प्रश्न 1: महाराज जी,आजकल लोग तली हुई चीज़ें, फास्ट फूड और बाहर का खाना बहुत पसंद करते हैं। साधक को भोजन के विषय में क्या ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि आजकल खान-पान की आदतें ऐसी हो गई हैं कि लोगों को घर के सात्त्विक भोजन की अपेक्षा बाजार और होटल का भोजन अधिक अच्छा लगने लगा है। कचौड़ी, समोसा, गोलगप्पे, छोले-भटूरे, पाव-भाजी, पिज्जा, बर्गर और आइसक्रीम जैसी चीजें स्वाद में अच्छी लग सकती हैं, लेकिन साधक को यह देखना चाहिए कि उसका भोजन उसके शरीर और भजन के लिए कितना उपयोगी है।
महाराज जी कहते हैं कि जब तक हमें अपने वास्तविक स्वरूप का थोड़ा ज्ञान नहीं होता, तब तक हम शरीर और इंद्रियों की मांग को ही अपनी मांग समझते रहते हैं। जीभ बहुत छोटी है और उसका स्वाद भी थोड़े समय का है। केवल स्वाद के लिए ऐसी चीजें खाते रहना, जिनसे शरीर पर अनावश्यक भार पड़े, साधक के लिए उचित नहीं है। इसलिए इंद्रियों को धीरे-धीरे नियंत्रण में लाने का अभ्यास करना चाहिए।
महाराज जी विशेष रूप से सात्त्विक भोजन और घर के भोजन पर जोर देते हैं। यदि कुछ खाने की इच्छा हो तो उसे घर पर ही स्वच्छ तरीके से बनाकर पहले ठाकुर जी को भोग लगाकर ग्रहण करना अच्छा है। इससे भोजन के प्रति भी एक पवित्र भाव बना रहता है।
महाराज जी बताते हैं कि भोजन का प्रभाव हमारे भजन पर भी पड़ता है। यदि भोजन बासी हो, अपवित्र हो या ऐसा हो जिससे तमोगुण बढ़े, तो भजन में मन लगाने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए भोजन को सुधारने से भजन की वृत्ति को भी सुधारने में सहायता मिलती है। भोजन अच्छा होगा तो शरीर स्वस्थ रहेगा और शरीर स्वस्थ रहेगा तो अपने कर्तव्यों का पालन करने तथा भगवान का चिंतन करने की क्षमता भी बनी रहेगी।
इसीलिए महाराज जी व्यायाम और प्राणायाम करने की भी बात कहते हैं। लगभग 30–40 मिनट व्यायाम और 20 मिनट प्राणायाम करने तथा बाहरी और अनावश्यक खान-पान से बचने की बात कही गई है। उनका भाव है कि शरीर को इतना स्वस्थ और सक्रिय रखना चाहिए कि वह स्वार्थ और परमार्थ दोनों के काम आ सके।
इसलिए साधक के लिए भोजन केवल स्वाद का विषय नहीं है। भोजन जैसा होगा, वैसी ही हमारी वृत्ति पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा। जहाँ सुविधा हो, बाजार और होटल के भोजन से बचकर सात्त्विक, स्वच्छ और घर का भोजन करना चाहिए। और भोजन को भगवान को अर्पित करके ग्रहण करने का भाव रखना चाहिए।
प्रश्न 2: क्या श्रीजी की दया, कृपा और करुणा में कोई अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी ने इस प्रश्न का बहुत सुंदर ढंग से अंतर बताया है। वे कहते हैं कि अनुकूलता दया है, प्रतिकूलता कृपा है और पतित के ऊपर करुणा होती है। अर्थात जब जीवन में हमारी परिस्थिति हमारे अनुकूल होती है और हमें सुविधा, सुख या अनुकूलता मिलती है, तो उसे श्रीजी की दयालुता के रूप में देखना चाहिए। जब परिस्थिति प्रतिकूल हो जाती है, तब भी उसे केवल दुख न मानकर श्रीजी की कृपा के रूप में देखने का भाव रखना चाहिए। और जब व्यक्ति स्वयं को दीन, हीन और पतित मानता है, तब वह श्रीजी की करुणा का अधिकारी बनता है।
