भक्ति मार्ग में आसक्ति, नाम-जप और शरणागति का रहस्य – महाराज जी के अमृत वचन
मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति है। लेकिन जीवन में संबंध, आसक्ति, विकार, मोह और भ्रम साधक को बार-बार विचलित कर देते हैं। संत महापुरुष बताते हैं कि यदि साधक सही विवेक, नाम-जप और गुरु की शरण ग्रहण कर ले, तो वह इन सभी बाधाओं को पार कर सकता है।
श्री प्रेमानंद महाराज जी अपने प्रवचनों में इन गूढ़ आध्यात्मिक प्रश्नों का अत्यंत सरल और गहरे भाव से उत्तर देते हैं। नीचे उन्हीं प्रश्नों के उत्तर विस्तार से प्रस्तुत हैं।
प्रश्न 1: यदि किसी व्यक्ति से गहरी आसक्ति हो और वह संबंध समाप्त हो जाए तो साधक का धर्म क्या है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संसार के अधिकांश संबंध आसक्ति और वासनाओं पर आधारित होते हैं, इसलिए वे स्थायी नहीं होते। जब कोई संबंध टूटता है तो साधक के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी होती है। उस समय उसे यह समझना चाहिए कि वह संबंध वास्तव में कैसा था — क्या वह संबंध आत्मिक उन्नति का माध्यम था या केवल सांसारिक आकर्षण का परिणाम।
महाराज जी कहते हैं कि सच्ची मित्रता वह है जो व्यक्ति को बुरे मार्ग से हटाकर अच्छे मार्ग पर चलाए। यदि कोई संबंध हमें पाप, वासना और गलत आचरण की ओर ले जाता है, तो उससे दूर होना ही कल्याणकारी है। आजकल गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड और लिविंग रिलेशन जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन हमारे सनातन धर्म में इस प्रकार के संबंधों का स्थान नहीं रहा।
साधक को चाहिए कि वह अपने मन को संयमित करे और अपने जीवन को धर्म और पवित्रता के मार्ग पर स्थापित करे। यदि किसी से प्रेम करना ही है, तो वह प्रेम पवित्र और आजीवन निभाने वाला होना चाहिए।
महाराज जी कहते हैं कि जल्दबाजी में बनाए गए संबंध अक्सर दुख का कारण बनते हैं। इसलिए साधक को विवेक से निर्णय लेना चाहिए और अपने जीवन को भक्ति और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ाना चाहिए।
प्रश्न 2: कैसे पहचाने कि सहायता करने वाला व्यक्ति भगवान द्वारा भेजा गया है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि कभी-कभी भगवान किसी व्यक्ति को निमित्त बनाकर साधक की सहायता करते हैं। लेकिन साधक को यह विवेक रखना चाहिए कि कौन वास्तव में भगवान द्वारा भेजा गया है और कौन केवल सांसारिक संबंधों के कारण मदद कर रहा है।
महाराज जी कहते हैं कि तीन संकेत ऐसे होते हैं जिनसे यह पहचान हो सकती है। पहला – उस व्यक्ति से हमारा कोई निजी परिचय नहीं होना चाहिए। दूसरा – हमने उससे कोई इच्छा या संकल्प नहीं किया होना चाहिए कि वह हमारी सहायता करे। तीसरा – वह व्यक्ति अचानक आकर सहायता कर दे और हमें पहले से उसका कोई ज्ञान न हो।
ऐसी स्थिति में समझना चाहिए कि भगवान ने ही उसे हमारे लिए भेजा है। महाराज जी अपने जीवन का एक अनुभव बताते हैं कि एक बार यात्रा के समय उन्हें अचानक एक अजनबी व्यक्ति ने सहायता की और उनकी समस्या का समाधान कर दिया। उस व्यक्ति से उनका कोई परिचय नहीं था, फिर भी उसने मदद की और चला गया।
इस प्रकार की घटनाओं को भगवान की कृपा के रूप में देखना चाहिए। यदि कोई परिचित व्यक्ति भी बिना मांगे सहायता कर दे, तो साधक को यह भाव रखना चाहिए कि भगवान ने ही उसके हृदय में प्रेरणा दी है।
प्रश्न 3: यदि सब भगवान की संतान हैं तो काम, क्रोध और लोभ क्यों बनाए गए?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि इस सृष्टि में जो कुछ भी है, वह भगवान की ही रचना है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर भी उसी सृष्टि का हिस्सा हैं।
इसे एक खेल की तरह समझना चाहिए। जैसे एक विद्यालय में कबड्डी खेलते समय एक ही कक्षा के बच्चों को दो टीमों में बांट दिया जाता है, उसी प्रकार इस संसार में भी एक प्रकार का आध्यात्मिक खेल चल रहा है।
मनुष्य के सामने दो मार्ग हैं — एक मार्ग भोग का और दूसरा भगवान की ओर जाने वाला। यदि मनुष्य भगवान का नाम जप करता है, संतों का संग करता है और शास्त्रों का अध्ययन करता है, तो वह इन विकारों पर विजय प्राप्त कर सकता है।
लेकिन यदि वह भोगों में उलझ जाता है, तो वही विकार उसे पतन की ओर ले जाते हैं।
महाराज जी कहते हैं कि साधक को कायर नहीं बनना चाहिए। उसे इन विकारों से डरने के बजाय भगवान के नाम की शक्ति से उनका सामना करना चाहिए। नाम-जप, सत्संग और शुद्ध जीवन से मनुष्य इन विकारों पर विजय प्राप्त कर सकता है।
