प्रश्न 1:महाराज जी, अब तक इतना बोध हो गया है कि मैं यह देह नहीं हूँ, न मैं करता हूँ। वस्तुतः मैं साक्षी मात्र हूँ। पर यह व्यवहार में स्थिर नहीं हो पा रहा। क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी पहले ही सावधान करते हैं — “अभी भूल में मत रहना।” केवल यह समझ लेना कि “मैं देह नहीं हूँ” ही अंतिम बोध नहीं है। यह सैद्धांतिक समझ है, अनुभव की पूर्णता नहीं। पहलवान अगर जमीन पर बैठा है तो यह मत समझो कि वह हार गया। वह नीचे से भी दांव जानता है। ऐसे ही मोह, काम, क्रोध, लोभ और अहंकार बड़े बलवान हैं।
यदि सच में देहातीत हो गए होते तो भूख, प्यास, मान, अपमान, सुख, दुख, हानि, लाभ — कुछ भी विचलित न करता। जब तक इनसे मन डगमगाता है, तब तक देहभाव पूरी तरह गया नहीं। इसलिए भ्रम नहीं पालना चाहिए कि “सब हो गया।”
हाँ, यह भावना रखना कि “मैं प्रयास कर रहा हूँ” — यही सही है। विकार देह के हैं, इंद्रियों के हैं, मन के हैं। आप उनके साक्षी हैं — यह समझ धीरे-धीरे दृढ़ करनी है।
जब सुख-दुख दोनों समान हो जाएँ, तब मानना कि स्थिति स्थिर हुई। अभी साधना जारी रखनी है। गुरु प्रसाद से, निरंतर अभ्यास से, समता के द्वारा अंतःकरण शुद्ध होगा। धीरे-धीरे क्रिया नहीं, तत्व दिखने लगेगा।
इसलिए घबराना नहीं, पर रुकना भी नहीं। सजग रहना है। यही महाराज जी का संदेश है।
प्रश्न 2:गुरुदेव में भगवान की भावना कैसे पुष्ट करें? वास्तविक समर्पण कैसे आए?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — यह केवल बोलने की बात नहीं, मानने की बात है। जैसे शालिग्राम पत्थर ही दिखते हैं, पर जब हम मान लेते हैं कि ये भगवान हैं, तो वही पत्थर भगवान का अनुभव कराने लगते हैं।
ऐसे ही गुरुदेव को केवल मनुष्य मत देखो। यदि उन्हें साक्षात परमात्मा मान लिया, तो वही भावना आपको पार लगा देगी। लेकिन कठिनाई यहीं है — अपनी चाह मिटाना, अपना अहम छोड़ना, अपने मन की जिद त्यागना — यह आसान नहीं।
समर्पण का मतलब है — अब मैं मेरा नहीं रहा। मेरा मान करें या अपमान, पास रखें या दूर करें — मैं उनका हूँ।
महाराज जी उदाहरण देते हैं — समर्पण केवल शब्द से नहीं होता, परीक्षा में प्रकट होता है। जब भगवान हमारी वस्तु वापस ले लें, तब भी हृदय विचलित न हो — यह समर्पण है।
गुरु को साक्षात हरि मानना, उनके वचनों को मंत्र मानना, उनकी कृपा को मोक्ष का मूल मानना — यही साधन है। पर यह बिरलों को ही होता है।
इसलिए भावना को रोज पुष्ट करना है — ध्यान, श्रद्धा और आज्ञा पालन से। तभी बात बनेगी।
प्रश्न 3:धर्म ग्रंथों और भगवान के नाम-रूप का सम्मान कैसे करें? क्या डिजिटल माध्यम उचित है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — यदि डिजिटल माध्यम से वाणी जन-जन तक पहुँचती है तो यह बहुत अच्छा है। आधुनिकता का सदुपयोग होना चाहिए। मोबाइल में ग्रंथ उपलब्ध हों, लोग पढ़ें, सुनें — यह मंगलकारी है।
लेकिन एक बात बहुत गंभीर है — भगवान के नाम और छवि का सम्मान। आज हम भगवान की तस्वीरें छापकर झोले बना लेते हैं, जिनमें जूते भी रख दिए जाते हैं। यह उचित नहीं।
यदि भगवान का नाम छापा है, तो उसका आदर होना चाहिए। अगर मूर्ति या छवि का प्रयोग करना है तो श्रद्धा से। नहीं तो सम्मानपूर्वक विसर्जन या समाधि देना चाहिए।
महाराज जी कहते हैं — धर्म ग्रंथों का निरादर हमारी बुद्धि को भ्रष्ट करता है। केवल नाम लिख देना और उसे गंदगी में फेंक देना — यह अपराध है।
इसलिए आधुनिक साधन उपयोग करो, पर श्रद्धा और मर्यादा के साथ। धर्म का सम्मान ही हमारे मंगल का कारण है।
प्रश्न 4:काम के तनाव और गुस्से से कैसे बचें?
