1. नाम जप में प्रेम और अनुभव कैसे जागे ?
प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि नाम ही प्रेम की जड़ है। जैसे-जैसे व्यक्ति निरंतर नाम जप करता है, वैसे-वैसे प्रेम की अनुभूति हृदय में स्वतः जागृत होती है।
शुरुआत में नाम जप कठिन, नीरस या कड़वा भी लग सकता है, पर यह अवस्था केवल प्रारंभिक है। जैसे कोई कड़वी दवा लगातार लेने से रोग ठीक हो जाता है, वैसे ही नाम जप से आत्मा की गहराइयों में प्रेम का बीज अंकुरित होता है।
जैसे-जैसे प्रेम प्रकट होता है, मन की चंचलता समाप्त होने लगती है। फिर भौतिक विषयों का आकर्षण खोने लगता है और साधक भीतर से शांत, आनंदित और स्थिर हो जाता है।
2. सांसारिक भोग क्या नाम जप में विघ्न डालते हैं ?
महाराज जी बताते हैं कि जब मनुष्य सांसारिक भोगों में आसक्त होता है, तो उसका चित्त भगवान की ओर नहीं जा पाता।
भोगों में आनंद का भ्रम व्यक्ति को नाम जप से दूर कर देता है।
यदि किसी को भोगों में सुख मिलता है, तो भगवान प्रिय नहीं लगते।
ऐसे में नाम जप एक कठिन क्रिया प्रतीत होती है।
परंतु यदि जबरदस्ती भी नाम जप जारी रखा जाए, तो यह धीरे-धीरे भोगासक्ति को जला देता है और अंततः साधक का मन स्वतः नाम में रमने लगता है।
3. षड विकार की जड़ें कैसे पहचानें
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — ये षड विकार जब संकल्प तक ही सीमित रहें और क्रिया में परिणत न हों, तो समझना चाहिए कि उनकी जड़ें कमजोर हो चुकी हैं।
यदि भजन के साथ ये विकार दिखाई देते हैं, पर उनका असर भीतर स्थायी नहीं रहता, तो यह संकेत है कि भजन प्रभावी हो रहा है।
जैसे कोई बड़ा पेड़ उखड़ने के बाद भी कुछ दिन हरा-भरा दिखता है, वैसे ही ये विकार भी कुछ समय तक सक्रिय दिख सकते हैं, पर शक्ति खो बैठते हैं।
4. तत्वज्ञान और भगवत प्रेम का संबंध ?
तत्वज्ञान और प्रेममार्ग — दोनों मार्ग अलग हैं।
तत्वज्ञान आत्मा को सभी में एक रूप से देखता है।
वहीं, प्रेममार्ग सबमें भगवान श्रीकृष्ण या श्रीराम का दर्शन करता है।
महाराज जी बताते हैं कि यदि साधक साकार रूप में सबमें भगवान का दर्शन करे, तो वह ज्ञान और प्रेम दोनों को प्राप्त कर सकता है।
परंतु केवल तत्वदृष्टि से ही चलने पर भगवत लीलाओं का रस उपलब्ध नहीं होता।
5. क्या अगले जन्म का अज्ञान पाप का कारण है
जब व्यक्ति को यह ज्ञान नहीं होता कि उसके कर्मों का फल भविष्य में अवश्य मिलेगा, तो वह भयहीन होकर पाप करता है।
महाराज जी कहते हैं कि समाज, कानून, सम्मान और ईश्वर का डर यदि बना रहे, तो व्यक्ति गलत कर्मों से बच सकता है।
जैसे ही ये भय समाप्त होते हैं, आसुरी प्रवृत्तियाँ जन्म लेती हैं और मनुष्य पतन की ओर बढ़ता है।
6. गुरुदेव कैसे प्राप्त होते हैं ?
गुरुदेव न तो भाग्य से मिलते हैं, न ही केवल प्रयास से।
वे केवल भगवान की कृपा से ही मिलते हैं।
जब भगवान जीव पर कृपा करते हैं, तो वे स्वयं गुरुरूप में प्रकट होते हैं।
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — यह कृपा का क्षेत्र है, पुरुषार्थ का नहीं।
7. गृहस्थ को मार्गदर्शन और मुक्ति कैसे मिले ?
महाराज जी का संदेश गृहस्थों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है।
वे कहते हैं कि गृहस्थ, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए यदि नाम जप को नहीं छोड़ते, तो वे निश्चित रूप से प्रभु के प्रिय हो जाते हैं।
गृहस्थ को चाहिए कि वह अपनी जिम्मेदारियों को भी पूजा मानकर निभाए और भीतर से राधा-राधा करता रहे।
यही सबसे श्रेष्ठ साधना है।
8. क्या कर्मयोग से भी प्रभु की प्राप्ति होती है ?
हाँ। यदि कर्म को पूजा बना दिया जाए और उसका समर्पण भगवान को किया जाए, तो वही कर्म भगवत प्राप्ति का साधन बन सकता है।
महाराज जी कहते हैं कि जो अपने कर्म क्षेत्र में रहते हुए नाम जप करता है, वह श्रेष्ठ संत के समान है।
9. साधना टूट जाए तो मन को कैसे संभालें ?
महाराज जी के अनुसार, साधना टूटने के दो प्रमुख कारण हैं — अशुद्ध आहार और ब्रह्मचर्य का अभाव।
इन दो बातों पर ध्यान देकर मन की दृढ़ता और संकल्प शक्ति को पुनः पाया जा सकता है।
नाम जप के माध्यम से मन पुनः स्थिर होगा और साधना की रुचि वापस आएगी।
10. मंत्र जाप से दुखों में कमी कैसे आती है ?
महाराज जी कहते हैं कि प्रारब्ध का भोग तो करना ही पड़ता है।
परंतु नाम जप से संचित और वर्तमान (क्रियमाण) कर्म जलते हैं।
भगवान सहन करने की शक्ति देते हैं और जीवन में आनंद का अनुभव करवाते हैं।
कष्ट प्रकट रूप से भले मौजूद हों, पर वे मन को दुखी नहीं कर पाते।
नाम जप जीवन को सुगम, स्थिर और दिव्य बना देता है।
🙏 Credit:
यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।
यह भी पढ़ें : माला-1021
1 thought on “माला-1023: प्रेमानंद जी महाराज के दिव्य उत्तर, नाम जप, भक्ति और सांसारिक जीवन के गूढ़ रहस्य”