्मिक नहीं होता, तब तक भाग्य ही नियंत्रक है।
लेकिन जब साधक का प्रयास भजन, तप, व्रत और नाम-जप में होता है, तब वह नया भाग्य रच सकता है।
भौतिक प्रयत्नों की सफलता या असफलता पूर्वकर्म पर निर्भर होती है, पर आध्यात्मिक पुरुषार्थ हमें भाग्य से ऊपर उठाता है।
कर्म से ही भाग्य बनता है, और भगवत-कर्म से मुक्ति।
माला गिनना केवल साधन है, पर नाम का निरंतर प्रवाह ही सिद्धि है।
प्रश्न 11: क्या वृंदावन-वास केवल भौगोलिक वास है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं कि वृंदावन केवल एक स्थान नहीं, भगवान की गोद है।
सारा ब्रजमंडल — 84 कोस — भगवान का शरीर है।
जहाँ भी भगवत-स्मरण और प्रेम का वास है, वहीं वृंदावन है।
उन्होंने बताया कि तीन वृंदावन हैं —
- गोष्ठ वृंदावन (नंदगांव, गोकुल)
- गोपी वृंदावन
- किशोरी वृंदावन (निकुंज वाटिका)।
जो मन में प्रेम रखता है, वह जहाँ है, वहीं वृंदावन में है।
प्रश्न 12: क्या लीला-दर्शन के समय रोना या हाहाकार कोई आध्यात्मिक अवस्था है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी समझाते हैं कि यदि यह भाव भीतर से उठता है, तो यह सच्चे प्रेम की स्थिति है।
पर इसे सभा में कह देना या दिखाना अहंकार का सूक्ष्म रूप है।
सच्चा प्रेम गुप्त और निर्मल होता है।
वह कहते हैं — “जो अपने भाव को छिपाता है, वही वास्तविक भगवत-प्रेम का अधिकारी बनता है।”
भगवान का प्रेम दैन्य और विनम्रता से प्रकट होता है, दिखावे से नहीं।
प्रश्न 13: क्या गृहस्थ भक्त भी संतों के समान संतति कहलाते हैं?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं — “जो अपनी सम्पूर्ण आज्ञा गुरुदेव को समर्पित कर देता है, वही सच्चा शिष्य है।”
जैसे अमरीश जी गृहस्थ होकर भी भगवान के प्रिय हुए।
गृहस्थ होना बाधा नहीं, बशर्ते मन भगवान में तन्मय हो।
महाराज जी कहते हैं — “हम सब तुम्हें अपने बच्चे मानते हैं, पर केवल वही पूर्ण संतान है जिसने अपना अस्तित्व मिटा दिया है।”
जो “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो ना कोई” की तरह जीता है, वही सच्चा भक्त है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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