माला-1041: मन की बेचैनी का कारण क्या है?, श्री प्रेमानंद जी महाराज के अमृत वचनों से

❖ श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार दुख का अंत कहाँ है? – मन की स्थिति और नाम-जप की शक्ति

बसंत जी (हरियाणा) ने अत्यंत मार्मिक प्रश्न पूछा कि वे जीवन से अत्यधिक दुखी हैं – दोनों किडनियाँ फेल हैं और लगता है कोई उनसे अधिक दुखी नहीं। इस पर श्री महाराज जी ने उत्तर दिया कि यदि किसी का मन श्रीजी के चरणों में दृढ़ रूप से स्थिर हो, तो वह संसार में सबसे सुखी व्यक्ति है।

श्री प्रेमानंद जी महाराज जी ने समझाया कि यह संसार दुखालयम है – यहाँ आश्रय लेने से केवल दुख ही मिलेगा। जबकि भगवान सुखालयम हैं। यदि मन भगवान में लग जाए, तो दुख का अनुभव भी आनंद में बदल जाता है। उदाहरण स्वरूप, जैसे मछली गहरे जलाशय में निश्चिंत होकर तैरती है, वैसे ही हरि शरण में मनुष्य निश्चिंत होता है।

🔆 समाधान:

  • भगवान की शरण लेना
  • नाम-जप और अच्छे आचरण करना
  • पॉजिटिव चिंतन करना

❖ क्या भगवान और देवता अलग-अलग हैं?

राजीव जी (दिल्ली) ने पूछा कि भगवान और देवता में क्या अंतर है?

श्री प्रेमानंद जी महाराज जी ने उत्तर में कहा कि सब एक ही परमात्मा के विभिन्न रूप हैं

हालाँकि, जब हम उन्हें परमात्म भाव से नहीं देखते, तब वे सीमित शक्तियाँ बन जाते हैं। उन्होंने उपनिषद की कथा से समझाया कि कैसे वायु और अग्नि देवता एक यक्ष (भगवान के रूप) के सामने असमर्थ हो गए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सभी शक्तियाँ भगवान की ही देन हैं

📌 निष्कर्ष:

  • भगवान असीम सामर्थ्यशाली हैं
  • देवता सीमित फल दे सकते हैं, लेकिन मोक्ष नहीं

❖ नया रजिस्टर कैसे बनाएं?

विजय जी (जौनपुर) ने बताया कि उनके जीवन में पुराने पापों की भरमार है – व्यभिचार, झूठ आदि। वे नया “रजिस्टर” बनाना चाहते हैं ताकि आत्मा का कल्याण हो।

श्री प्रेमानंद जी महाराज जी ने कहा कि –

“नाम जप करो, परोपकार करो, सभी में भगवान को देखो, किसी का बुरा न चाहो।”

यह सब मिलकर एक शुद्ध, दिव्य आत्मिक रजिस्टर तैयार कर देता है, जो भगवद न्यायालय में स्वीकार्य होगा।

❖ भगवान शिव कृपा से साधना कराते हैं या साधना से कृपा?

रजनी जी के प्रश्न पर श्री प्रेमानंद जी महाराज जी ने उत्तर दिया कि साधना ही भगवान की कृपा है। यदि आपकी साधना स्वाभाविक रूप से चल रही है, तो समझिए कि भगवान की विशेष कृपा है।

यह अहंकार की बात नहीं कि “मैं साधना कर रहा हूँ”, बल्कि ये तो कृपा का अनुभव है।

❖ प्रकट गुरु नहीं हैं, तो क्या सान्निध्य नहीं मिलेगा?

शिवम कुमार जी ने प्रश्न किया कि यदि गुरु प्रकट नहीं हैं, तो सान्निध्य कैसे अनुभव करें। इस पर श्री प्रेमानंद जी महाराज जी ने उत्तर दिया कि गुरु मंत्र का जप करें।

“हम राधा राधा कहते हैं, क्या यह गुरु मंत्र नहीं है?”

यदि आप “राधा राधा” जपते हैं, तो हम आपके साथ हैं।

❖ मन की बेचैनी का कारण क्या है?

कमलदीप जी ने पूछा कि व्यक्ति भीतर से अशांत क्यों रहता है। महाराज जी ने कहा:

“क्योंकि वह आनंद का अंश है, और आनंद केवल भगवान में है।”

जब तक मन भगवान में विश्राम नहीं करता, तब तक शांति नहीं मिल सकती। मन सांसारिक वस्तुओं में दौड़ता है, लेकिन तृप्ति कहीं नहीं मिलती। केवल साधना, नाम-जप और कृपा से ही मन को “विश्राम” मिलता है।

❖ क्या गुरु की हर लीला में भी कल्याण होता है?

