माला-1164:माया का सबसे सूक्ष्म रूप क्या है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न : माया का सबसे सूक्ष्म रूप क्या है?

उत्तर
श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार माया का सबसे सूक्ष्म और गहरा रूप मन है। सामान्यतः लोग माया को धन, परिवार, भोग या संसार से जोड़कर देखते हैं, पर महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि असली माया बाहर नहीं, भीतर है। जब तक मन में किसी भी प्रकार की चाह बनी रहती है, तब तक वही मन माया का रूप धारण किए रहता है। यह चाह केवल सांसारिक सुखों की ही नहीं होती, बल्कि लोक-परलोक, पुण्य, मोक्ष, सिद्धि, मान-सम्मान और अपने सुख की इच्छा भी माया के ही अंतर्गत आती है।

महाराज जी समझाते हैं कि वस्तुएँ स्वयं बंधन नहीं हैं, बंधन पैदा करती है मन की अपेक्षा। मन कहता है—मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए, मुझे ऐसा बनना है—यही चाह मन को माया से बाँध देती है। जब यही मन किसी भी प्रकार की चाह से मुक्त हो जाता है, तब वह शुद्ध हो जाता है। उसी अवस्था को महाराज जी निष्काम मन कहते हैं, और यही निष्काम मन भगवान-भाव को धारण कर लेता है।

नाम-जप और भजन का उद्देश्य मन को दबाना नहीं, बल्कि मन की चाह को गलाना है। जैसे-जैसे नाम-जप में दृढ़ता आती है, वैसे-वैसे मन की कामनाएँ स्वतः कमजोर होने लगती हैं। जब मन किसी फल, परिणाम या सुख की अपेक्षा छोड़ देता है और केवल भगवान में टिक जाता है, तब माया का आवरण हटने लगता है। उसी क्षण मन माया नहीं रहता, बल्कि साक्षात भगवत-भाव से भर जाता है। यही महाराज जी द्वारा बताया गया माया से मुक्त होने का वास्तविक मार्ग है।

प्रश्न 1: महाराज जी, चेहरे की जो चमक और निरंतर प्रसन्नता दिखाई देती है, उसका रहस्य क्या है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि यह चमक किसी खान–पान, साधारण उपाय या शरीर-बल से नहीं आती। यह इष्ट और गुरुदेव की कृपा से आती है। शरीर की अस्वस्थता हो सकती है, साधन सीमित हो सकते हैं, पर यदि चित्त श्रीजी में जुड़ा है तो भीतर से आनंद उमड़ता रहता है। यह आनंद ऐसा होता है कि मन बार-बार भर आता है, हर्ष की उबाल आती है। महाराज जी स्पष्ट करते हैं—यह सब लाडली जी का प्रताप है; इसमें अपनी योग्यता का अहंकार नहीं।


प्रश्न 2: आध्यात्मिक आनंद क्या है? क्या उसे शब्दों में बताया जा सकता है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि जैसे किसी मीठे पदार्थ का स्वाद शब्दों से पूरा नहीं बताया जा सकता—वैसे ही भगवदानंद वाणी से व्यक्त नहीं किया जा सकता। वह अनिर्वचनीय है। यह आनंद प्रकृति और माया से परे है, इसलिए उदाहरणों से बाँधा नहीं जा सकता। यह आनंद अनुभव का विषय है—भजन और साधना से ही आता है। त्रिभुवन के सारे सुख उस महासागर-आनंद की एक सूक्ष्म सी झलक मात्र हैं।


प्रश्न 3: संतों की वाणी सुनना अधिक सुख देता है, नाम-जप से कम—तो क्या यही पर्याप्त है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—सत्संग का फल भजन में टिकना है। केवल सुनना पर्याप्त नहीं; जो सुना, उसे आचरण में उतारना आवश्यक है। यदि सत्संग के बाद इंद्रियाँ भोगों में ही उलझी रहें, तो फल नहीं मिलता। सही फल तब मिलता है जब मन भजन में लगने लगे, असत से हटे और भगवान प्राणप्रिय हो जाएँ। संतों की वाणी में जो सामर्थ्य है, वह भजन से ही आई है—अतः प्राथमिकता भजन को दीजिए।


प्रश्न 4: देहाभिमान बार-बार हरा देता है—इससे कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि देहाभिमान अज्ञान से आता है और अज्ञान भगवान-विमुखता से। जैसे ही भगवान-सन्मुखता बढ़ती है, ज्ञान का प्रकाश होता है और देहाभिमान गलने लगता है। उपाय है—निरंतर नाम-जप, संत-सेवा और सब कुछ कृष्णार्पण कर देना। जब नाम प्रिय हो जाता है, देहाभिमान को अवसर नहीं मिलता।


प्रश्न 5: मृत्यु का समय–स्थान पहले से तय है या पुरुषार्थ की भूमिका भी है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं—प्रारब्ध सुख–दुख का विधान करता है, पर नवीन कर्म भी होते हैं। चिकित्सा, प्रयास—ये नवीन कर्म हैं। वहीं, जीवन में संत-संग, तीर्थ-आगमन, धर्माचरण, नाम-जप—ये भगवत-कृपा से होते हैं। भक्त दृष्टि से देखे तो परिस्थितियाँ कृपा-चयन होती हैं; संसारी दृष्टि से—प्रारब्ध। साधक को चाहिए—कर्तव्य में पाप न आने दे और नाम-जप में दृढ़ रहे।


