धन आने पर भी प्रसन्नता नहीं रहती क्योंकि सच्चा आनंद धन, पद या भोग में नहीं, भगवान के नाम और सेवा में है। प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि बाहर की चीज़ें क्षणिक तृप्ति देती हैं, लेकिन मन को स्थायी शांति नहीं मिलती। जब मन परमात्मा से जुड़ता है और धन परोपकार में लगता है, तभी वह सार्थक होता है। स्वार्थी भोग अशांति लाते हैं, जबकि सेवा और नाम-जप से ही असली सुख मिलता है।
आंतरिक आनंद की प्राप्ति कैसे हो?
प्रश्न: जीवन में सब कुछ होते हुए भी अंदर से प्रसन्नता का अनुभव क्यों नहीं होता?
उत्तर (प्रेमानंद जी महाराज के वचनों से):
आनंद संसार में नहीं है। प्रकृति के भोग, संपत्ति या पद – ये सब क्षणिक हैं। सच्चा आनंद परमात्मा में है। जो भी आत्मा आनंद की खोज कर रही है, वह दरअसल भगवान के साथ मिलन की आकांक्षा है।
भक्ति में गहराई आएगी तो समझ आएगा – मनुष्य अनंत सुख चाहता है, जो केवल भगवान के चरणों में है।
धन का सदुपयोग क्या है ?
प्रश्न: यदि प्रारब्ध अनुसार धन आ गया है, तो उसका प्रयोग कैसे करें?
उत्तर:
धन हो या न हो, दोनों ही स्थिति में भगवान का नाम-जप और परोपकार ही संतोष देते हैं।
- अधिक धन है तो सेवा करें – जैसे अस्पताल, गौशाला, वृद्धों की सेवा।
- धन नहीं है तो शरीर से सेवा करें।
महाराज जी कहते हैं:
“भगवान का भजन धन की तृष्णा को नष्ट कर देता है। और परोपकार उसे सार्थक कर देता है।”
जीवन में सही निर्णय कैसे लें?
प्रश्न: जब जीवन में दो राहें हों, तो सही राह कैसे चुनें?
उत्तर:(प्रेमानंद जी महाराज के वचनों से):
निर्णय धर्म को साक्षी रखकर लिया जाए। मन को नहीं, क्योंकि मन चंचल और भ्रमित करता है।
धर्म जानने के दो ही मार्ग हैं:
- संतों का सत्संग
- शास्त्रों का स्वाध्याय
मूल मंत्र: विपत्ति हो या संपत्ति – धर्म को सामने रखकर निर्णय करें।
गीता में बताए यज्ञ, दान और तप को कैसे समझें?
प्रश्न: कलिकाल में गृहस्थ इन शिक्षाओं को कैसे अपनाएं?
उत्तर:
- यज्ञ: सबसे बड़ा यज्ञ है नाम-जप यज्ञ।
- दान: सबसे बड़ा दान है अभयदान।
- तप: मन के विकारों को सह लेना ही सच्चा तप है।
गृहस्थ जीवन में:
- पहली रोटी गाय के लिए
- दूसरी पक्षियों के लिए
- फिर भगवान को अर्पित करें
भक्त और रसिक में क्या अंतर है?
उत्तर:(प्रेमानंद जी महाराज के वचनों से):
भक्त वह है जो भगवान से फल चाहता है।
रसिक वह है जो भगवान के सुख में डूबा रहता है।
रसिक की पहचान:
- उसका प्रेम प्रिया-प्रेमी के चरणों में लीन होता है
- वह अपने सुख की नहीं, प्रिया-प्रेमी के सुख की चिंता करता है
क्या अप्रकट संतों से मानसिक दीक्षा संभव है?
उत्तर:(प्रेमानंद जी महाराज के वचनों से):
यह अत्यंत कठिन है।
जब तक हम अत्यंत निर्मल और रसिक न हों, तब तक प्रगट संतों से ही दीक्षा लेनी चाहिए।
प्रेमानंद जी कहते हैं:
“ललिता जी से मानसिक मंत्र मिलना हमारी सामर्थ्य नहीं। बेहतर है हम उन्हीं की परंपरा में किसी प्रगट गुरु का आश्रय लें।”
भजन में प्रेम नहीं आ रहा, क्या करें?
उत्तर:
यह प्रारंभिक अवस्था है। प्रेम तब प्रकट होगा जब पाप और कर्मबंधन नष्ट होंगे।
नियमित भजन, नाम-जप और 84 जी का पाठ करते रहें।
“मूल नियम: रुको नहीं, उबो नहीं, भाव आए या ना आए – चलते रहो।”
गुरुदेव के अंतःकरण से अंतर्मन कैसे जोड़ें?
उत्तर:
जब मन भगवदाकार वृत्ति में स्थित होता है, तब यह संभव होता है।
- गलत आचरण छोड़ें
- शुद्ध आचरण अपनाएं
- नाम-जप करें
- ठाकुर सेवा करें
निर्मल मन ही गुरुदेव को प्राप्त कर सकता है।
पूरा दिन नाम-जप हुआ तो अभिमान क्यों आ रहा है?
उत्तर:
अगर यह भाव आ जाए – “मैंने किया”, तो अभिमान
अगर यह भाव हो – “प्रभु ने करवाया”, तो कृपा भाव
“आज नाम-जप हुआ, इसका श्रेय प्रभु को दो – तब दैन्यता आएगी, प्रेम बढ़ेगा।”
भीतर जलन और विचारों की गड़बड़ी क्यों हो रही है?
उत्तर:
यह संभवतः वैष्णव अपराध के कारण है।
- किसी संत की निंदा हो गई हो
- किसी का अपमान कर दिया हो
- या गलत भोजन लिया हो
उपाय:
- श्री जी से मन-वचन-कर्म से क्षमा माँगें
- एकांत में प्रार्थना करें
- नाम-जप जारी रखें
क्या संसार में रहकर भी अनन्य भक्ति संभव है?
उत्तर:
हाँ, संसार में रहकर भी भगवान को प्राप्त किया जा सकता है।
“व्यवहार शारीरिक है, प्रेम हृदय का विषय है।”
बस दो बातें ध्यान रखें:
- किसी का अहित न हो
- निरंतर नाम-जप हो
नाम-जप की संख्या कम हो गई, क्या करें?
उत्तर:
यह माया का प्रभाव है।
नाम-जप की डोरी हाथ में रहेगी तो प्रभु (पतंग) से संबंध बना रहेगा।
“डोरी छूटी तो पतंग भी खो जाएगी।”
इसलिए संख्या कम हो जाए तो भी नाम से जुड़ाव बना रहे।
शिव-भक्ति का आरंभिक अनुभव क्या हो?
उत्तर:
सबसे पहले चाहिए श्रद्धा और विश्वास।
फिर आता है – वैराग्य → अनुराग → अनुभव
विश्वास का अर्थ:
“भगवान हैं, हमें सुनते हैं, और हमसे अत्यंत प्रेम करते हैं।”
साधना या आश्रय – क्या अधिक महत्वपूर्ण है?
उत्तर:
आश्रय सबसे बड़ा साधन है।
सिर्फ तप या साधना से भगवान को नहीं पाया जा सकता।
“भगवान को खरीदा नहीं जा सकता, बस समर्पण से पाया जा सकता है।”
जैसे कोई कुत्ता किसी के दरवाजे पर रोज बैठा रहे – तो मालिक उसकी ज़िम्मेदारी लेने लगता है।
वैसे ही भगवान का अनन्य आश्रय ले लें – तो वह ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले लेंगे।
CREDIT: यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।
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