राधिका जी ने पूछा कि कभी-कभी गुरु की आज्ञाएँ प्रतिकूल लगती हैं, तो क्या उनमें भी कल्याण छिपा होता है?

श्री प्रेमानंद जी महाराज ने उत्तर में कहा — सच्चा शिष्य वही है जो गुरु की हर लीला में विश्वास रखे, भले वह हमारी समझ में न आए।

🌿 उन्होंने शिवाजी और समर्थ गुरु रामदास जी की कथा सुनाई –
जब शिवाजी दीक्षा लेने पहुँचे, गुरुजी ने उन्हें बिना अस्त्र-शस्त्र के शेरनी का दूध लाने की आज्ञा दी। शिवाजी बिना डरे जंगल गए। शेरनी झपटने ही वाली थी कि गुरुजी वहाँ प्रकट हो गए और बोले –

“मैं देखना चाहता था कि तू तन-मन-प्राण से समर्पित है या नहीं।”

🔶 निष्कर्ष:
गुरु की हर आज्ञा में परम मंगल छिपा होता है, बस उसे भगवत बुद्धि से समझने की जरूरत है। जो पूर्ण समर्पण करता है, वही कल्याण का अधिकारी बनता है।

❖ आत्मरक्षा कैसे संभव है?

अनुराधा जी ने पूछा कि वर्तमान समाज में अपराध बढ़ रहे हैं, ऐसे में क्या आत्मरक्षा की शिक्षा देना आवश्यक नहीं?

श्री प्रेमानंद जी महाराज जी ने गहराई से उत्तर दिया:

“सच्ची आत्मरक्षा केवल भगवान से संभव है।”

हमें चाहिए कि बच्चों को नाम-जप, भगवान की पूजा, संतों की श्रद्धा सिखाएँ – वही आत्मरक्षा का मार्ग है।

❖ वैराग्य तो है, पर गृहस्थी छोड़ नहीं सकते?

अभिषेक जी ने कहा कि वे संसार से विरक्त हो रहे हैं लेकिन पारिवारिक मोह छोड़ नहीं पा रहे।

श्री प्रेमानंद जी महाराज जी ने कहा:

“आज समय नहीं है कि आप जंगल चले जाएँ – एकांत भी नहीं है।”

भागना नहीं, बल्कि कर्मों को सुधारना है
गंदे आचरण से वैराग्य होना चाहिए, लेकिन कर्तव्य का त्याग नहीं। धर्म से युक्त कर्म ही भक्ति का स्वरूप बन सकता है।

❖ अधर्म करने वाला सुखी क्यों दिखता है?

महाराज जी ने गहरी बात कही:

“अधर्मी चार दिन हाईजेन बल्ब की तरह चमकता है और फ्यूज हो जाता है। धर्मी दीपक की तरह जलता है, जो पीढ़ियाँ उजागर करता है।”

सत्य, ईमानदारी, धर्म का पालन – भले कठिन लगे, लेकिन यही दीर्घकालिक सुख का मार्ग है।

❖ क्या गुरु ही ईष्ट हो सकते हैं?

सरजीवन शर्मा जी ने पूछा कि क्या गुरु को ही ईष्ट मान सकते हैं?

महाराज जी ने कहा:

“गुरु साक्षात परम ब्रह्म हैं। गुरु वाणी ही मंत्र है। उसी से मोक्ष संभव है।”

❖ ईश्वर ने सृष्टि इच्छा से की, तो क्या वह भी इच्छाओं के अधीन?

महाराज जी ने उत्तर दिया कि ईश्वर की इच्छा और हमारी इच्छा में बहुत अंतर है। जब हम अपनी इच्छा को ईश्वर की इच्छा में विलीन कर देते हैं, तभी हम सच्चे साधक बनते हैं।

इच्छाओं का परित्याग ही मोक्ष का द्वार है

❖ असफलता मिलने पर क्या करें?

सार्थक सिंह जी ने पूछा कि बार-बार असफलता मिलने पर मन घबरा जाता है।

महाराज जी ने कहा:

“ये प्रारब्ध का फल है। लेकिन कृपा प्रारब्ध को बदल सकती है।”

नाम-जप, परोपकार और अच्छे आचरण से भगवान की कृपा आती है, और कृपा से सब असफलताएँ भी सफलता में बदल जाती हैं।

📜 क्रेडिट:

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

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