माला-1239: काम क्या है? इस पर विजय कैसे पाई जाए?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,काम क्या है? इस पर विजय कैसे पाई जाए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि काम कोई बाहरी वस्तु नहीं है, बल्कि यह मन की एक प्रवृत्ति है। जब मनुष्य भगवान का चिंतन छोड़कर विषयों का चिंतन करता है, तो विषयों के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है। उस आसक्ति को भोगने की इच्छा ही काम कहलाती है।

काम की जड़ “विषय चिंतन” है। जब मन खाली रहता है और भगवान का स्मरण नहीं करता, तब वह विषयों की ओर भागता है और वहीं से काम, क्रोध, लोभ आदि दोष उत्पन्न होते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि काम पर विजय पाने का एक ही उपाय है — भगवान का नाम-जप और सत्संग। यदि मन भगवान के नाम में लग गया तो काम स्वतः समाप्त हो जाता है।

साथ ही कुसंग से बचना, अशुद्ध दृश्य, अशुद्ध वार्ता और अशुद्ध भोजन से दूर रहना भी आवश्यक है।

जब मन भगवान के आनंद से भर जाता है, तब वह विषयों की ओर आकर्षित नहीं होता। इसलिए काम विजय का मूल उपाय है — नाम, सत्संग और पवित्र जीवन


प्रश्न 2: क्या सच्ची भक्ति में त्याग आवश्यक है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भक्ति में बाहरी त्याग से अधिक महत्वपूर्ण मन का त्याग है। यदि कोई व्यक्ति जंगल में चला जाए लेकिन उसका मन विषयों में ही लगा रहे, तो वह सच्चा त्याग नहीं है।

सच्चा त्याग वह है जिसमें मन भगवान के चिंतन में स्थित हो जाए और संसार के विषयों में रुचि समाप्त हो जाए।

महाराज जी कहते हैं कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति त्यागी हो सकता है, यदि उसका मन भगवान में लगा हो।

जब मन प्रभु के चरणों में लग जाता है, तब संसार के भोग विष के समान लगने लगते हैं। यही सच्ची वैराग्य की अवस्था है।

इसलिए भक्ति में त्याग का अर्थ संसार छोड़ना नहीं बल्कि मन को भगवान में लगाना है।


प्रश्न 3: ज्ञान मार्ग से प्रेम मार्ग पर चलना कितना कठिन है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि ज्ञान मार्ग से प्रेम मार्ग पर आना अत्यंत कठिन होता है। ज्ञान मार्ग में साधक “मैं ब्रह्म हूँ” का अनुभव करता है, जिससे उसमें एक प्रकार का तत्त्वज्ञान और स्थिरता आती है।

लेकिन प्रेम मार्ग में भगवान के प्रति समर्पण, भाव और भक्ति की आवश्यकता होती है, जो ज्ञान मार्ग से भिन्न है।

महाराज जी कहते हैं कि विषयों में लगे व्यक्ति को भक्त बनाना आसान है, लेकिन ज्ञान मार्ग में स्थिर व्यक्ति को प्रेम मार्ग में लाना कठिन होता है।

हालांकि गुरु कृपा से यह भी संभव हो जाता है। जब गुरु की कृपा होती है तो असंभव भी संभव हो जाता है।

अंततः प्रेम मार्ग में आने पर मन केवल भगवान के प्रेम में स्थिर हो जाता है और इधर-उधर नहीं भटकता।


प्रश्न 4: कौन साधक परमात्मा के चिदानंद स्वरूप का अनुभव कर सकता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि वही साधक परमात्मा के चिदानंद स्वरूप का अनुभव कर सकता है जो निरंतर भजन करता है, सत्संग करता है और विषयों का त्याग करता है।

ऐसा साधक अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित कर देता है। वह जो भी करता है, भगवान के लिए करता है — चाहे वह व्यापार हो, सेवा हो या कोई अन्य कार्य।

जब साधक निरंतर नाम-जप करता है और भगवान के प्रति व्याकुल हो जाता है, तब उसके भीतर भगवान के दर्शन की तीव्र इच्छा उत्पन्न होती है।

महाराज जी कहते हैं कि जब यह व्याकुलता चरम पर पहुँचती है, तब भगवान का साक्षात्कार होता है।

इसलिए चिदानंद स्वरूप का अनुभव केवल भजन, समर्पण और गुरु कृपा से ही संभव है।


प्रश्न 5: कंचन, कामिनी और कीर्ति से कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि इन तीनों से बचने का सबसे बड़ा उपाय है — भगवान के नाम में रुचि उत्पन्न करना

