माला-1173: क्या माया वास्तव में माँ के समान है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, माया से बचने के उपाय बताते समय आप कहते हैं कि बाधा माया नहीं, हमारी वासनाएँ हैं। इसका सही अर्थ क्या है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज बहुत स्पष्ट करते हैं कि माया अपने आप में बाधक नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब मनुष्य वासना का शासन नहीं कर पाता। चाहे बाहर की माया हो या भीतर की—यदि वासनाएँ अनियंत्रित हैं, तभी मनुष्य परेशान होता है।
महाराज जी समझाते हैं कि यदि हम समाज को अनुकूलता देने की सोचें, पत्नी को अनुकूलता देने की सोचें, तो वही माया बाधक नहीं रहती। प्रतिकूलता ही माया को कष्टकारी बनाती है। माया भगवान की देवी शक्ति है, उससे अभिमान करके नहीं निकला जा सकता, बल्कि नम्रता से, सिर झुकाकर निकला जाता है।
अर्धांगिनी को माया समझकर निषेध करना गलत है। वह जीवन की संगिनी है—लोक और परलोक दोनों में साथ देने वाली। जैसे हम अपने प्राणों का पोषण करते हैं, वैसे ही अर्धांगिनी का पोषण करें। तब वह माया बाधा नहीं, बल्कि सहयोग और सुख का कारण बनती है।
महाराज जी कहते हैं—जो वस्तु भगवान को समर्पित हो जाए, वही बंधन नहीं रहती। प्रतिकूल व्यवहार माया को निंदनीय बनाता है और अनुकूल व्यवहार माया को बंधनी बना देता है।


प्रश्न 2: क्या माया वास्तव में माँ के समान है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—हाँ, माया माँ के समान है। माया ने हमें शरीर दिया, भोजन दिया, संसार दिया। यदि माया न होती, तो हम बैठते कहाँ, सुनते कैसे, बोलते कैसे? यहाँ तक कि महाराज जी की वाणी भी माया के माध्यम से ही सुनाई देती है।
दुख माया से नहीं आता, दुख आता है हमारे गलत आचरण, गलत विचार और गलत क्रियाओं से। यदि इन्हें छोड़ दिया जाए, तो माया आनंदमयी है। जैसे माँ अपने बच्चे का पोषण करती है, वैसे ही माया हमारा पोषण करती है—शोषण नहीं करती।
शोषण तब होता है, जब हमारे विचार, आचरण और कर्म विकृत हो जाते हैं। इन्हें सुधार लिया जाए, तो माया कभी परेशान नहीं करती।


प्रश्न 3: “सबकी ममता त्यागकर प्रभु के चरणों में ममता कैसे हो?” यह जीवन में कैसे उतरे?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सांसारिक ममता का मूल कारण मोह है। और मोह को नष्ट करने की शक्ति विवेक में है। विवेक बिना सत्संग के उत्पन्न नहीं होता।
जब संतों का संग मिलता है, तब उनके उपदेश से विवेक जागृत होता है। उसी विवेक से माता-पिता, धन, शरीर, संबंधों में लगी अति-ममता धीरे-धीरे ढीली पड़ती है।
नाम-जप, शास्त्र-स्वाध्याय, पवित्र भोजन और पवित्र आचरण—इनसे हृदय की मलिनता नष्ट होती है। जैसे-जैसे भजन का अनुभव बढ़ता है, वैसे-वैसे सांसारिक ममता गलती जाती है और प्रभु के चरणों में अपनापन बनने लगता है।
महाराज जी कहते हैं—यदि ममता प्रभु के चरणों में आ गई, तो समझो माया पर विजय हो गई।


प्रश्न 4: देहाभिमान और आत्मसम्मान में वास्तविक अंतर क्या है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि जिसे आज लोग आत्मसम्मान कहते हैं, वह प्रायः देहाभिमान होता है। देहाभिमान वाला व्यक्ति अपमान सह नहीं पाता, उसे दूसरों से मान चाहिए।
वास्तविक आत्मसम्मान वह है, जिसमें व्यक्ति स्वयं अपमान सहकर भी दूसरों को सम्मान देता है। आत्मा संपूर्ण विश्व है—इसलिए संपूर्ण विश्व का सुख ही आत्मसम्मान है।
देह के लिए किया गया सम्मान, प्रणाम या आदर आत्मसम्मान नहीं, देह-सम्मान है। और देह-सम्मान ही देहाभिमान बन जाता है। महाराज जी कहते हैं—आत्मसम्मान भगवान का स्वरूप है, और देहाभिमान बंधन का कारण।


