प्रश्न 1: महाराज जी,बिना अर्थ समझे पाठ करने से क्या फल मिलता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान का नाम, शास्त्र और स्तोत्र इतने दिव्य होते हैं कि उनका प्रभाव केवल बुद्धि से समझने पर ही नहीं, बल्कि श्रद्धा से उच्चारण करने पर भी पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति रामायण, गीता, भागवत या किसी स्तोत्र का पाठ करता है और उसका पूरा अर्थ नहीं समझता, तब भी उसका कल्याण होता है।
महाराज जी कहते हैं कि जब हम किसी दिव्य ग्रंथ का पाठ करते हैं, तो उस ग्रंथ के रचयिता, उसे प्रकट करने वाले ऋषि-मुनि और स्वयं भगवान प्रसन्न होते हैं। जैसे रामायण का पाठ करने से गोस्वामी तुलसीदास जी, महर्षि वाल्मीकि और भगवान श्रीराम की कृपा प्राप्त होती है।
शुरुआत में भले अर्थ समझ में न आए, लेकिन निरंतर पाठ करने से धीरे-धीरे बुद्धि निर्मल होने लगती है। अंतःकरण शुद्ध होने पर वही श्लोक और चौपाइयाँ भीतर उतरने लगती हैं।
महाराज जी समझाते हैं कि जैसे बच्चा पहले अक्षर नहीं समझता लेकिन पढ़ते-पढ़ते ज्ञान आ जाता है, वैसे ही शास्त्र पाठ का प्रभाव धीरे-धीरे प्रकट होता है।
इसलिए पाठ को केवल “समझने” तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि श्रद्धा और विश्वास के साथ नियमित रूप से करना चाहिए। भगवान भावना देखते हैं। यदि भाव सच्चा है, तो बिना अर्थ समझे भी पाठ साधक के जीवन में मंगल, शांति और आध्यात्मिक उन्नति लाता है।
प्रश्न 2: द्वंद की स्थिति में क्या करना चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जीवन में कई बार ऐसी स्थिति आती है जब मन कहता है कि “जो हो रहा है, वह भगवान की इच्छा है”, लेकिन बुद्धि समाधान ढूंढने लगती है। यही द्वंद मनुष्य को बेचैन करता है।
ऐसी स्थिति में सबसे पहले भगवान पर भरोसा रखना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति बिना मांगे सहायता करने आता है, तो उसे भगवान की प्रेरणा मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए। लेकिन हर समस्या में तुरंत संसार का आश्रय लेना उचित नहीं है।
महाराज जी कहते हैं कि जब साधक बार-बार मनुष्य, धन या बाहरी साधनों पर निर्भर होने लगता है, तब उसकी भक्ति कमजोर होने लगती है। इसलिए मुख्य आधार भगवान को रखना चाहिए और संसार को गौण।
यदि हम भगवान के भरोसे रहकर नाम-जप करते हैं, तो धीरे-धीरे विपत्ति स्वयं दूर होने लगती है। भगवान भीतर से मार्गदर्शन भी करते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति कर्तव्य छोड़ दे, बल्कि कर्तव्य करते हुए मन को भगवान में स्थिर रखना चाहिए।
महाराज जी समझाते हैं कि भरोसे में बहुत शक्ति है। जो साधक सच्चे भाव से भगवान पर निर्भर हो जाता है, उसका हृदय भगवत भाव से भरने लगता है और भीतर की वासनाएँ समाप्त होने लगती हैं।
इसलिए द्वंद की स्थिति में घबराने के बजाय भगवान का आश्रय लेकर शांत मन से आगे बढ़ना चाहिए।
