माला-1212:क्या मृत्यु का समय पहले से तय होता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: गुरु अपराध क्या है और इससे कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि गुरु ही साधक को नाम, मंत्र, भजन और भगवान तक पहुँचने का मार्ग प्रदान करते हैं। इसलिए गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण भक्ति का आधार है। गुरु अपराध का अर्थ है गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करना, गुरु की निंदा करना, गुरु में दोष देखना या गुरु की अवज्ञा करना। जब साधक ऐसा करता है तो उसका भजन निष्फल हो जाता है, क्योंकि जिस स्रोत से भजन प्राप्त हुआ उसी के प्रति अविश्वास हो गया।

महाराज जी कहते हैं कि साधक को गुरु को केवल साधारण व्यक्ति नहीं समझना चाहिए, बल्कि उनमें परमात्मा की कृपा का माध्यम देखना चाहिए। यदि गुरु में दोष देखने की आदत बन गई तो साधक का मन कभी स्थिर नहीं होगा।

इससे बचने का उपाय है विनम्रता, आज्ञापालन और गुरु के उपदेशों का पालन। गुरु के प्रति श्रद्धा रखने से साधना का मार्ग पुष्ट होता है और भक्ति में प्रगति होती है।


प्रश्न 2: क्या भगवान आज भी अपने भक्तों की सेवा करने पृथ्वी पर आते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान अपने भक्तों से अत्यंत प्रेम करते हैं। जैसे भक्त भगवान की सेवा करता है, वैसे ही भगवान भी कभी-कभी अपने भक्त की सेवा करने के लिए साधारण रूप में प्रकट हो जाते हैं। कई भक्त चरित्रों में यह वर्णन मिलता है कि भगवान ने नौकर, सेवक या साधारण व्यक्ति का रूप लेकर अपने भक्तों की सेवा की।

लेकिन अक्सर भक्त पहचान नहीं पाते कि उनके बीच जो व्यक्ति है वही भगवान हैं। भगवान अपनी लीला को छिपाकर रखते हैं। जब तक भगवान स्वयं प्रकट न करें तब तक साधारण मनुष्य उन्हें पहचान नहीं सकता।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान हर जीव में परमात्मा रूप से उपस्थित हैं। यदि हम भक्तों की सेवा करें और सबमें भगवान का भाव रखें तो वही भगवान की सेवा है। भक्तों की सेवा से भगवान बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं।


प्रश्न 3: भगवत प्राप्ति का उत्साह बार-बार कम क्यों हो जाता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जब साधक भक्ति का मार्ग अपनाता है तो शुरुआत में उसके भीतर बहुत उत्साह होता है। लेकिन यदि वह विषय-भोगों का चिंतन करता है, कुसंग में पड़ता है या अपवित्र आचरण करता है तो उसका उत्साह धीरे-धीरे कम होने लगता है।

विषय-चिंतन मन को संसार की ओर खींचता है। जब मन भोगों की ओर जाता है तो भजन में रुचि कम हो जाती है। यही कारण है कि साधक को कभी-कभी भक्ति में सूखापन महसूस होता है।

महाराज जी कहते हैं कि इसका उपाय है सत्संग, नाम-जप और पवित्र आचरण। यदि साधक नियमित रूप से भगवान का नाम जप करे और कुसंग से दूर रहे तो भक्ति का उत्साह फिर से जागृत हो जाता है।

भक्ति मार्ग पवित्रता का मार्ग है। जितना मन शुद्ध होगा, उतना ही भगवान के स्मरण में आनंद अनुभव होगा।


प्रश्न 4: क्या मृत्यु का समय पहले से तय होता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जीवन में सुख और दुख मुख्य रूप से प्रारब्ध कर्मों के अनुसार आते हैं। जन्म, जीवन की परिस्थितियाँ और कई घटनाएँ प्रारब्ध से निर्धारित होती हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। मनुष्य को पुरुषार्थ करने की स्वतंत्रता भी मिली है। उपचार करना, अच्छे कर्म करना, धर्म का पालन करना—ये सब मनुष्य के पुरुषार्थ में आते हैं।