महाराज जी बताते हैं कि भक्त के जीवन में ये तीनों भाव आते रहते हैं। कभी अनुकूलता आती है, कभी प्रतिकूलता और कभी व्यक्ति के भीतर दीनता का भाव आता है। जब अनुकूलता मिले तो यह अनुभव होना चाहिए कि श्रीजी ने दुलार करके यह दिया है। और जब प्रतिकूलता आए तो उसमें भी श्रीजी की कृपा देखनी चाहिए। क्योंकि प्रतिकूल परिस्थिति हमारे राग और संसार से जुड़े हुए मन को कम कर सकती है।
महाराज जी के अनुसार बहुत भारी प्रतिकूलता में भी यदि कोई श्रीजी की कृपा का अनुभव कर सके तो यह बहुत ऊँचा भाव है। अपमान, निंदा, तिरस्कार या दूसरी प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी ऐसी हो सकती हैं जो मनुष्य को संसार से हटाकर भगवान की ओर ले जाएँ। इसलिए केवल सुख को ही भगवान की कृपा समझना सही नहीं है।
महाराज जी समझाते हैं कि अनुकूलता में हमारा मन संसार से जुड़ सकता है। जब धन, सम्मान, प्रतिष्ठा और मन के अनुसार सब कुछ मिलता रहता है, तब संसार अच्छा लगने लगता है और भगवान का स्मरण कम हो सकता है। लेकिन प्रतिकूलता में जब संसार का सहारा कम होता है, तब भगवान की याद अधिक आ सकती है। इस दृष्टि से प्रतिकूलता भी कृपा का रूप बन जाती है।
करुणा के विषय में महाराज जी दीनता की बात करते हैं। जब व्यक्ति अपने साधन-बल, तप-बल और बाहुबल पर भरोसा छोड़कर यह अनुभव करता है कि “मैं दीन हूँ, मेरे अंदर कोई साधन-बल नहीं, प्रभु आप ही करुणा करें”, तब वह भगवान की करुणा का अधिकारी बनता है।
इसलिए श्रीजी की दया, कृपा और करुणा को अलग-अलग शब्द मात्र न समझें। अनुकूलता में दया, प्रतिकूलता में कृपा और दैन्य में करुणा का अनुभव करना है। यही भाव जीवन की परिस्थितियों को देखने का दृष्टिकोण बदल देता है।
प्रश्न 3: आशीर्वाद, वरदान और कृपा में क्या अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का बहुत सरल और स्पष्ट अंतर बताते हैं। वे कहते हैं कि आशीर्वाद तब होता है जब हृदय प्रसन्न होकर किसी के लिए शुभ और मंगल की कामना की जाए। अर्थात किसी के प्रति हृदय में प्रसन्नता आई और उसके लिए शुभ होने की कामना की गई, तो यह आशीर्वाद है।
इसके विपरीत वरदान साधना या तपस्या के फल के रूप में मिलने वाली वस्तु है। जब कोई व्यक्ति तपस्या या साधना करता है, फिर किसी चीज की मांग करता है और उसकी मांग पूरी होती है, तो उसे वरदान कहा जा सकता है। इसमें साधना और उसकी प्राप्ति के बीच एक संबंध होता है।
लेकिन महाराज जी कृपा को इससे अलग बताते हैं। वे कहते हैं कि कृपा अहेतुकी होती है। अर्थात कृपा के पीछे कोई निश्चित सांसारिक कारण या लेन-देन नहीं होता। भगवान अपनी ओर से कृपा करते हैं। इसलिए कृपा का स्वरूप हमेशा हमारी इच्छा के अनुसार ही हो, यह आवश्यक नहीं है।
यहीं पर महाराज जी कृपा की एक बहुत महत्वपूर्ण बात बताते हैं। हम सामान्यतः सम्मान, यश, प्रतिष्ठा, धन और अपने मन के अनुसार परिस्थितियों को ही भगवान की कृपा मानते हैं। लेकिन भगवान की कृपा का स्वरूप कभी-कभी बहुत कठोर दिखाई देने वाली परिस्थिति के रूप में भी आ सकता है। महाराज जी कहते हैं कि कृपा का स्वरूप कुसुम से भी कोमल और वज्र से भी कठोर हो सकता है।
उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति के पास धन नहीं रहा, शरीर अस्वस्थ हो गया और संसार के लोग भी उससे दूर हो गए, तो यह बहुत बड़ी प्रतिकूलता दिखाई देती है। लेकिन ऐसी स्थिति में व्यक्ति के मन में भगवान की याद अधिक आ सकती है। जब संसार का सहारा कम होता है तो भगवान का आश्रय मजबूत हो सकता है। इसलिए ऐसी प्रतिकूलता को भी भगवान की कृपा के रूप में समझा जा सकता है।
महाराज जी बताते हैं कि अनुकूलता कभी-कभी जीव को संसार में बाँधती है, जबकि प्रतिकूलता उसके राग और बंधनों को काट सकती है। सम्मान, प्रतिष्ठा और धन बढ़ने पर मन संसार से जुड़ सकता है, लेकिन अपमान, निंदा, तिरस्कार और निर्धनता जैसी परिस्थितियाँ मनुष्य को भगवान की ओर मोड़ सकती हैं।
इसलिए इन तीनों में मुख्य अंतर यही है—आशीर्वाद हृदय से की गई मंगलकामना है, वरदान साधना या तपस्या के फलस्वरूप प्राप्ति है और कृपा भगवान की अहेतुकी देन है। कृपा कैसी भी परिस्थिति के रूप में आए, उसका उद्देश्य अंततः भगवान की ओर जोड़ना हो सकता है।
प्रश्न 4: पत्नी और बच्चे वृंदावन में रहना चाहते हैं, लेकिन माता-पिता नहीं आना चाहते। ऐसी स्थिति में मेरा कर्तव्य क्या है?
उत्तर:
महाराज जी इस परिस्थिति को धर्मसंकट के रूप में स्वीकार करते हैं, क्योंकि यहाँ एक ओर पत्नी और बच्चों की वृंदावन में रहने की इच्छा है और दूसरी ओर माता-पिता हैं, जो अभी अपने स्थान को छोड़ना नहीं चाहते। ऐसी स्थिति में महाराज जी सबसे पहले भगवान से प्रार्थना करने की बात कहते हैं। माता-पिता की बुद्धि बदल जाए और वे भी धाम के आश्रय को स्वीकार कर लें, इसके लिए श्रीजी से प्रार्थना करनी चाहिए।
महाराज जी पत्नी और बच्चों का वृंदावन में रहने का निर्णय धर्ममय और सुंदर बताते हैं। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि माता-पिता का पक्ष छोड़ना उचित नहीं है। यदि माता-पिता अभी सक्षम हैं और अपना काम स्वयं कर सकते हैं, तो उन्हें वहीं रहने दिया जा सकता है। लेकिन जब उनकी अवस्था ऐसी हो जाए कि उन्हें सेवा और परिचर्या की आवश्यकता हो, तब पुत्र का कर्तव्य है कि वह उनकी सेवा करे।
इस परिस्थिति में महाराज जी एक साथ दोनों पक्षों को संभालने की बात कहते हैं। यदि माता-पिता वृंदावन नहीं आना चाहते और उनकी सेवा के लिए किसी व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है, तो आवश्यकता होने पर किसी सेवक को रखकर उनकी सेवा की व्यवस्था की जा सकती है। महाराज जी कहते हैं कि दोनों कार्य करने चाहिए—पत्नी और बच्चों के वृंदावन वास का समर्थन भी और माता-पिता की सेवा भी।
महाराज जी का भाव है कि केवल इसलिए माता-पिता को छोड़ देना उचित नहीं है कि परिवार वृंदावन जाना चाहता है। दूसरी ओर केवल माता-पिता के कारण पत्नी और बच्चों की वृंदावन में रहने की धर्ममय इच्छा को भी छोड़ना आवश्यक नहीं है। विवेक से दोनों जिम्मेदारियों को निभाने का रास्ता निकालना चाहिए।
