माला-1046: तीनों रुकावटों को पार कैसे किया?, श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से

प्रश्न 1: तीनों रुकावटों को पार कैसे किया?

प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवत प्राप्ति के मार्ग में कंचन, कामिनी और कीर्ति ये तीन बहुत बड़ी बाधाएँ होती हैं। लेकिन जब भजन का प्रभाव जीवन में उतरने लगता है, तो यह संसार स्वयं ही मूल्यहीन लगने लगता है। महाराज जी ने कहा कि जैसे भुने हुए चने में कितना भी पानी डालो, वह अंकुरित नहीं होते, वैसे ही संत का हृदय भी संसारिक आकर्षणों से असंग रहता है। जब प्रभु की कृपा होती है, तो संसार में रहते हुए भी व्यक्ति उसमें लिप्त नहीं होता। कीर्ति, स्त्री और धन – ये सभी मोह जब निष्प्रभावी हो जाते हैं, तब व्यक्ति सही मायनों में भगवत भजन के योग्य होता है।

प्रश्न 2: रिद्धि-सिद्धि पर विजय कैसे पाई?

महाराज जी बताते हैं कि जब वे वृंदावन आए, तब तक रिद्धियाँ-सिद्धियाँ उनके चारों ओर थीं। त्राटक क्रिया की सिद्धि इतनी प्रबल थी कि सामने वाले से वही बोलवाते जो वे चाहते थे। लेकिन गुरुजी ने स्पष्ट कहा कि यदि प्रेम मार्ग में आगे बढ़ना है तो इन सिद्धियों को त्यागना होगा। यह निर्णय उनके बस का नहीं था, लेकिन गुरु कृपा से सब संभव हुआ। उन्होंने राधा बाग में जाकर समर्पण किया और तब प्रभु की कृपा से सिद्धियों की लालसा समाप्त हो गई। अब वे हर व्यक्ति में प्रभु को देखते हैं, न दोष दिखता है, न आकर्षण रहता है।

प्रश्न 3: साक्षी भाव में कैसे रहा जाए?

महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि साक्षी भाव में रहना कोई साधारण स्थिति नहीं, यह ज्ञान और नाम जप से उत्पन्न होती है। पहले देह का अभिमान मिटाना पड़ता है। जब तक व्यक्ति अपने को शरीर मानता है, तब तक वह आसक्त रहता है। लेकिन जब उसे यह ज्ञान होता है कि ‘मैं आत्मा हूं’, तब साक्षी भाव जागृत होता है। जो भी क्रियाएं हो रही हैं – देखना, सुनना, बोलना – उनमें ‘मैं करता हूं’ का भाव नहीं, बल्कि ‘यह हो रहा है’ का भाव होता है। यह साक्षी भाव व्यक्ति को मुक्त बना देता है।

प्रश्न 4: षट् विकारों का नाश कैसे करें?

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर – ये षट् विकार गहरे संस्कारों से उत्पन्न होते हैं। प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं कि इनका नाश नाम जप के माध्यम से धीरे-धीरे होता है। जैसे कोई संकल्प उठे और हम उस समय उसका अनुसरण न करें, तो विकार जड़ नहीं पकड़ते। धर्मानुकूल आचरण और सतत भजन विकारों की जड़ को काटते हैं। यह क्रमिक प्रक्रिया है – एक बार में नहीं होता। जैसे-जैसे साधना गहरी होती है, विकार कमज़ोर होते जाते हैं और अंततः शांत हो जाते हैं।

प्रश्न 5: भगवतप्राप्त महापुरुषों की आज्ञा पर चलना क्यों ज़रूरी है?

महाराज जी कहते हैं कि केवल महापुरुषों का मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी आज्ञा का पालन करना ही सच्चा लाभ है। जो व्यक्ति महापुरुष की आज्ञा का अनुसरण करता है, उसे भगवत प्राप्ति निश्चित हो जाती है। आज्ञा पालन कठिन हो सकता है, परंतु यह ही सत्य पथ है। महापुरुष की कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है। उनकी कृपा से ही भक्ति, प्रेम और भगवत अनुभूति संभव होती है।

प्रश्न 6: समस्या आने पर मन बार-बार क्यों सोचता है?

जब भी कोई समस्या आती है, तो मन बार-बार उसी में उलझता है। प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि यह स्वाभाविक है, लेकिन इस पर नियंत्रण संभव है। हमें बार-बार प्रभु के सामने अपनी बात रखनी चाहिए – ‘प्रभु, या तो इस समस्या को दूर करो या सहने की शक्ति दो’। यदि हम सच्चे भाव से पुकारते हैं, तो प्रभु हमारी सुनते हैं। लेकिन अगर भावहीन होकर पुकारेंगे तो सुनवाई नहीं होगी। भक्ति ही वह माध्यम है जिससे प्रभु को अपनापन महसूस होता है और वही अपनापन संकट को हर लेता है।

प्रश्न 7: ममता क्या है और इससे कैसे मुक्त हों?

ममता वह आसक्ति है जो व्यक्ति को शरीर, संबंधियों, धन और संपत्ति से जोड़ती है। महाराज जी समझाते हैं कि यह प्रियता जब फैलती है तो ममता कहलाती है, और जब एक ही स्थान पर केंद्रित हो जाती है – प्रभु में – तब भक्ति बन जाती है। सारी ममता प्रभु में लग जाए तो वह मुक्तिदायक होती है। परिवार, धन, मान– ये सब प्रभु की कृपा से हैं, परन्तु यदि उनमें ही हम लिप्त हो जाएँ तो यह बंधन बन जाता है। ममता को प्रभु में केन्द्रित करना ही समाधान है।

प्रश्न 8: शरणागति लेने में डर क्यों लगता है?

महाराज जी कहते हैं कि जब व्यक्ति शरणागत होता है, तो वह निर्भय हो जाता है। डर इसलिए लगता है कि कहीं हम आज्ञा उल्लंघन न कर दें। लेकिन जब शरणागत भाव दृढ़ होता है, तब भरोसा होता है कि ‘मेरे प्रभु हैं, वे रक्षा करेंगे, क्षमा करेंगे’। जैसे मां बच्चे की रक्षा करती है, वैसे ही भगवान अपने शरणागत की रक्षा करते हैं। डर छोड़कर हमें भगवान के प्रति भरोसा करना चाहिए और हर परिस्थिति में उन्हें ही आश्रय मानना चाहिए।

प्रश्न 9: भजन में प्रारंभिक आनंद क्यों चला गया?

प्रेमानंद महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि प्रारंभिक आनंद भगवान की कृपा होती है ताकि जीव इस मार्ग की ओर आकर्षित हो। जैसे कोई नशा सिखाने वाला पहले मुफ्त में चाय पिलाता है, वैसे ही प्रभु पहले आनंद देते हैं। फिर वह कृपा हटाकर जीव को अभ्यास से चलना सिखाते हैं। अब वह आनंद नहीं आता क्योंकि यह अब हमारी साधना की यात्रा है, न कि कृपा का उपहार। लेकिन जो आनंद एक बार मिला है, वह फिर आएगा, जब भजन की गहराई बढ़ेगी।

प्रश्न 10: सही निर्णय कैसे लें?

महाराज जी कहते हैं कि निर्णय वही सही होता है जो धर्म, शास्त्र और संत वाणी के अनुसार हो। अगर कोई कार्य करने से पहले भीतर से एक हल्की सी आवाज आती है कि यह गलत है, तो उसे न करें। यही अंतरात्मा की चेतावनी होती है। यदि निर्णय संत और शास्त्र के अनुरूप हो, तो परिणाम चाहे प्रारंभ में कठोर लगे, परंतु अंतिम फल मंगलकारी ही होता है।

प्रश्न 11: निकुंज प्राप्ति की एकमात्र राह क्या है?

निकुंज जैसी परम प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि मन में कामनाओं का पूर्ण त्याग हो। महाराज जी कहते हैं कि जब तक मन में सांसारिक इच्छाएं रहेंगी, तब तक निकुंज का द्वार नहीं खुलेगा। नाम जप ही एकमात्र साधन है जो मन की चंचलता को शांत करता है और कामनाओं का शमन करता है। नाम से ही संतोष उत्पन्न होता है और जब संतोष आ जाता है, तब परमप्रेम प्रकट होता है।

प्रश्न 12: गृहस्थ जीवन में आध्यात्मिकता कैसे बनी रहे?

महाराज जी कहते हैं कि नाम जप गृहस्थ जीवन में सबसे बड़ा सहारा है। नाम जप में न धन लगता है, न विशेष स्थिति चाहिए। काम करते हुए, व्यापार करते हुए, परिवार के बीच रहते हुए भी मन में राधा राधा चलती रहे तो वही साधना है। अपवित्रता दूर होगी, भक्ति बढ़ेगी और कर्म पवित्र हो जाएंगे। केवल यह ध्यान रखना है कि पाप के कार्य न हों।

प्रश्न 13: क्या सम्मान और सुख भौतिक वैभव से मिलता है?

इस संसार में दिखावे का वैभव कुछ समय का होता है, परंतु सच्चा सम्मान वैराग्य और भक्ति से मिलता है। महाराज जी कहते हैं कि संसार संत को ही सम्मान देता है, करोड़पति को नहीं। भजन करने वाला, प्रभु का भक्त ही वह है जिसे लोग सच्चे हृदय से मान देते हैं। वैभव, यश, धन – ये सब भगवान के दिए हुए हैं और जब ये धर्म के अनुसार प्रयोग हों तभी वे शांति देते हैं।

प्रश्न 14: विद्यार्थियों के लिए नाम जप कैसे करें?

विद्यार्थी चाहे जितना व्यस्त हो, 24 घंटे में से 24 मिनट नाम जप अवश्य कर सकता है। महाराज जी कहते हैं कि आप पढ़ाई के साथ-साथ समाज सेवा कर रहे हैं – यह भी प्रभु की पूजा है। यदि 24 मिनट भी सच्चे मन से राधा, कृष्ण, राम का नाम लिया जाए तो यह महान कार्य बन जाता है। साथ ही विद्यार्थी व्यसन और व्यभिचार से दूर रहें, क्योंकि यही दो दोष उनकी स्मृति और शक्ति को नष्ट कर देते हैं।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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