1. पूर्व संस्कार और आदतें कैसे बदलती हैं
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य की पुरानी प्रवृत्तियाँ भगवान के नाम-जप से ही बदलती हैं। नाम में इतनी सामर्थ है कि वह पूर्व पापों और पूर्व संस्कारों को नष्ट कर देता है। जिनकी प्रवृत्ति घोर पतन की थी, वे भी भगवान के नाम के बल पर संत बने।
लेकिन महाराज जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि नाम-जप तभी स्थिर होता है जब भोजन शुद्ध हो। चटोरा और असंयमी भोजन भजन में रुचि नहीं बनने देता। भजन स्वभाव को सुधारता है और धीरे-धीरे नवीन दैवी संस्कार हृदय में जाग्रत करता है। इसलिए जीवन बदलना है तो भोजन और भजन—दोनों को सुधारना होगा।
2. पूर्ण शरणागति का वास्तविक अर्थ
उत्तर:
पूर्ण शरणागति का अर्थ है अहंकार-शून्य जीवन। जहाँ “मैं” समाप्त हो जाता है।
जो स्वयं को तिनके के समान तुच्छ समझे, वृक्ष के समान सहनशील बने, स्वयं सम्मान न चाहे और दूसरों को सम्मान दे—वही शरणागत है।
महाराज जी कहते हैं कि शरणागति का सबसे बड़ा लक्षण है—निरंतर भगवत-स्मरण और यह अनुभव कि सब कुछ भगवान की कृपा से हो रहा है।
3. कलयुग में सर्वोत्तम भक्ति कौन-सी है
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में पूजा और कलयुग में केवल भगवान का नाम।
नाम में इतनी शक्ति है कि वह भवसागर को पार करा देता है। यदि नाम-जप नहीं है तो अन्य कोई उपाय टिक नहीं सकता।
कलयुग का आधार ही नाम-जप और नाम-कीर्तन है।
4. भजन में सिद्धियाँ क्यों बाधा बनती हैं
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि स्पष्ट कहते हैं कि सिद्धियाँ अहंकारयुक्त साधना में आती हैं।
जहाँ अहंकार शेष होता है, वहीं सिद्धियाँ प्रकट होकर साधक को भ्रम में डाल देती हैं।
अहंकार-शून्य हृदय में सिद्धि नहीं, बल्कि प्रेम, दैन्यता और शुद्ध भक्ति प्रकट होती है। यही वास्तविक साधना है।
5. प्राप्ति के बाद भी मन अतृप्त क्यों रहता है
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य असीम आनंद स्वरूप परमात्मा का अंश है। इसलिए उसे सीमित वस्तुओं, पदों, धन या संबंधों से तृप्ति नहीं मिलती।
जब तक भगवान के नाम, रूप और चरणों का आनंद नहीं मिलता, तब तक मन नई-नई इच्छाएँ पैदा करता रहता है।
महाराज जी कहते हैं—भजन से ऐसी तृप्ति होती है कि इच्छा का ही नाश हो जाता है।
6. भक्त के लिए वास्तविक सुख क्या है
उत्तर:
भक्त के लिए सबसे बड़ा सुख है—हर समय भगवान की स्मृति में डूबा रहना।
अखंड स्मृति में डूबा साधक स्वयं भी तर जाता है और दूसरों को भी तार देता है।
महाराज जी कहते हैं—इससे बड़ा न सुख है, न सिद्धि, न साधना।
7. सुख-दुख में भगवान का स्मरण क्यों नहीं टिकता
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि दुख में भी प्रायः मनुष्य संसार को ही याद करता है—व्यक्ति, उपाय, साधन।
और सुख में माया के भोगों में डूबकर भगवान को भूल जाता है।
जो साधक सुख और दुख दोनों में समान भाव से भगवान का स्मरण करता है, वही वास्तव में धन्य है।
8. आत्मा और परमात्मा के मिलन का साधन
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि आत्मा और परमात्मा अलग नहीं हैं। केवल अज्ञान के कारण भेद प्रतीत होता है।
मन और बुद्धि का भगवान में लग जाना ही भगवत-प्राप्ति है।
नाम-जप, कीर्तन, सत्संग और भक्तों का संग—यही इस मिलन के साधन हैं।
9. गुरु का बनने के लिए शिष्य की स्थिति
उत्तर:
गुरु के पास जाते समय शिष्य को कोरा कागज बन जाना चाहिए।
जो अपने अधूरे ज्ञान का बोझ लेकर जाता है, वह सीख नहीं पाता।
जो अबोध बालक की तरह शरण में जाता है, उसके हृदय में गुरु-ज्ञान स्वतः प्रकाशित हो जाता है।
10. सच्ची भक्ति और भावुकता में अंतर
उत्तर:
यदि नाम-जप बढ़ रहा है, विकार घट रहे हैं, इच्छाएँ कम हो रही हैं—तो भक्ति सही दिशा में है।
यदि काम, क्रोध और भोग बढ़ रहे हैं और नाम-जप नहीं—तो वह केवल भावुकता है, भक्ति नहीं।
11. गुरु का वास्तविक स्वरूप
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं—मंत्र ही गुरु का स्वरूप है।
जो मंत्र और नाम का निरंतर जप करता है, वही गुरु-साक्षात्कार करता है।
नाम और मंत्र गुरु की जीवनी शक्ति हैं।
12. जीवन में गुरु का प्रकट होना क्यों अनिवार्य है
उत्तर:
गुरु के बिना भवसागर से पूर्ण निवृत्ति संभव नहीं।
गुरु-कृपा से ही भ्रम नष्ट होता है और सही दृष्टि मिलती है।
जो गुरु की आज्ञा में रहता है, चाहे वह दूर ही क्यों न हो—उस पर गुरु-कृपा अवश्य बरसती है।
13. निष्काम प्रेम का वास्तविक स्वरूप
उत्तर:
सच्चा प्रेम वह है जिसमें कुछ भी माँगा न जाए।
जहाँ केवल स्वयं को समर्पित कर दिया जाए।
महाराज जी कहते हैं—जब प्रेम जागृत होता है, तो कोई वासना, कोई इच्छा शेष नहीं रहती। वही वास्तविक भक्ति है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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