प्रश्न 4: आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म और परब्रह्म क्या हैं?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि ये सभी शब्द वास्तव में एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं। जैसे पानी के कई पर्यायवाची शब्द होते हैं – जल, नीर, तोय आदि – उसी प्रकार परम तत्व के भी अनेक नाम हैं।
योगी लोग उसे परमात्मा कहते हैं, ज्ञानी उसे ब्रह्म कहते हैं और भक्त उसे भगवान के नाम से पुकारते हैं। प्रेमी भक्त अपने इष्ट को अलग-अलग भावों से पुकारते हैं – कोई कृष्ण कहता है, कोई राम, कोई वाहेगुरु और कोई देवी।
वास्तव में वह एक ही तत्व है जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है।
लेकिन उस सत्य का अनुभव केवल सुनने से नहीं होता। उसके लिए गुरु की शरण में जाना आवश्यक है। जब साधक गुरु की वाणी के अनुसार जीवन जीता है और अपने दोषों का त्याग करता है, तब धीरे-धीरे उसके भीतर ज्ञान प्रकट होता है।
महाराज जी कहते हैं कि परमात्मा की प्राप्ति केवल गुरु कृपा से ही संभव है। इसलिए गुरु की आराधना और उनकी वाणी का पालन अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न 5: क्या नाम स्मरण ही भगवत प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि अपने अनुभव से वे यह बात कह रहे हैं कि भगवान के नाम से बढ़कर कोई साधन नहीं है। उन्होंने अनेक सिद्ध महापुरुषों का संग किया, योग और ज्ञान के विभिन्न मार्गों को देखा, लेकिन अंततः यह अनुभव हुआ कि नाम-जप ही सबसे श्रेष्ठ साधन है।
संतों और गुरुओं की वाणी में भी यही बात कही गई है कि कलियुग में भगवान के नाम का स्मरण ही मनुष्य को पार लगाने वाला साधन है।
महाराज जी कहते हैं कि यदि मनुष्य भगवान का नाम जपता है तो उसका जीवन धन्य हो जाता है। लेकिन यदि वह नाम-जप नहीं करता, तो कलियुग उसकी सभी साधनाओं को नष्ट कर सकता है।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य भोग नहीं बल्कि परमात्मा की प्राप्ति है। इसलिए साधक को चाहिए कि वह निरंतर भगवान का नाम जप करे, संतों का संग करे और अपने जीवन को पवित्र बनाए।
प्रश्न 6: भगवान से क्या मांगना चाहिए – मोक्ष या भक्ति?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि वास्तव में भगवान से कुछ मांगना ही नहीं चाहिए। क्योंकि हमें यह नहीं पता कि हमारे लिए क्या सर्वोत्तम है।
सच्ची शरणागति का अर्थ है कि साधक भगवान से कहे – “प्रभु, आपको जो उचित लगे वही मुझे दीजिए।”
महापुरुषों ने भी यही भाव अपनाया है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी भगवान से शिकायत नहीं की बल्कि हर परिस्थिति को भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार किया।
इसलिए साधक को चाहिए कि वह भगवान पर पूर्ण विश्वास रखे और अपने जीवन को उनकी इच्छा के अनुसार समर्पित कर दे।
प्रश्न 7: “सर्व धर्मान परित्यज” का क्या अर्थ है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यहाँ धर्म का अर्थ सामान्य सामाजिक कर्तव्यों से है जिन्हें लोक धर्म कहा जाता है।
जब साधक आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ता है, तब उसे इन बाहरी धर्मों से ऊपर उठकर भागवत धर्म को अपनाना होता है।
भागवत धर्म का अर्थ है – पूर्ण रूप से भगवान की शरण में जाना और अपने मन, वचन और कर्म को भगवान को समर्पित करना।
प्रश्न 8: भगवान की कृपा के लिए धन्यवाद कैसे दें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान को धन्यवाद देने की आवश्यकता नहीं है। जैसे माता-पिता अपने बच्चों की सेवा करते हैं और बच्चे उनसे धन्यवाद नहीं कहते, उसी प्रकार भगवान भी अपने भक्तों की सहायता करते हैं।
साधक को केवल यह भाव रखना चाहिए कि वह भगवान का है और भगवान उसके हैं।
प्रश्न 9: “मैं शरीर नहीं हूँ” की अनुभूति कैसे प्राप्त हो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि इस सत्य को केवल सुनकर समझ लेना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक अनुभव तभी होता है जब साधक निरंतर भगवान का नाम जप करता है।
नाम-जप से विवेक जागृत होता है और धीरे-धीरे साधक को आत्मा का वास्तविक ज्ञान होने लगता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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