महाराज जी बताते हैं कि प्रारब्ध हमें सुख-दुख देता है, लेकिन भगवान की प्रेरणा हमें सत्संग, तीर्थ, भजन और धर्म के मार्ग पर ले जाती है।

इसलिए मनुष्य को यह समझना चाहिए कि जीवन में जो भी परिस्थितियाँ आएँ, उनमें भगवान का स्मरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।


प्रश्न 5: मृत्यु के समय भगवान का नाम सुनने का क्या प्रभाव होता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जीवन का अंतिम समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। उस समय यदि भगवान का नाम, कीर्तन या शास्त्र वाणी कानों में पड़ जाए तो वह आत्मा के लिए अत्यंत मंगलकारी होता है।

यदि किसी व्यक्ति के शरीर पर पवित्र धाम की रज लग जाए, चरणामृत मिल जाए या भगवान का नाम सुनाई दे तो उसका आध्यात्मिक कल्याण होता है। यह सब भगवान की विशेष कृपा का संकेत है।

महाराज जी बताते हैं कि शरीर तो नश्वर है, लेकिन आत्मा की यात्रा आगे चलती रहती है। इसलिए अंतिम समय में भगवान का स्मरण आत्मा की उन्नति में सहायक होता है।

इसलिए जीवन भर नाम-जप का अभ्यास करना चाहिए ताकि अंतिम समय में भी भगवान का नाम सहज रूप से स्मरण हो सके।


प्रश्न 6: कर्तव्य और परिवार में किसे प्राथमिकता देनी चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि कर्तव्य और परिवार अलग-अलग नहीं हैं। परिवार के प्रति जो जिम्मेदारियाँ हैं, वही मनुष्य के कर्तव्य का हिस्सा हैं। माता-पिता की सेवा करना, पत्नी-पुत्र का पालन-पोषण करना और धर्मपूर्वक धन कमाकर परिवार का भरण-पोषण करना—ये सब कर्तव्य हैं।

कई बार कर्तव्य निभाने के लिए व्यक्ति को घर से दूर रहना पड़ता है, जैसे नौकरी या व्यापार के कारण। लेकिन यदि वह अपने कर्तव्य का पालन कर रहा है तो यह भी धर्म का पालन है।

महाराज जी बताते हैं कि यदि मनुष्य केवल मोह में पड़ जाए तो वह कर्तव्य नहीं निभा पाएगा। इसलिए कर्तव्य की प्रधानता रखनी चाहिए और भगवान का स्मरण करते हुए अपने दायित्वों का पालन करना चाहिए।


प्रश्न 7: क्या कर्मयोग, भक्ति योग और सांख्य योग में से एक ही मार्ग अपनाना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि ये तीनों मार्ग भगवान तक पहुँचने के साधन हैं, लेकिन साधक को एक मार्ग को दृढ़ता से अपनाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति हर समय मार्ग बदलता रहेगा तो वह किसी भी मार्ग में स्थिर नहीं हो पाएगा।

कर्मयोग में मनुष्य अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित करता है। भक्ति योग में प्रेम और भजन के द्वारा भगवान की उपासना की जाती है। सांख्य योग में आत्म-तत्व का चिंतन करके ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

महाराज जी कहते हैं कि जो मार्ग मन को अनुकूल लगे, उसी में स्थिर होकर भगवान का स्मरण करना चाहिए। स्थिरता ही साधना की सफलता का आधार है।


प्रश्न 8: क्या एक व्यक्ति एक साथ कई योग मार्गों पर चल सकता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि अनेक मार्गों की जानकारी होना अच्छी बात है, लेकिन साधना के लिए एक ही मार्ग पर दृढ़ता से चलना चाहिए। यदि साधक बार-बार मार्ग बदलता रहेगा तो उसका मन भ्रमित हो जाएगा।

