प्रश्न 1: भजन करते समय गंदे विचार क्यों आते हैं?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं — “जब साधक भजन करता है और मन में गंदे विचार आने लगते हैं, तो घबराना नहीं चाहिए। ये विचार गंदे नहीं हैं, ये तुम्हारे भीतर की गंदगी है जो अब बाहर निकल रही है।”
महाराज जी कहते हैं — “नाम-जप आत्मा की सफाई का काम करता है। जैसे कमरे की झाड़ू लगाने पर पहले धूल उड़ती है, वैसे ही जब नाम-जप शुरू होता है, तो मन की धूल उड़ने लगती है। वो धूल ही है ये विचार।”
वो समझाते हैं — “कई जन्मों से मन में पड़ी वासनाएँ, पाप-वृत्तियाँ और दूषित संस्कार — जब भजन की आग लगती है, तो जलने लगते हैं। उस समय साधक को लगता है कि मैं तो और बुरा सोचने लगा, लेकिन असल में वो अंदर की मलिनता है जो निकल रही है।”
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “ये उसी तरह है जैसे मोबाइल में भरे हुए पुराने गंदे मैसेज। जब उन्हें डिलीट करते हो, तो स्क्रीन पर वही दिखते हैं। उसी तरह जब नाम-जप चलता है, तो मन में वही दिखने लगते हैं जो हट रहे हैं।”
महाराज जी कहते हैं — “तुम्हें बस नाम में टिके रहना है, विचारों के पीछे मत भागो। जब तक मन की नाली साफ नहीं होगी, तब तक सुगंध नहीं आएगी। नाम-जप करते रहो, वही मन को पवित्र करेगा।”
और अंत में बड़ी कोमलता से कहते हैं —
“ये सब विचार मिट जाएंगे, बस राधा राधा रह जाएगी। वही नाम है जो सारे अंधकार को मिटा देगा। घबराना नहीं — ये गंदगी नहीं, तुम्हारा शुद्धिकरण है।”
प्रश्न 1: महाराज जी, इस संसार में असमानता क्यों रखी गई है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “यह संसार कर्मप्रधान है।” भगवान ने किसी को कम या अधिक नहीं दिया, सबने अपने-अपने कर्मों के अनुसार फल पाया है। जो पुण्य कर्म करता है, उसे सुख मिलता है, और जो पाप कर्म करता है, उसे दुःख भोगना पड़ता है। भगवान का इसमें कोई दोष नहीं। उन्होंने तो सबको समान अवसर दिया है। अब तक जो भी हुआ, वह हमारे पूर्व कर्मों का परिणाम है, परंतु अब हमारे पास सुधारने की पूरी स्वतंत्रता है। आज से यदि हम सच्चे भाव से नाम-जप करें, भजन करें, अच्छे कर्म करें, तो हमारा भविष्य उज्जवल होगा। महाराज जी समझाते हैं कि “अब लो निशानी अब नाश, अब तक जो हुआ अब हुआ”—अब से अच्छा करो, राधे राधे जपो, और जीवन का मार्ग बदलो।
प्रश्न 2: संसार में श्रेय और दोष किसके कारण मिलते हैं?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “श्रेय और दोष भी कर्मों के संयोग से मिलते हैं।” कभी-कभी हमारा अपना प्रारब्ध नहीं, बल्कि हमारे आस-पास के लोगों का कर्म भी हमारे सुख-दुःख का कारण बनता है। जैसे क्रिकेट टीम में एक खिलाड़ी अच्छा खेलता है, पर बाकी असफल हों तो उसे भी हार का सामना करना पड़ता है। पिता के अच्छे कर्म होने पर भी यदि पुत्र दुर्गुणी हो, तो पिता को भी दुःख मिलता है। इसलिए यह संसार कर्म-संयोग का परिणाम है — कोई भी दुःख या सुख बिना कर्मों के संयोग के नहीं आता।
प्रश्न 3: पति और पुत्र की सोच में टकराव हो तो क्या करें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “एक पति परमेश्वर है, और दूसरा पुत्र वात्सल्य का रूप।” अतः दोनों का सम्मान करना आवश्यक है। पति के प्रति आदर और पुत्र के प्रति प्रेम का संतुलन ही गृहस्थ की सच्ची साधना है। हमें पुत्र को समझाना चाहिए कि वह पिता का अपमान न करे, और पति को प्रेमपूर्वक यह भाव देना चाहिए कि पुत्र भी हमारी ही आत्मा का अंश है। महाराज जी कहते हैं — “अपनी तरफ से किसी का अहित न करो, केवल मंगल भावना रखो।” यही गृहस्थ जीवन का धर्म है।
प्रश्न 4: महाराज जी, इस संसार में असमानता क्यों रखी गई है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “यह संसार कर्मप्रधान है।” भगवान ने किसी को कम या अधिक नहीं दिया, सबने अपने-अपने कर्मों के अनुसार फल पाया है। जो पुण्य कर्म करता है, उसे सुख मिलता है, और जो पाप कर्म करता है, उसे दुःख भोगना पड़ता है। भगवान का इसमें कोई दोष नहीं। उन्होंने तो सबको समान अवसर दिया है। अब तक जो भी हुआ, वह हमारे पूर्व कर्मों का परिणाम है, परंतु अब हमारे पास सुधारने की पूरी स्वतंत्रता है। आज से यदि हम सच्चे भाव से नाम-जप करें, भजन करें, अच्छे कर्म करें, तो हमारा भविष्य उज्जवल होगा। महाराज जी समझाते हैं कि “अब लो निशानी अब नाश, अब तक जो हुआ अब हुआ”—अब से अच्छा करो, राधे राधे जपो, और जीवन का मार्ग बदलो।
प्रश्न 5: आराध्य भगवान और गुरुदेव में प्रेम कैसे बढ़े?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी उत्तर देते हैं — “नाम ही गुरु और इष्ट दोनों में प्रेम का सेतु है।” जब हम गुरु प्रदत्त नाम का जप करते हैं, तो वही नाम हमारे भीतर के पापों को मिटाता है, फिर सद्भावनाओं को जन्म देता है, और अंततः प्रेम को प्रकट करता है। नाम ही वह शक्ति है जो गुरु को ईश्वर से जोड़ती है। इसीलिए महाराज जी कहते हैं — “नाम पहले पाप को नष्ट करेगा, फिर पाप प्रवृत्ति को मिटाएगा, और अंत में प्रेम देगा।”
प्रश्न 6: क्या पैसे को लक्ष्मी मानकर पूजना चाहिए?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी मुस्कुराकर कहते हैं — “पैसा कागज का टुकड़ा है, लेकिन उसके द्वारा सत्कर्म हो सकते हैं।” ₹2000 का नोट उपयोग में नहीं आए, तो उसका कोई मूल्य नहीं। इसीलिए धन का उपयोग सत्कर्म में करें, पर उसे ‘लक्ष्मी’ समझकर मोह न रखें। अगर रूपया दिमाग में चढ़ गया, तो वही पापों का कारण बन जाएगा। भगवान का महत्व रखो, पैसे का नहीं — यही विवेक है।
प्रश्न 7: क्या अधिकारी को अपमान सह लेना चाहिए?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “जहाँ कर्तव्य है, वहाँ विवेक आवश्यक है।” एक पुलिस अधिकारी अपराधी को क्षमा नहीं कर सकता, क्योंकि दंड ही उसके लिए उपचार है। परंतु जहाँ व्यक्तिगत व्यवहार है, वहाँ विनम्रता रखनी चाहिए। “भगवान ने हमें अभिनय का अवसर दिया है,” महाराज जी कहते हैं, “हम अपने पद पर अभिनय करें, पर भीतर से भगवान का स्मरण रखें। डायरेक्टर भगवान हैं, वही सबका अंत तय करते हैं।”
प्रश्न 8: क्या संतों का केवल दर्शन ही मुक्ति देता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी स्पष्ट करते हैं — “संत दर्शन से पाप तो नष्ट होते हैं, पर पाप प्रवृत्ति उनके उपदेशों को जीवन में उतारने से मिटती है।” संत चलते-फिरते तीर्थराज हैं, उनके दर्शन से मन पवित्र होता है, परंतु उनके वचनों का पालन ही वास्तविक संत समागम है। केवल फूल चढ़ाने से नहीं, उनके वचनों को आचरण में लाने से भगवत प्राप्ति होती है। यही सच्चा सत्संग है।
प्रश्न 9: क्या हर कर्म बंधन है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “हर कर्म बंधन नहीं है, अहंकारपूर्वक किया गया कर्म ही बंधन है।” जो कर्म ‘भगवत प्रीत्यर्थ’ किया जाए, वही योग बन जाता है। अहंकार रहित कर्म मुक्ति का द्वार है। महाराज जी कहते हैं — “कर्म के चक्कर में मत फंसो, नाम-जप करो।” जिस श्वास में राम या राधा का नाम हो, वही परम लाभ है। कर्म नहीं, नाम ही भगवत प्राप्ति का आधार है।