प्रश्न 5: शिष्य को गुरु और इष्ट के प्रेम-दुलार का अनुभव कैसे होता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जितना शिष्य का समर्पण होता है, उतना ही उसे गुरु और भगवान के प्रेम का अनुभव होता है। भगवान सबके प्रिय हैं, सब पर कृपा है, पर उस कृपा का अनुभव वही करता है जो शरण में है।
बाहरी क्रियाएँ—देखना, मुस्कुराना, हाथ रखना—ये प्रेम का प्रमाण नहीं हैं। प्रेम हृदय का विषय है। जब हृदय से हृदय का संबंध बनता है, तब भीतर से अनुभव होता है कि हमें कितना प्रेम किया जा रहा है।
महाराज जी कहते हैं—समर्पण जितना गहरा, अनुभव उतना प्रगाढ़


प्रश्न 6: गुरु-आज्ञा और डाँट का सौभाग्य कब मिलता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—जब भगवान की विशेष कृपा होती है, तब गुरु आज्ञा देते हैं और डाँटते भी हैं। गुरु की डाँट का अर्थ है—उन्होंने शिष्य की जिम्मेदारी ले ली।
जिसे गुरु रुद्र-दृष्टि से देख लें, उसके भीतर दोष टिक नहीं सकते। गुरु का दंड-विधान भी कृपा ही है, क्योंकि वही भगवान-प्राप्ति का मार्ग बनाता है।
जो शिष्य शरीर-राग छोड़कर सेवा-राग में प्रवेश करता है, वही गुरु की आज्ञा और शासन का अधिकारी बनता है।


प्रश्न 7: प्रिया-प्रीतम का सच्चा प्रेम कैसे प्राप्त होता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—प्रेम का मूल नाम है। नाम-वाणी में प्रीति होगी, तभी प्रिया-प्रीतम का प्रेम मिलेगा। यह बिना रसिक संतों के संग के संभव नहीं।
प्रेम को बुद्धि से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि प्रेम अनिर्वचनीय है। वह अनुभव का विषय है। जब “मैं” खो जाता है, तभी प्रेम मिलता है।
नाम-जप से भाव-देह बनती है। जैसे-जैसे उपासना का भाव गहरा होता है, वैसा ही स्वरूप बनता है और उसी स्वरूप से भगवान की दिव्य सेवा होती है।
महाराज जी कहते हैं—पहले विकारों पर विजय पाओ, फिर प्रेम की उच्च अवस्थाएँ स्वतः आएँगी।


प्रश्न 8: भगवान और संतों को धन्यवाद या क्षमा कैसे कहें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान और संतों से “थैंक यू” जैसी भाषा नहीं बोली जाती। उनसे कृपा की भाषा बोली जाती है।
भगवान से कहा जाता है—“नाथ, आपकी हम पर बहुत कृपा है। हम आपके चरणों में रहना चाहते हैं। हमारे दोष दूर कीजिए।”
संतों के चरणों में केवल नमन और कृतज्ञता—“आपकी बहुत कृपा है”—यही भाषा उचित है।


प्रश्न 9: आज की युवा पीढ़ी व्यसन और व्यभिचार की ओर क्यों जा रही है? समाधान क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बहुत चिंता के साथ कहते हैं कि आधुनिक शिक्षा के साथ आध्यात्मिक शिक्षा न मिलने से यह संकट बढ़ रहा है।
यदि चरित्र चला गया, तो सब कुछ चला गया। माता-पिता, शिक्षक और मित्र—तीनों को मिलकर बच्चों को संभालना होगा।
पाँच मिनट भी संत-वाणी, गीता या भागवत का अर्थ बच्चों को सुनाया जाए, तो उनकी दिशा बदल सकती है।
महाराज जी कहते हैं—भारत धर्मप्रधान देश है। यहाँ चरित्रवानों की पूजा होती है। यदि आने वाली पीढ़ी चरित्रवान बनी, तो वही समाज और राष्ट्र का सुख बनाएगी।


निष्कर्ष: महाराज जी का मूल संदेश

श्री प्रेमानंद जी महाराज का संदेश अत्यंत स्पष्ट है—
माया निषेध नहीं है, गलत आचरण निषेध है।
नाम-जप, सत्संग, पवित्र आचरण और समर्पण—यही जीवन को आनंदमय बनाते हैं।
राष्ट्र सेवा और परमार्थ, दोनों का समन्वय करके ही मनुष्य की यात्रा सफल होती है।


Credit

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

यह भी पढ़ें : माला-1171:क्या ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग एक साथ चल सकते हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

Leave a Reply