जब मनुष्य को भगवान के नाम, रूप और लीला में आनंद आने लगता है, तब उसे धन, वासना और यश में रुचि नहीं रहती।

यदि कभी ये विषय सामने भी आते हैं तो भगवान स्वयं अपने भक्त की रक्षा करते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान अपने शरणागत भक्त की वैसे ही रक्षा करते हैं जैसे माता अपने बच्चे की करती है।

इसलिए साधक को भगवान की शरण में रहकर निरंतर नाम-जप करना चाहिए।


प्रश्न 6: गंगा स्नान और व्रत से पाप नष्ट होने का सही अर्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि पाप और पाप की प्रवृत्ति अलग-अलग चीजें हैं। गंगा स्नान या व्रत से पाप तो नष्ट हो सकते हैं, लेकिन यदि पाप करने की प्रवृत्ति नहीं बदली तो मनुष्य फिर वही पाप करेगा।

इसलिए केवल बाहरी उपाय पर्याप्त नहीं हैं।

महाराज जी बताते हैं कि संत समागम सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि वह पाप की प्रवृत्ति को ही समाप्त कर देता है।

जब साधक संतों का संग करता है और भगवान के नाम में लग जाता है, तब उसके भीतर से पाप करने की इच्छा समाप्त हो जाती है।

यही वास्तविक शुद्धि है।


प्रश्न 7: स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति कौन होता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सामान्य मनुष्य की बुद्धि तीन गुणों — सत्व, रज और तम — के प्रभाव में चंचल रहती है।

लेकिन जो साधक भगवान का भजन करते-करते त्रिगुणातीत हो जाता है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।

ऐसा व्यक्ति हर परिस्थिति में शांत और प्रसन्न रहता है। उसकी बुद्धि भगवान में स्थित होती है और संसार के उतार-चढ़ाव उसे विचलित नहीं करते।

महाराज जी कहते हैं कि स्थिर बुद्धि वही है जो भगवान में समर्पित हो गई हो।


प्रश्न 8: शरणागति का भाव स्थिर कैसे रहे?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रतिकूल परिस्थितियों में मनुष्य भगवान की शरण में चला जाता है, लेकिन अनुकूलता आने पर वह भगवान को भूल जाता है।

इसका कारण है कि मन भोगों में लग जाता है।

यदि साधक अनुकूल परिस्थितियों का भोग न करे और निरंतर भजन करता रहे, तो उसकी शरणागति स्थिर रह सकती है।

महाराज जी कहते हैं कि भजन ही वह साधन है जो साधक को स्थिर बनाता है।


प्रश्न 9: अंतिम अवस्था के मरीज के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मरीज के सामने उसकी स्थिति का भय उत्पन्न नहीं करना चाहिए। उससे मुस्कुराकर मिलना चाहिए और उसे आशा देनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसे भगवान का नाम जपने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

यदि अंतिम समय में भी भगवान का नाम सुन लिया जाए, तो उसका बहुत बड़ा लाभ होता है।

इसलिए डॉक्टर और परिजन दोनों को चाहिए कि मरीज के मन को शांत रखें और उसे भगवान के स्मरण में लगाएँ।


प्रश्न 10: शरणागति में कलंक क्या है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि शरणागति में सबसे बड़ा कलंक है — अपनी चिंता करना

यदि हम भगवान की शरण में हैं, तो हमें विश्वास होना चाहिए कि भगवान हमारा पालन करेंगे।

दूसरा कलंक है किसी अन्य व्यक्ति पर भरोसा करना और भगवान पर विश्वास न रखना।

सच्ची शरणागति में केवल भगवान पर ही भरोसा होना चाहिए।


प्रश्न 11: शरणागति के लक्षण क्या हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सच्चा शरणागत व्यक्ति हर परिस्थिति में भगवान की कृपा देखता है — चाहे वह सुख हो या दुख।

उसका मन हमेशा प्रसन्न रहता है और वह भगवान के नाम में लगा रहता है।

वह न तो भयभीत होता है और न ही चिंतित।

संतों का संग और नाम-जप शरणागति को पुष्ट करते हैं।

जब मन केवल भगवान के चिंतन में लग जाए और अन्य किसी चीज में रुचि न रहे, तब समझना चाहिए कि शरणागति पूर्ण हो गई है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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