माला-1163:गुरु-अपराध क्या है और इससे कैसे बचें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: ऐसी कौन-सी तपस्या करूँ कि सारी सिद्धियाँ मेरे वश में आ जाएँ?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज स्पष्ट करते हैं कि सृष्टि के क्रम को बदल देना, सूर्य को रोक देना या अपनी इच्छा से प्रकृति को चलाना—यह सामर्थ्य केवल भगवान में है, किसी साधक या महात्मा में नहीं। आज तक जितने भी बड़े तपस्वी हुए, वे भी सृष्टि-क्रम को बदल नहीं पाए।
महाराज जी साधक को समझाते हैं कि पहले मनुष्यता आए, फिर देवत्व आए और फिर भगवत भाव आए। भगवान बनने की नहीं, भगवान के दास बनने की कोशिश करनी चाहिए। नाम-जप, अच्छा आचरण, माता-पिता की सेवा और पाप से दूरी—यही वास्तविक साधना है। सिद्धियों के पीछे भागना साधना नहीं, अहंकार है।


प्रश्न 2: गुरु-अपराध क्या है और इससे कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि गुरु-अपराध तीन प्रकार से होता है—

  1. गुरु की आज्ञा का उल्लंघन
  2. गुरु में दोष-दर्शन
  3. गुरु की निंदा करना या सुनना

ये तीनों ही भजन को निष्फल कर देते हैं, क्योंकि नाम, मंत्र और उपासना गुरु से ही प्राप्त होती है। यदि गुरु में ही दोष देखने लगें, तो साधना कैसे फलेगी?
गुरु में परम ब्रह्म बुद्धि रखकर चलने से साधक का मार्ग पुष्ट होता है और भजन बढ़ता है।


प्रश्न 3: क्या भगवान आज भी अपने भक्तों की सेवा में आते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान आज भी अपने भक्तों की सेवा में आते हैं, पर पहचान में नहीं आते। जैसे भक्त भगवान की सेवा करता है, वैसे ही भगवान भी छिपे रूप में भक्त की सेवा करते हैं।
भगवान दीन-हीन का वेश बनाकर आते हैं, नौकर बनकर, सेवक बनकर। भक्त को तब पता चलता है जब भगवान अंतर्धान हो जाते हैं और विरह उत्पन्न होता है।
इसलिए भक्तों की सेवा भगवान को शीघ्र प्रसन्न करने का सरल मार्ग है।


प्रश्न 4: भगवान से अपना वास्तविक संबंध कैसे पहचाने?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि भगवान से हमारा संबंध गुरु-कृपा से प्रकट होता है।
दास्य, सख्य, वात्सल्य, कांता या सहचरी भाव—ये सब भाव गुरु और आचार्य परंपरा से प्राप्त होते हैं।
स्वयं से संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। जो मंत्र और उपासना गुरु देते हैं, उसी से भाव-देह का निर्माण होता है और वही साधक को रस का अनुभव कराती है।


प्रश्न 5: भगवत प्राप्ति का उत्साह बार-बार क्यों कम हो जाता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि इसका कारण भोग-प्रियता है।
जब गंदे दृश्य देखे जाते हैं, गंदी बातें सुनी जाती हैं या अधर्म आचरण होता है, तो भजन का भाव क्षीण हो जाता है।
भगवत मार्ग परम पवित्र मार्ग है—पवित्र भोजन, पवित्र विचार और पवित्र आचरण से ही भक्ति बढ़ती है।
नियमपूर्वक नाम-जप, कुसंग का त्याग और सत्संग से उत्साह फिर जागृत हो जाता है।


प्रश्न 6: फल की चिंता बार-बार मन को पकड़ ले तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि फल प्रारब्ध पर निर्भर करता है, कर्म पर नहीं।
मनुष्य केवल अपने कर्तव्य कर्म का अधिकारी है। फल भगवान निश्चित करते हैं।
यदि फल की आकांक्षा में उलझे रहेंगे, तो सुख-दुख में डोलते रहेंगे।
जो साधक कर्तव्य में त्रुटि नहीं करता और फल भगवान पर छोड़ देता है, वही अंततः मंगलमय स्थिति को प्राप्त होता है।


प्रश्न 7: दृष्टा, साक्षी और तटस्थ भाव क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यह आत्म-भाव है।
देखने की क्रिया इंद्रियों की है, संकल्प मन का है और “मैं देख रहा हूँ” यह अहंकार का भाव है।
इन सबको जानने वाला जो तत्व है, वही आत्मा है—वही दृष्टा, साक्षी और तटस्थ है।
जब यह बोध हो जाता है कि “मैं भोगता नहीं, मैं केवल देखने वाला हूँ”, तब साधक मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।


प्रश्न 8: साधक जानकर भी गिर जाए तो अपने प्रति कैसी दृष्टि रखे?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं—गिर जाना कोई बड़ी बात नहीं, गिरे पड़े रहना बड़ी बात है।
जो चलता है वही फिसलता है। गिरकर उठना, अपनी त्रुटि पहचानना और आगे बढ़ जाना—यही साधक की पहचान है।
निराश होना नहीं चाहिए। नाम-जप से आध्यात्मिक बल बढ़ता है और वही बल विकारों पर विजय दिलाता है।


प्रश्न 9: क्षमा माँगने के बाद भी कर्म क्यों भोगने पड़ते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि अधिकांश क्षमा हृदय से नहीं होती
यदि सच्चे हृदय से क्षमा माँगी जाए और भविष्य में पाप न करने का संकल्प हो, तो भगवान अनंत जन्मों के पाप क्षमा कर देते हैं।
पर इस शरीर का प्रारब्ध भोगना पड़ता है। भगवान कुसुम से भी कोमल हैं और वज्र से भी कठोर—दोनों हैं।


प्रश्न 10: क्या सभी मार्ग सत्य हैं? एक मार्ग चुनने का अर्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी सुंदर उदाहरण देते हैं—बिहारी जी तक पहुँचने के कई रास्ते हैं, पर लक्ष्य एक ही है।
ज्ञान, कर्म और भक्ति—तीनों मार्ग एक ही परमात्मा तक ले जाते हैं।
जो अपने मार्ग को श्रेष्ठ मानकर दूसरे की निंदा करता है, वह अज्ञानी है। निंदा अहंकार का रूप है और भगवत प्राप्ति में बाधक है।


प्रश्न 11: निर्णय लेते समय धर्म और करुणा में क्या प्राथमिक हो?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि निर्णय में धर्म देखा जाता है, करुणा नहीं।
करुणा में पक्षपात आ सकता है, पर धर्म निष्पक्ष होता है।
कर्तव्य पद पर बैठा व्यक्ति यदि धर्म के अनुसार निर्णय लेता है और नाम-जप करता रहता है, तो वही उसकी साधना बन जाती है।


प्रश्न 12: क्या कर्तव्य कर्म करते हुए भगवान का स्मरण संभव है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि यह अभ्यास का विषय है।
जैसे निशानेबाज अभ्यास से लक्ष्य साध लेता है, वैसे ही अभ्यास से कर्म करते हुए भी भजन चलता रहता है।
युद्ध जैसा कठिन कर्म करते हुए भी यदि भगवान का स्मरण संभव है, तो सामान्य कार्यों में तो और भी संभव है।


प्रश्न 13: दीक्षा के बाद शिष्य के पाप गुरु पर जाते हैं—यह कितना सत्य है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यह शास्त्रीय सिद्धांत है।
यदि शिष्य गुरु की आज्ञा में नहीं चलता और पाप करता है, तो गुरु को भी उसका भोग सहना पड़ता है।
इसलिए शिष्य को सोचना चाहिए—मैं ऐसा आचरण न करूँ जिससे मेरे गुरुदेव को कष्ट पहुँचे।
संत अपने ऊपर दुख लेकर भी शिष्यों का मंगल चाहते हैं—यही संतत्व की महानता है।


प्रश्न 14: हम गुरुदेव को क्या दे सकते हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—नाम-जप
जैसे किसान फसल देखकर प्रसन्न होता है, वैसे ही जब शिष्य अच्छे आचरण और भजन में आगे बढ़ते हैं, तो गुरुदेव का हृदय आनंदित होता है।
यही उनके लिए सबसे बड़ा सुख है।


Credit

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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