प्रश्न 6: कर्तव्य और परिवार—किसे प्राथमिकता?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—कर्तव्य की प्रधानता रखें; परिवार उसी में समाहित है। माता–पिता की सेवा, पत्नी–पुत्र के प्रति उत्तरदायित्व, धर्मसम्मत आजीविका—ये सब कर्तव्य हैं। कर्तव्य पालन में यदि दूरी भी आए, तो वह दोष नहीं। मोह बढ़े तो कर्तव्य टूटता है; कर्तव्य दृढ़ हो तो सब व्यवस्थित रहता है।


प्रश्न 7: मृत्यु से भय क्यों लगता है? क्या उसमें भी आनंद हो सकता है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं—जिसे शरीर और भोग प्रिय हैं, उसे मृत्यु से डर लगेगा। जिसे अविनाशी प्रियतम से प्रेम हो गया, उसे डर नहीं लगता। प्रेम में ऐसी सामर्थ्य है कि मृत्यु भी बाधा नहीं रहती—वह मिलन का द्वार बन जाती है। राष्ट्र-प्रेमी और भगवत-प्रेमी मृत्यु से नहीं डरते; प्रेम उन्हें निर्भय करता है।


प्रश्न 8: महाराज जी, चेहरे की जो चमक और निरंतर प्रसन्नता दिखाई देती है, उसका रहस्य क्या है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि यह चमक किसी खान–पान, साधारण उपाय या शरीर-बल से नहीं आती। यह इष्ट और गुरुदेव की कृपा से आती है। शरीर की अस्वस्थता हो सकती है, साधन सीमित हो सकते हैं, पर यदि चित्त श्रीजी में जुड़ा है तो भीतर से आनंद उमड़ता रहता है। यह आनंद ऐसा होता है कि मन बार-बार भर आता है, हर्ष की उबाल आती है। महाराज जी स्पष्ट करते हैं—यह सब लाडली जी का प्रताप है; इसमें अपनी योग्यता का अहंकार नहीं।


प्रश्न 9: दोष-दृष्टि बहुत बढ़ गई है—सबमें भगवान कैसे देखें?

उत्तर:
महाराज जी उदाहरण देते हैं—भिन्न-भिन्न यंत्रों में एक ही बिजली काम करती है; क्रियाएँ अलग हैं। वैसे ही देह और आचरण अलग-अलग हो सकते हैं, पर कारण-तत्व एक है। क्रिया पर दृष्टि रखेंगे तो दोष दिखेगा; कारण पर दृष्टि रखेंगे तो निर्दोषता। विवेकी वही है जो कारण-तत्व देखे—सबमें भगवान का दर्शन करे।


प्रश्न 10: समर्पण और कर्म—सही अर्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं—कर्म सब करते हैं; समर्पण पूर्णता है। जो भगवान को समर्पित हो गया, वह बंधन से ऊपर उठ जाता है। कर्म करते हुए भी बंधन रह सकता है, पर समर्पण होने पर जीवन पावन हो जाता है।


प्रश्न 11: दुख–विपत्ति को भाग्य मानें या कृपा?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—भक्त कृपा देखता है, संसारी प्रारब्ध। भक्त मानता है कि जो परिस्थिति आई है, वह भगवान द्वारा चयनित है—राग काटने और उन्नति के लिए। इसी दृष्टि से वह आगे बढ़ता है।


प्रश्न 12: आत्मा और शरीर का संबंध क्या है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं—आत्मा चैतन्य, शरीर जड़ है; उनका वास्तविक संबंध नहीं—यह भ्रम है। जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम। गुरु-कृपा और नाम-मंत्र की उपासना से यह भ्रम टूटता है और अपनी मुक्त स्वरूपता का अनुभव होता है।


प्रश्न 13: गुरु-आज्ञा पालन में बार-बार चूक—क्या आसक्ति होने पर कृपा संभाल लेती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—जहाँ सच्ची आसक्ति है, वहाँ आज्ञा-उल्लंघन संभव नहीं। उल्लंघन का कारण शरीर-राग और भोग-आसक्ति है। रसिकों/गुरु में आसक्ति मोक्ष-द्वार खोल देती है; तब आज्ञा पालन सहज हो जाता है।


प्रश्न 14: क्या आध्यात्मिक उन्नति के लिए घर छोड़ना जरूरी है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं—राग छोड़ना जरूरी है, घर नहीं। गृहस्थ में रहकर भी पवित्र आचरण, नाम-जप, माता–पिता की सेवा और परोपकार से वही गति मिलती है। जिनका मन भोगों में नहीं लगता, उनके लिए निवृत्ति मार्ग है; अन्यथा गृहस्थ मार्ग से भी भगवत-प्राप्ति संभव है।


प्रश्न 15: भक्ति का सबसे सरल और शुद्ध मार्ग कौन-सा है?

उत्तर:
महाराज जी का निष्कर्ष—“राधा राधा”। यही सरल, सीधा और लक्ष्य-सिद्ध मार्ग है। विश्वास से नाम पकड़िए—बाधाएँ कटेंगी, प्रेम जागेगा और भगवान हृदय में प्रकाशित होंगे।


प्रश्न 16: दांपत्य जीवन में भगवत-भाव कैसे टिके?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—पति–पत्नी अपने-अपने कर्तव्य धर्मपूर्वक निभाएँ; पति पत्नी की कामनाओं का ध्यान रखे, पत्नी पति को भगवत-भाव से देखे। नाम-जप, शुचिता और अनुशासन से दांपत्य प्रेम सुरक्षित रहता है।


Credit

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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