जैसे कोई व्यक्ति जंगल में पहुँच जाए और कई रास्तों में उलझ जाए तो वह भटक सकता है। लेकिन यदि वह एक रास्ता पकड़कर चलता रहे तो अंततः बाहर निकल सकता है।

इसी प्रकार साधक को भी एक मार्ग अपनाकर उसी पर दृढ़ता से चलना चाहिए।


प्रश्न 9: आत्मबोध और नाम जप में क्या संबंध है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि नाम-जप से मन शुद्ध होता है। जब मन शुद्ध हो जाता है तो विवेक उत्पन्न होता है और विवेक से वैराग्य आता है।

वैराग्य दृढ़ होने पर आत्म-ज्ञान प्रकट होता है और साधक अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है।

इस प्रकार नाम-जप ही अंततः आत्मबोध की ओर ले जाता है।

प्रश्न 10: सच्चे प्रेम की पहचान क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संसार में जो अधिकांश प्रेम दिखाई देता है वह वास्तव में स्वार्थ पर आधारित होता है। मनुष्य कहता है कि “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ”, लेकिन उसके भीतर कहीं न कहीं अपेक्षा होती है कि सामने वाला भी उसे उतना ही प्रेम दे, उसकी इच्छाएँ पूरी करे और उसे सुख दे। यह प्रेम नहीं बल्कि स्वार्थ है।

सच्चा प्रेम वह है जिसमें लेने की इच्छा नहीं होती बल्कि देने की भावना होती है। प्रेमी अपने प्रिय के सुख के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर सकता है। प्रेम में त्याग, समर्पण और बलिदान होता है।

महाराज जी कहते हैं कि भगवत प्रेम सबसे शुद्ध प्रेम है। इसमें कोई अपेक्षा नहीं होती। भक्त केवल भगवान को चाहता है, भगवान से कुछ मांगता नहीं। जब मनुष्य की स्थिति ऐसी हो जाए कि उसे भगवान के अतिरिक्त किसी वस्तु की आवश्यकता न लगे, तब समझना चाहिए कि उसके हृदय में वास्तविक प्रेम प्रकट हुआ है।


प्रश्न 11: कैसे पता चले कि हमारा भगवान से प्रेम सच्चा है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यदि मनुष्य को भगवान से सच्चा प्रेम हो जाए तो संसार के संबंधों का मोह धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने परिवार से घृणा करने लगे, बल्कि उसके भीतर यह भावना जागृत हो जाती है कि वास्तविक संबंध केवल भगवान से है।

जब जीवन में सुख-दुख आते हैं और तब भी साधक का मन भगवान के स्मरण से नहीं हटता, तब यह सच्चे प्रेम का संकेत है। यदि प्रियजन का वियोग भी हो जाए और फिर भी भगवान के प्रति श्रद्धा और प्रेम बना रहे, तो यह उच्च अवस्था है।

महाराज जी कहते हैं कि शुरुआत में प्रेम का भाव झूठा या अभ्यास से भी हो सकता है। यदि साधक बार-बार भगवान से कहे कि “प्रभु आप ही मेरे सब कुछ हैं”, तो धीरे-धीरे यह भाव वास्तविक हो जाता है। अभ्यास से ही प्रेम दृढ़ होता है।


प्रश्न 12: यदि भजन में मन नहीं लगता तो क्या करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भजन में मन न लगना साधकों के जीवन में सामान्य बात है। मन स्वभाव से चंचल है और बार-बार संसार की ओर भागता है।

ऐसी स्थिति में भजन छोड़ देना समाधान नहीं है। साधक को अभ्यास जारी रखना चाहिए। यदि शांत बैठकर भजन नहीं हो पा रहा हो तो कीर्तन करना चाहिए, सत्संग सुनना चाहिए या भगवान का नाम ऊँचे स्वर में जपना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि जैसे बादल आते-जाते रहते हैं, वैसे ही मन की अवस्थाएँ भी बदलती रहती हैं। थोड़ी देर बाद मन फिर शांत हो जाता है और भजन में रुचि बढ़ने लगती है।