यदि माता-पिता अभी स्वस्थ और सक्षम हैं, तो वे अपनी जगह रह सकते हैं। आगे जब उनकी सेवा की वास्तविक आवश्यकता पड़े, तब उन्हें वृंदावन लाने का विचार किया जा सकता है। महाराज जी यह भी कहते हैं कि माता-पिता को वृंदावन लाने की भावना रखनी चाहिए, क्योंकि उनके अनुसार धाम का आश्रय मंगलमय है।
इसलिए इस परिस्थिति में सबसे पहले भगवान से प्रार्थना करें, फिर अपनी दोनों जिम्मेदारियों को समझें। पत्नी और बच्चों के वृंदावन वास का सहयोग करें और माता-पिता की सेवा का अधिकार एवं कर्तव्य भी न छोड़ें। यदि दोनों जगह रहना कठिन हो तो परिस्थिति के अनुसार सेवा की व्यवस्था की जा सकती है।
महाराज जी के अनुसार यही आपकी बुद्धिमत्ता होगी कि किसी एक जिम्मेदारी को छोड़ने के बजाय दोनों धर्मयुक्त पक्षों को संभालने का प्रयास करें।
प्रश्न 5: कोई आपको भजन सुनाकर या हँसाकर प्रसन्न करता है, तो मैं आपको कैसे प्रसन्न करूँ?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर बहुत गहरे भाव से देते हैं। वे बताते हैं कि कोई व्यक्ति अपनी कला दिखाकर, भजन सुनाकर, चित्रकारी करके या हँसाकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करता है, तो बाहर से ऐसा दिखाई दे सकता है कि वे बहुत प्रसन्न हो गए। लेकिन महाराज जी कहते हैं कि यह भी एक प्रकार का व्यवहार है। सामने वाला अपनी कला दिखाकर प्रसन्न करने का प्रयास कर रहा है और वे भी उसकी भावना का सम्मान करते हुए प्रसन्नता प्रकट करते हैं।
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि उनकी वास्तविक प्रसन्नता का विषय सांसारिक मनोरंजन नहीं है। हँसी-मजाक, नाटक, गाना-बजाना या कोई बाहरी कला उनकी वास्तविक प्रसन्नता का कारण नहीं है। वे कहते हैं कि उनकी प्रसन्नता का विषय प्रिय-प्रियतम, अर्थात भगवान ही हैं। इसलिए यदि कोई वास्तव में उन्हें प्रसन्न करना चाहता है, तो उसे किसी विशेष कला का प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं है।
फिर महाराज जी स्वयं बताते हैं कि उन्हें कैसे प्रसन्न किया जा सकता है—“राधा राधा राधा” नाम जप करो, अच्छे आचरण करो, खूब नाम-जप करो और जो दुख-सुख आए उसे सह लो तथा भगवान की शरण में रहो। यही देखकर वे प्रसन्न होते हैं।
महाराज जी आगे एक बहुत सुंदर बात कहते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने आपको बहुत योग्य समझकर उनके सामने अपनी योग्यता दिखाने आता है, तो इससे अहंकार बढ़ सकता है। इसके विपरीत जब कोई सच्चे भाव से कहता है कि “मैं किसी योग्य नहीं हूँ”, तो यही उनके लिए वास्तविक प्रसन्नता का विषय है। दीनता और भगवान की शरण का भाव उन्हें अधिक प्रिय है।
महाराज जी यह भी कहते हैं कि यदि भगवान ने हमें अपने पास बुलाया है, सत्संग सुनने का अवसर दिया है और वृंदावन का दर्शन कराया है, तो यह भी उनकी कृपा का संकेत है। इसलिए साधक को अपनी योग्यता दिखाने की अपेक्षा भगवान के प्रति समर्पण और दीनता बढ़ानी चाहिए।
महाराज जी की बात का सार यही है कि उन्हें खुश करने के लिए कोई विशेष कला सीखने की जरूरत नहीं है। राधा नाम का जप करें, अच्छा आचरण रखें, सुख-दुख को सहते हुए भगवान की शरण में रहें और अपने अंदर दीनता रखें। यही उनके अनुसार वास्तविक प्रसन्नता का मार्ग है।
प्रश्न 6: नामजप की अद्भुत महिमा क्या है?
उत्तर:
महाराज जी नामजप को साधना का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार बताते हैं। वे कहते हैं कि नामजप की जय-घोष में कोई भी विकार टिक नहीं सकता। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे विकार उस अंतःकरण में प्रभाव डालते हैं जो भगवान से विमुख है। लेकिन जब अंतःकरण भगवान की ओर हो जाता है और भगवान का नाम निरंतर चलता है, तब इन विकारों की शक्ति धीरे-धीरे कम होने लगती है।
महाराज जी बताते हैं कि जितना अधिक नामजप होगा, उतना ही साधक निर्विकार होता जाएगा। नामजप के साथ भगवान में विश्वास दृढ़ होता जाएगा और विश्वास दृढ़ होने पर भगवान की भक्ति हृदय में प्रेम के रूप में प्रकट होने लगेगी। जब प्रेम जागता है तो भगवान के बिना रहना कठिन होने लगता है और हृदय में उनके दर्शन की व्याकुलता उत्पन्न होती है।
महाराज जी भगवान के लिए होने वाली इस व्याकुलता को बहुत गहरी अवस्था बताते हैं। जब भगवान के रूप का चिंतन करते-करते भीतर उनके प्रत्यक्ष दर्शन की ललक जागती है, तब साधक के हृदय में रुदन शुरू हो सकता है। भगवान के लिए रोना, भगवान को पुकारना और उनके दर्शन की लालसा में व्याकुल होना भक्ति के गहरे भाव से जुड़ा हुआ है।
महाराज जी कहते हैं कि भगवान के लिए ऐसी विकलता से भरा हुआ अंतःकरण इतना पवित्र हो सकता है कि उसमें विषयों की ओर जाने वाली वृत्तियाँ कमजोर पड़ने लगती हैं। वे इसे ऐसे समझाते हैं जैसे भुना हुआ दाना दोबारा अंकुरित नहीं हो सकता। उसी प्रकार जब हृदय में भगवत्-अनुराग गहराई से भर जाता है, तब विषयों का आकर्षण धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात महाराज जी अंत में कहते हैं कि भगवान के नामजप के अलावा कोई दूसरा साधन नहीं है, ऐसा वे अपने कथन में जोर देकर बताते हैं। तत्वबोध चाहिए तो नामजप करो, भगवत्प्रेम चाहिए तो नामजप करो। साथ ही भगवान की लीला और कथा सुनने, प्रपंच से रहित भगवत्-विषयक बातें सुनने और महापुरुषों के चरणों की रज का आश्रय लेने की बात भी कहते हैं।
नामजप के साथ यह भी जरूरी है कि संसार का चिंतन कम हो और भगवान का चिंतन छूटे नहीं। महाराज जी के अनुसार जब भगवान का थोड़ा-सा भी स्मरण होते ही भीतर व्याकुलता आने लगे और जीवन के आचरण भगवान को समर्पित होने लगें, तब प्रेम का प्रादुर्भाव होता है।
इसलिए नामजप केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि महाराज जी के अनुसार भगवान से जुड़ने, विकारों से ऊपर उठने, विश्वास को दृढ़ करने और अंततः भगवत्प्रेम की ओर बढ़ने का मुख्य साधन है। लगातार नामजप करते रहना ही इसका मूल भाव है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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