प्रश्न 3: कर्ता और भोक्ता भाव कैसे समाप्त होगा?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि “मैं करता हूँ” और “मैं भोगता हूँ” — यही देहाभिमान का मूल है। जब तक मनुष्य स्वयं को शरीर मानता रहेगा, तब तक कर्ता और भोक्ता भाव बना रहेगा। इसी कारण जन्म-मृत्यु और सुख-दुख का बंधन चलता रहता है।
इस भाव को समाप्त करने के लिए साधना आवश्यक है। केवल सुन लेने या पढ़ लेने से देहाभिमान समाप्त नहीं होता। महाराज जी कहते हैं कि किसी सिद्ध संत या सद्गुरु की शरण लेकर उनके बताए मार्ग पर दीर्घकाल तक चलना पड़ता है।
जब साधक नियमित नाम-जप, शास्त्र अध्ययन और भगवान को कर्म समर्पण करता है, तब धीरे-धीरे उसका मन और बुद्धि शुद्ध होने लगते हैं।
महाराज जी कहते हैं कि सुबह से रात तक जो भी कर्म करें, उसे “कृष्णार्पणमस्तु” भाव से करें। भोजन भी भगवान को अर्पित करके प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
धीरे-धीरे साधक अनुभव करने लगता है कि “मैं कुछ नहीं कर रहा, सब भगवान करा रहे हैं।”
यही अवस्था कर्ताभाव के गलने की शुरुआत है। जब यह अनुभव स्थिर हो जाता है, तब देहाभिमान मिटने लगता है और साधक मोक्ष या प्रेम की अवस्था की ओर बढ़ता है।
इसलिए समाधान है—सद्गुरु की शरण, नाम-जप और कर्म समर्पण।
प्रश्न 4: मन नाम-जप छोड़कर नई साधनाएँ क्यों ढूंढता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मन का स्वभाव चंचल है। वह सरल और सीधी साधना में टिकना नहीं चाहता, इसलिए बार-बार नई-नई साधनाएँ खोजता रहता है। कभी दान, कभी पुण्य, कभी बाहरी कर्म—लेकिन नाम-जप में स्थिर नहीं होता।
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि बिना नाम-जप के बाकी सभी साधन अधूरे हैं। दान-पुण्य यदि अहंकार से किया जाए तो वह केवल पुण्य देता है, लेकिन भगवान की प्राप्ति नहीं।
यदि वही कर्म “भगवत समर्पण” भाव से किया जाए, तो वह सेवा बन जाता है।
महाराज जी कहते हैं कि जब भी कोई सेवा या दान करें, यह भाव रखें—“हे प्रभु, यह सब आपका ही दिया हुआ है, मैं आपको ही अर्पित कर रहा हूँ।”
इससे कर्ताभाव कम होने लगता है और मन शुद्ध होता है।
नाम-जप मन को धीरे-धीरे स्थिर करता है। प्रारंभ में मन भागेगा, लेकिन निरंतर जप से उसका आकर्षण भगवान की ओर बढ़ने लगता है।
इसलिए नई-नई साधनाओं में उलझने के बजाय एक नाम को दृढ़ता से पकड़ना चाहिए। यही साधक को भीतर से बदल देता है।
प्रश्न 5: सत्य मार्गियों के जीवन में कठोर परिस्थितियाँ क्यों आती हैं?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जो व्यक्ति सच्चे भाव से भगवान की ओर बढ़ता है, उसके जीवन में कई बार कठिन परिस्थितियाँ आती हैं। इसका कारण यह नहीं कि भगवान उससे नाराज हैं, बल्कि यह कि उसके पुराने कर्मों का शुद्धिकरण हो रहा होता है।
महापुरुषों और संतों ने भी जीवन में बड़े-बड़े कष्ट सहे हैं। लेकिन उन कष्टों ने उनकी भक्ति को कमजोर नहीं किया, बल्कि और प्रखर बना दिया।
महाराज जी कहते हैं कि जैसे सोने को अग्नि में तपाने से उसका तेज बढ़ता है, वैसे ही भक्त विपत्तियों से भीतर से और मजबूत हो जाता है।
यदि साधक हर परिस्थिति को भगवान की कृपा मानकर स्वीकार करे, तो उसका विश्वास दृढ़ होता जाता है।
विपत्ति का उद्देश्य साधक को तोड़ना नहीं, बल्कि उसे संसार से हटाकर भगवान में स्थिर करना होता है।
इसलिए कठिन समय में शिकायत नहीं करनी चाहिए। नाम-जप करते हुए धैर्य रखना चाहिए।
महाराज जी कहते हैं कि भगवान जो करते हैं, अंततः भक्त के कल्याण के लिए ही करते हैं। यही भाव साधक को कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर रखता है।
प्रश्न 6: क्या श्रवण, कीर्तन और स्मरण से भगवत प्राप्ति हो सकती है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि नवधा भक्ति में से यदि एक भी भक्ति सच्चे भाव से आ जाए, तो भगवान की प्राप्ति संभव है। यदि श्रवण, कीर्तन और स्मरण तीनों साथ चल रहे हैं, तो साधक बहुत सौभाग्यशाली है।
शास्त्रों में अनेक उदाहरण हैं जहाँ केवल एक भक्ति ने ही साधकों को भगवान तक पहुँचा दिया। धुंधकारी ने केवल भागवत श्रवण से मुक्ति प्राप्त की। ब्रज की ब्राह्मण पत्नियों ने केवल भगवान की कथा सुनकर भगवत प्रेम प्राप्त किया।
महाराज जी कहते हैं कि जब साधक नियमित रूप से भगवान की कथा सुनता है, नाम-कीर्तन करता है और हर समय स्मरण रखता है, तो धीरे-धीरे बाकी भक्ति रूप अपने आप जागृत होने लगते हैं।
श्रवण से ज्ञान आता है, कीर्तन से मन शुद्ध होता है और स्मरण से भगवान से संबंध गहरा होता है।
यदि इन तीनों में स्थिरता आ जाए, तो साधक का जीवन भगवान की ओर तेजी से बढ़ने लगता है।
इसलिए चिंता नहीं करनी चाहिए कि आगे क्या होगा। भक्ति का एक कदम भी सच्चे भाव से उठाया जाए, तो भगवान स्वयं आगे का मार्ग खोल देते हैं।
प्रश्न 7: भक्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है? क्या पूजा, दान-पुण्य और तीर्थ ही भक्ति हैं?
उत्तर:
Premanand Ji Maharaj बताते हैं कि सामान्यतः लोग भक्ति को केवल पूजा, आरती, तीर्थ यात्रा या दान-पुण्य तक सीमित समझ लेते हैं, लेकिन वास्तविक भक्ति इससे कहीं अधिक गहरी अवस्था है।
महाराज जी कहते हैं कि अगरबत्ती लगा देना, थोड़ा-सा पाठ कर लेना या मंदिर चले जाना धार्मिक कर्म हो सकते हैं, परंतु इन्हें ही पूर्ण भक्ति नहीं कहा जा सकता। भक्ति का वास्तविक स्वरूप है—हर समय भगवान का स्मरण और अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित कर देना।
देवर्षि नारद का उदाहरण देते हुए महाराज जी बताते हैं कि भक्ति वही है जिसमें साधक एक क्षण के लिए भी भगवान को भूलना न चाहे। उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते उसके भीतर भगवान का नाम और स्मरण चलता रहे।
साथ ही, जो भी कर्म किए जाएँ—घर, परिवार, नौकरी या सेवा—उन्हें “कृष्णार्पणमस्तु” भाव से भगवान को अर्पित किया जाए।
महाराज जी कहते हैं कि जब जीवन का प्रत्येक कार्य भगवान के लिए होने लगे और मन निरंतर भगवान में लगा रहे, तभी सच्ची भक्ति प्रारंभ होती है।
इसलिए भक्ति केवल बाहरी कर्म नहीं, बल्कि भीतर की अखंड स्मृति और समर्पण की अवस्था है।
प्रश्न 8: मृत्यु को महोत्सव कैसे बनाया जा सकता है?