उत्तर:
महाराज जी बड़ी सरल बात कहते हैं — जिसके दिमाग में राम चलता है, उसी के दिमाग में काम नहीं चलता।
काम तो सबके दिमाग में चलता है। सत्संग में बैठे हो तब भी मन गणित लगाता रहता है। मन शांत तभी होगा जब भगवान में लगेगा।
उपाय क्या है? नियम बनाओ। रोज थोड़ा सत्संग सुनो — 10 मिनट ही सही। और नाम-जप करो। 500 नाम से शुरू करो, धीरे-धीरे बढ़ाओ।
बड़ा पद, बड़ा बैंक बैलेंस शांति नहीं देगा। शरीर एक दिन छूट जाएगा। साथ क्या जाएगा? केवल नाम।
इसलिए काउंटर लेकर नाम-जप करो। चलते-फिरते “राधा-राधा” जपो। धीरे-धीरे भीतर की गर्मी ठंडी होगी। गुस्सा कम होगा।
तनाव बाहर की स्थिति से नहीं, भीतर की रिक्तता से है। नाम-जप उस रिक्तता को भर देता है। यही सरल उपाय है।
प्रश्न 5:हर क्रिया भजन कब बनती है?
उत्तर:
जब तन, मन, वचन, प्राण और अहंकार सब भगवान को समर्पित हो जाएँ — तब हर क्रिया भजन बनती है।
तब चलना परिक्रमा है। बोलना स्तुति है। भोजन यज्ञ है। और सोना समाधि है।
लेकिन यह स्थिति तभी आती है जब “मैं” समाप्त हो जाए। अपनापन केवल परमात्मा में रह जाए।
हर क्षण भगवान की स्मृति बनी रहे। विस्मरण न हो। मन की हर वृत्ति भगवदाकार हो जाए।
तब व्यक्ति ब्रह्मविद हो जाता है — ब्रह्म के समान स्थित।
यह स्थिति अभ्यास, समर्पण और निरंतर स्मरण से आती है। एक दिन में नहीं, पर सतत साधना से अवश्य आती है।
प्रश्न 6:गीता का उपदेश किसे देना चाहिए?
उत्तर:
भगवान ने गीता तब कही जब अर्जुन शिष्य बनकर, शरणागत बनकर उनके चरणों में गिरा।
इसलिए उपदेश उसी को देना चाहिए जो श्रद्धालु हो, सुनना चाहता हो, शिष्य भाव में हो।
जो उपहास करे, जिसे श्रद्धा न हो — उसे नहीं सुनाना चाहिए। नहीं तो उपदेश व्यर्थ जाएगा।
महाराज जी कहते हैं — श्रद्धा शुरुआत है। बिना श्रद्धा के ज्ञान फल नहीं देता।
धर्म ग्रंथों का आदर होना चाहिए। गीता साक्षात भगवान की वाणी है।
इसलिए प्रचार करो, पर विवेक से। जो ग्रहण करना चाहता है, उसे दो। जो नहीं चाहता, उस पर थोपो मत। यही संतुलन है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
यह भी पढ़ें : माला-1189:आत्मज्ञान के बाद ‘मैं’ समाप्त हो जाता है या रहता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा