प्रश्न 1: “आप इतने क्यूट कैसे हैं?”—संतों के आकर्षण का वास्तविक कारण क्या है?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न को हँसी में लेते हुए एक गहरी बात समझाते हैं। वे कहते हैं—सुंदरता संत की नहीं, इष्ट की होती है। वास्तविक सुंदरता श्रीजी और लाडली जी की है। संत तो उनके चरणों के दास होते हैं। जब कोई भगवान की आराधना करता है, तो इष्ट का प्रभाव, भाव और स्वभाव उसके दासों पर उतरने लगता है।
इसीलिए बड़े-बड़े वयोवृद्ध संतों के पास बैठकर मन करता है कि बस देखते रहें, सुनते रहें। यह आकर्षण देह का नहीं, भगवतमय भाव का होता है। शरीर नाशवान है—आज है, कल नहीं रहेगा। देखने योग्य यदि कुछ है, तो भगवान का अविनाशी चिदानंदमय स्वरूप है। महाराज जी कहते हैं—यदि सुंदरता देखनी है, तो खूब नाम-जप करो और भगवान की सुंदरता देखो। वही जगत का मंगल करती है और वही जगत को सुख पहुँचाती है।
प्रश्न 2: “विषयों में रहते हुए भी अनन्य भक्ति” का सही अर्थ क्या है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि अनन्यता का अर्थ यह नहीं कि साधक जितेंद्रिय हो गया हो। अनन्यता का अर्थ है—आश्रय केवल प्रभु का।
मनुष्य में काम, लोभ, मोह हो सकते हैं; इंद्रियाँ विषयों की ओर जाती हों—फिर भी यदि भीतर से भाव यह है कि “मैं प्रभु का हूँ”, तो वही अनन्यता है। महाराज जी इसे पतिव्रता स्त्री के उदाहरण से समझाते हैं—स्वभाव कटु हो सकता है, पर यदि निष्ठा पति में है, तो वही प्रिय बनती है।
इसी प्रकार, जो साधक अभी जितेंद्रिय नहीं हुआ, पर श्यामा-श्याम का अनन्य है—वह शीघ्र प्रेमी बन जाता है। प्रेम आते ही समस्त कामनाएँ शांत हो जाती हैं, जैसे बाज़ के मैदान में उतरते ही अन्य पक्षी दिखते नहीं। इसीलिए महाराज जी कहते हैं—करोड़ों जितेंद्रिय भी उस अनन्य भक्त की समानता नहीं कर सकते।
प्रश्न 3: झूठी भक्ति और सच्ची भक्ति में क्या अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी यहाँ अत्यंत करुणा से बात रखते हैं। वे कहते हैं—यदि भाव नहीं भी है, फिर भी भगवान से जुड़ जाओ। चाहे नाटक ही क्यों न हो—जुड़ना ज़रूरी है। भगवान सत्य-सच्चिदानंद हैं; वे झूठे भाव को भी एक दिन सत्य बना देते हैं।
पर एक स्पष्ट चेतावनी भी देते हैं—यदि भक्ति का दिखावा करके लोगों से धन, मान या वासना की पूर्ति की जाए, तो वह पाखंड है और पतन का मार्ग है।
भाव न होने पर भी भजन करना एक मार्ग है; दिखावा करके स्वार्थ साधना दूसरा। पहला मार्ग साधक को सच्चा भक्त बनाता है, दूसरा उसे गिराता है।
प्रश्न 4: भगवत-प्राप्त महापुरुष को कैसे पहचाना जाए?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—भगवत-प्राप्त महापुरुष को बाहरी लक्षणों से पहचानना असंभव है। सिद्धावस्था में वे सामान्य जन की तरह व्यवहार करते हैं, पर भीतर उनकी स्थिति असाधारण होती है।
कुछ आंतरिक लक्षण बताए जाते हैं—उन पर मान-अपमान, सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय का प्रभाव नहीं पड़ता। वे द्वंदातीत, त्रिगुणातीत और कालातीत होते हैं।
पर महाराज जी का निष्कर्ष स्पष्ट है—हमें पहचानने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। सभी संतों को सच्चे भाव से प्रणाम करें, उनके वचनों को जीवन में उतारें और शरीर-संसर्ग से सावधानी रखें। यही सुरक्षित मार्ग है।
प्रश्न 5: गुरु के चरणों में इष्ट-भाव कैसे बने? एक आदर्श शिष्य के गुण क्या हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—गुरु-आज्ञा का पालन ही सबसे बड़ा गुण है। आज्ञा पालन से अहंकार नष्ट होता है, दैन्यता आती है और भजन बढ़ता है।
गुरु मानने वाले बहुत हैं, पर गुरु की मानने वाले बहुत कम। जो शिष्य गुरु की आज्ञा पर अपना जीवन समर्पित कर देता है, वही सच्चा शिष्य है। ऐसे शिष्य में दिनों में परिवर्तन आने लगता है—मोह, माया, काम, क्रोध शांत होने लगते हैं।
महाराज जी सावधान करते हैं—दोष-दर्शन कहीं भी मत करो। यदि संसार में दोष-दर्शन होगा, तो वही दोष गुरु में भी दिखने लगेगा। गुरु-भक्ति बढ़ाने का उपाय है—पूरे जगत में आदर और सम्मान।
प्रश्न 6: पूर्ण आत्मसमर्पण का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—पूर्ण आत्मसमर्पण का अर्थ है मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, शरीर, वाणी और “मैं”—सब भगवान को अर्पित कर देना।
मन कृष्णाकार, बुद्धि कृष्णाकार, अहंकार दासत्व से युक्त, शरीर सेवा में समर्पित और वाणी नाम-कीर्तन में लगी हो—यही पूर्ण आत्मसमर्पण है।
जहाँ कोई कामना शेष नहीं रहती, वहीं उत्तम प्रेमी की अवस्था आती है।
प्रश्न 7: “मैं कौन हूँ?”—इस प्रश्न का समाधान कैसे हो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—यह प्रश्न बातों से हल नहीं होता। यदि इसका वास्तविक समाधान हो जाए, तो मोक्ष प्राप्त हो जाए।
समाधान का मार्ग है—जिज्ञासा, संतों की आराधना, नाम-जप, शास्त्र-स्वाध्याय और साधना। अनुकूल-प्रतिकूल, सुख-दुख को समान भाव से सहने पर धीरे-धीरे अनुभव होता है कि आत्मा एक है और वही सबमें विराजमान है।
ज्ञान पढ़ने से होता है, पर बोध साधना से। बोध होते ही जीवन्मुक्ति हो जाती है।
प्रश्न 8: साधना में रस न आए तो उसे भगवान की परीक्षा मानें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—इसे परीक्षा नहीं, पापों का नाश समझो। साधना अपना काम कर रही होती है, भले अनुभव न हो।
जैसे लिफ्ट चलती है और बीच में पता नहीं चलता, वैसे ही साधना चलती रहती है। भगवान साधक को अभिमान से बचाने के लिए अनुभव नहीं देते।
जिस दिन पाप भस्म होंगे, उस दिन ऐसा आनंद आएगा कि साधक रो पड़ेगा।
प्रश्न 9: बीमारी या व्यवधान के बाद भजन में मन न लगे तो क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—नाम-जप ही सबसे सूक्ष्म साधना है। भगवान से प्रार्थना करो कि वे फिर से नाम में जोड़ दें।
जीवन अनिश्चित है। आज स्वस्थ हो, कल नहीं। इसलिए जब तक शरीर स्वस्थ है, भजन का अभ्यास पक्का कर लो। नाम न छूटा, तो जीवन धन्य हो जाएगा।
प्रश्न 10: जीवन का एक सत्य अनुभव जो सबके साथ बाँटना चाहें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—राधा नाम। गुरु कृपा से मिला नाम ही जीवन का सर्वस्व है। नाम पहले पापों का नाश करता है, फिर लौकिक-पारलौकिक सुख देता है और अंत में परमधाम का अधिकारी बनाता है।
वे दृढ़ता से कहते हैं—एक बार भी सच्चे भाव से राधा नाम जप लिया, तो नरक नहीं जाना पड़ता। यह कोई प्रलोभन नहीं, बल्कि अनुभव की बात है। अध्यात्म बिकता नहीं—दान होता है।
निष्कर्ष: महाराज जी का सार-संदेश
इस पूरी वार्ता का निष्कर्ष अत्यंत सीधा है—
अनन्य आश्रय, गुरु-आज्ञा, आत्मसमर्पण और राधा-नाम।
इन्हीं से भक्ति सच्ची बनती है, जीवन शुद्ध होता है और अंततः भगवत-प्राप्ति होती है।
Credit
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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