उत्तर:
महाराज Ji बताते हैं कि सामान्य मनुष्य मृत्यु से डरता है, क्योंकि उसे अपने शरीर, परिवार और संसार से गहरा मोह होता है। जब तक भगवान से प्रेम नहीं होता, तब तक मृत्यु भयावह लगती है।
लेकिन जिस साधक को भगवान का अनुभव हो जाता है और जिसका मन भगवान के प्रेम में डूब जाता है, उसके लिए मृत्यु भय नहीं रहती। वह मृत्यु को भगवान से मिलने का अवसर समझता है।
महाराज जी कहते हैं कि जब साधक निरंतर नाम-जप करता है, भगवान की रूप माधुरी में आसक्त हो जाता है और उसके भीतर भगवत प्रेम जागृत हो जाता है, तब उसके मन में यह भाव आने लगता है—“कब यह शरीर छूटे और मैं पूर्ण परमानंद स्वरूप भगवान को प्राप्त करूँ।”
ऐसे भक्त के लिए मृत्यु अंत नहीं, बल्कि परम मिलन का उत्सव बन जाती है।
महाराज जी समझाते हैं कि यह अवस्था केवल ज्ञान से नहीं आती, बल्कि निरंतर भजन, समर्पण और भगवान के प्रति प्रेम से आती है।
इसलिए यदि मृत्यु को महोत्सव बनाना है, तो अभी से भगवान के नाम में लगना होगा। जब जीवन भगवान में बीतेगा, तब मृत्यु भी आनंदमय हो जाएगी।
प्रश्न 9: युवाओं को नशा और गलत आदतों से कैसे बचाया जाए?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि आज समाज की सबसे बड़ी समस्या है—युवाओं का नशा, व्यभिचार और गलत आदतों की ओर बढ़ना। यदि युवा पीढ़ी गलत दिशा में चली गई, तो समाज और राष्ट्र दोनों कमजोर हो जाएंगे।
महाराज जी कहते हैं कि नशा केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और चरित्र को भी नष्ट कर देता है। इसके कारण चोरी, हिंसा, झूठ, व्यभिचार और अपराध बढ़ते हैं।
इसलिए बच्चों और युवाओं को बचपन से ही सही संस्कार देना अत्यंत आवश्यक है। माता-पिता, शिक्षक और समाज सभी की जिम्मेदारी है कि वे युवाओं को अध्यात्म, सात्विक जीवन और अनुशासन की शिक्षा दें।
महाराज जी विशेष रूप से कहते हैं कि खान-पान की शुद्धता, व्यायाम और सत्संग युवाओं को मजबूत बनाते हैं।
यदि युवाओं का मन भगवान के नाम में लग जाए, तो वे गलत आदतों से स्वतः दूर हो जाते हैं।
महाराज जी कहते हैं कि बिना अध्यात्म के समाज का सुधार संभव नहीं है। इसलिए युवाओं को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि भक्ति और नैतिकता की शिक्षा भी देना आवश्यक है।
प्रश्न 10: मौन रहने पर भी भीतर विचार क्यों चलते रहते हैं? इंद्रियों को अंतर्मुख कैसे करें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि केवल वाणी को रोक देना वास्तविक मौन नहीं है। यदि बाहर से व्यक्ति चुप बैठा है लेकिन भीतर संसार, चिंता और प्रपंच के विचार चल रहे हैं, तो वह मौन अधूरा है।
सच्चा मौन तब होता है जब मन भगवान में स्थिर हो जाए और भीतर नाम-जप चलता रहे।
महाराज जी कहते हैं कि यदि मौन रहने पर भी मन भाग रहा है, तो वाणी से भगवान का नाम लेना शुरू कर देना चाहिए। “राधे-राधे”, “राम-राम” या हरिनाम का कीर्तन मन को तुरंत शांत करने लगता है।
वे समझाते हैं कि यदि केवल बोलना बंद करने से भगवान मिल जाते, तो जो लोग जन्म से बोल नहीं सकते, वे सभी सिद्ध हो जाते। इसलिए मौन का उद्देश्य है—प्रपंच को रोककर भगवान में मन लगाना।
महाराज जी कहते हैं कि इंद्रियों को अंतर्मुख करने का सबसे सरल उपाय है—नाम-जप।
जब साधक निरंतर जप करता है, तो धीरे-धीरे मन संसार से हटकर भीतर भगवान में स्थिर होने लगता है।
यही वास्तविक मौन और अंतर्मुखता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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