प्रश्न 10: महाराज जी, “मेरा कैमरा किसी की फोटो नहीं लेता” का क्या अर्थ?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “जब दृष्टि में केवल भगवान रह जाएँ, तब बाकी सब मिट जाता है।” साधक जब अभ्यास करता है तो सबको देखता है, पर मन में भगवान ही रहता है। वही स्थिति तब आती है जब हर वस्तु में भगवान का ही स्वरूप दिखे — चाहे कुत्ता हो, पापी हो या महात्मा। तब साधक कहता है — “हम सब में वही शक्ति है, वही कारण है, वही परमात्मा है।” यह अध्यात्म की सबसे ऊँची अवस्था है।
प्रश्न 11: मंदिर में शून्यता का अनुभव क्यों होता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “जब मन शून्य होता है, तब वही परम पूर्णता का संकेत है।” मंदिर का भगवान पत्थर नहीं, चेतन शक्ति है। जब हम ईश्वर के समक्ष जाते हैं और कुछ भी मांग नहीं पाते, तो समझो कि आत्मा ईश्वर में लीन हो गई। वह अवस्था सर्वोच्च भक्ति की है। भगवान सर्वज्ञ हैं — उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं। हमें बस राधा राधा जपते हुए कर्तव्य कर्म करना चाहिए।
प्रश्न 12: मरने के बाद तुलसी और गंगाजल देना आवश्यक है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “मरने के बाद की नहीं, जीते जी की चिंता करो।” जब तक जीवित हैं, नाम-जप करो, चरणामृत पियो, तुलसी का सेवन करो। मरने के बाद जो संस्कार होंगे, वे तो शरीर के हैं — आत्मा पहले ही भजन में विलीन हो चुकी होगी। “भजन करके निकल गए,” महाराज जी कहते हैं, “अब यह शरीर तो बस पुराना वस्त्र है।”
प्रश्न 13: यदि भगवान की मूर्ति टूट जाए तो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “मूर्ति मिट्टी, धातु या पत्थर की होती है — मायाकृत है, नाशवान है।” भगवान उसमें नहीं, भावना में हैं। यदि मूर्ति टूट जाए तो चिंता न करें — उसे पवित्र नदी में विसर्जित करें और नई मूर्ति स्थापित करें। भगवान विनाशी नहीं, अविनाशी हैं। जो जलेगा, वह माया है; भगवान तो हर रूप में हैं — अग्नि में भी वही, जल में भी वही।
प्रश्न 14: क्या कोई व्रत या तप रोग मिटा सकता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है, कोई व्रत उसे मिटा नहीं सकता।” भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — “अवश्यं भोक्तव्यम् कृतं कर्म शुभाशुभम्।” पर भजन से भोगने की सामर्थ्य मिलती है। बड़े-बड़े सिद्धों ने भी कष्ट झेले, क्योंकि प्रारब्ध का नियम भगवान ने भी नहीं तोड़ा। महाराज जी कहते हैं — “भजन रोग मिटाता नहीं, पर शरणागति पुष्ट करता है।” यही कष्ट भगवान की कृपा का रूप होता है।
प्रश्न 15: महाराज जी, मैं नाम-जप करता हूँ, फिर भी प्रेम क्यों नहीं जागता?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “जब तक हृदय में पाप और दूषित संस्कार हैं, तब तक प्रेम नहीं होता।” राधेश्याम का प्रेम निर्दोष मन में ही प्रकट होता है। इसलिए नाम-जप के साथ-साथ आचरण की पवित्रता आवश्यक है — माता-पिता के चरण छूना, बड़ों का आदर, और मन-वचन-कर्म की स्वच्छता। महाराज जी कहते हैं — “निर्मल मन जन सो मोहि पावा” — निर्मल मन ही प्रेम का पात्र है। जब हृदय शुद्ध होगा, तब आँसू अपने आप बहेंगे।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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