इसलिए साधक को धैर्य रखना चाहिए और निरंतर नाम-जप का अभ्यास करना चाहिए। धीरे-धीरे मन भगवान के स्मरण में स्थिर होने लगता है।


प्रश्न 13: भगवान का नाम जप क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान का नाम स्वयं भगवान का स्वरूप है। नाम-जप से मन शुद्ध होता है और पापों का नाश होता है। जब मन शुद्ध हो जाता है तो उसमें विवेक और वैराग्य उत्पन्न होता है।

नाम-जप के बिना मन संसार के चिंतन में उलझा रहता है। संसार का चिंतन अज्ञान को बढ़ाता है, जबकि भगवान का चिंतन ज्ञान को प्रकट करता है।

महाराज जी बताते हैं कि अनेक महापुरुष जैसे सनकादिक, भगवान शिव आदि भी निरंतर भगवान का नाम जपते हैं। इसका अर्थ है कि नाम-जप केवल साधकों के लिए ही नहीं बल्कि सिद्ध पुरुषों के लिए भी आवश्यक है।

नाम-जप से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य—तीनों की वृद्धि होती है। इसलिए भगवान का नाम जीवन का सबसे बड़ा सहारा है।


प्रश्न 14: यदि घर का वातावरण तमोगुणी हो तो भक्ति कैसे करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यदि किसी साधक का परिवार भक्ति के अनुकूल न हो और घर में तमोगुणी आहार-विहार होता हो, तो यह निश्चित रूप से एक कठिन परिस्थिति है।

लेकिन ऐसी स्थिति में भी साधक को निराश नहीं होना चाहिए। उसे स्वयं पवित्र आचरण बनाए रखना चाहिए और भगवान का नाम जप जारी रखना चाहिए।

यदि परिवार के दबाव के कारण कुछ कार्य करने पड़ें, जैसे भोजन बनाना या घर के काम करना, तो भी साधक अपने मन को भगवान से जोड़कर रख सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वयं उस आचरण में सहभागी न बने जो उसे अनुचित लगता है।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान हृदय की भावना को देखते हैं। यदि साधक सच्चे मन से भगवान का स्मरण करता है तो प्रतिकूल वातावरण में भी उसका आध्यात्मिक कल्याण हो सकता है।


प्रश्न 15: साधक को प्रारंभ में किस साधना पर ध्यान देना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधना के प्रारंभ में साधक को बहुत अधिक जटिल बातों में नहीं उलझना चाहिए। सबसे सरल और प्रभावी उपाय है भगवान के नाम का जप।

नाम-जप साधना का आधार है। यदि साधक निरंतर भगवान का नाम स्मरण करता रहे तो धीरे-धीरे उसके भीतर भक्ति, वैराग्य और ज्ञान सब प्रकट होने लगते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि प्रारंभ में साधक को अपने मन को एक ही नाम या इष्ट में स्थिर करना चाहिए। बार-बार इष्ट बदलने से मन स्थिर नहीं हो पाता।

जब नाम-जप निरंतर होने लगता है तो मन में आने वाले विकार स्वतः कम होने लगते हैं और साधना में प्रगति होने लगती है।


प्रश्न 16: दीक्षा के बाद यदि साधक से गलती हो जाए तो क्या होगा?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि दीक्षा के बाद भी साधक पूर्ण रूप से दोषों से मुक्त नहीं हो जाता। पुराने संस्कार और वासनाएँ कभी-कभी मन में उठ सकती हैं।

लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि साधक उन विचारों को कर्म में परिवर्तित न होने दे। यदि मन में कोई विकार उठ भी जाए तो उसे तुरंत भगवान का नाम लेकर रोक देना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि कलियुग में मानसिक पाप उतना प्रभावी नहीं होता जितना कि कर्म से किया गया पाप। इसलिए साधक को विशेष सावधानी रखनी चाहिए कि वह किसी गलत कार्य में न पड़े।

नाम-जप और सत्संग से धीरे-धीरे मन शुद्ध होता है और पुराने संस्कार कमजोर होने लगते हैं।


प्रश्न 17: मन में आने वाले विकारों से कैसे बचा जाए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य के मन में विकार आना स्वाभाविक है क्योंकि मन में अनेक जन्मों के संस्कार होते हैं। जब तक भजन का बल मजबूत नहीं होता तब तक मन बार-बार विषयों की ओर आकर्षित होता है।

लेकिन साधक को सावधान रहना चाहिए कि ये विचार कर्म में परिवर्तित न हों। यदि मन में कोई विकार उठे तो तुरंत भगवान का नाम जपना चाहिए।

महाराज जी बताते हैं कि यदि मन को खाली समय मिल जाता है तो विकारों को प्रवेश करने का अवसर मिल जाता है। इसलिए साधक को अपने समय को भजन, सत्संग और सेवा में लगाना चाहिए।

नाम-जप से मन पर इतना प्रभाव पड़ता है कि धीरे-धीरे विकारों की शक्ति कम होने लगती है।


प्रश्न 18: सबमें भगवान को कैसे देखा जाए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि परमात्मा प्रत्येक जीव के भीतर शक्ति रूप से उपस्थित हैं। जैसे बिजली एक ही होती है लेकिन अलग-अलग उपकरणों में अलग प्रकार से कार्य करती है, वैसे ही परमात्मा सभी में एक ही हैं लेकिन व्यक्तियों के आचरण अलग-अलग होते हैं।

यदि हम केवल लोगों के व्यवहार को देखते रहेंगे तो हमें भगवान दिखाई नहीं देंगे। लेकिन यदि हम यह समझ लें कि सबके भीतर वही परमात्मा शक्ति काम कर रही है, तो हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है।

महाराज जी कहते हैं कि साधक को दूसरों के दोषों पर ध्यान नहीं देना चाहिए बल्कि उनके भीतर स्थित परमात्मा का स्मरण करना चाहिए।


प्रश्न 19: पुराने व्यसन या वासनाएँ फिर से उठें तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधना के मार्ग में पुराने संस्कार बार-बार मन को खींचने की कोशिश करते हैं। जब साधक उन इच्छाओं को छोड़ देता है तो मन उसे पुनः उसी दिशा में ले जाने का प्रयास करता है।

उस समय साधक को दृढ़ता दिखानी होती है। यदि वह एक बार दृढ़ होकर उस इच्छा का विरोध कर देता है तो धीरे-धीरे उसकी शक्ति कम हो जाती है।

महाराज जी कहते हैं कि मन की इस पीड़ा को सहन करना ही साधना है। थोड़ी देर तक मन बेचैन करेगा लेकिन यदि साधक भगवान का नाम लेकर धैर्य रखे तो वह संकट दूर हो जाता है।


प्रश्न 20: भक्ति मार्ग में मन के प्रलोभनों को कैसे जीतें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य का मन बहुत चंचल है और इंद्रियों के पीछे भागता है। इसलिए साधक को सावधान रहना चाहिए और अपने मन को बार-बार भगवान के नाम में लगाना चाहिए।

जब मन विषयों की ओर खींचे तो साधक को तुरंत भगवान का स्मरण करना चाहिए, सत्संग सुनना चाहिए या किसी भक्त के साथ समय बिताना चाहिए।

महाराज जी बताते हैं कि साधना में सफलता उन्हीं को मिलती है जो धैर्य और साहस से मन के प्रलोभनों का सामना करते हैं।

जो व्यक्ति भगवान का आश्रय लेकर निरंतर नाम-जप करता है, उसके जीवन में धीरे-धीरे स्थिरता, शांति और भक्ति का प्रकाश प्रकट होने लगता है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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