माला-1086: समाज में बढ़ती विभाजन की प्रवृत्ति को कैसे रोका जाए?, श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: हम जो चाहते हैं, वह ईश्वर हमें क्यों नहीं देता?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि ईश्वर कोई मनोकामना पूरी करने वाली दुकान नहीं है। वहाँ से कुछ पाने के लिए दो ही अधिकार चाहिए — या तो आप “घर वाले” हों अर्थात भगवान को अपना मानने वाले, या फिर आपके पास “तपस्या रूपी धन” हो।
भगवान के दरबार में भाव और तप ही मुद्रा है। हम न तो तप करते हैं, न भजन करते हैं, और न ही प्रभु को अपना मानते हैं — फिर मांगने का अधिकार कैसे हो सकता है?
महाराज जी कहते हैं, यदि तुम सच में हरि को अपना मानो, उनसे प्रेम करो, तो फिर मांगना बनता है। या फिर तपस्या और साधना के द्वारा पात्रता बनाओ। जब तक यह दोनों में से कुछ भी नहीं, तब तक कामनाओं की पूर्ति संभव नहीं।
भगवान को वस्तु नहीं चाहिए, उन्हें भाव चाहिए। तुम लड्डू, पेड़ा नहीं — अपना प्रेम चढ़ाओ। यही सच्चा भोग है।


प्रश्न 2: राजनैतिक या अत्यधिक व्यस्त व्यक्ति के लिए कौन-सा सरल भक्ति मार्ग हो जिससे आध्यात्मिक विकास संभव हो?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने गीता में कहा — “यत् करोषि तत् कुरुष्व मदर्पणम्।” अर्थात जो भी कर्म करो, उसे मुझे अर्पित करो।
आप किसी भी पद पर हों, धर्मपूर्वक और निष्काम होकर कार्य करें। पद का दुरुपयोग न करें, प्रलोभन से न डिगें। जब कर्म धर्मयुक्त होता है, तभी वह भगवान को अर्पित किया जा सकता है।
महाराज जी बताते हैं कि अधर्मयुक्त कर्म पूजा नहीं, पाप है। किंतु यदि कर्म धर्मयुक्त हो और समर्पण भाव से किया जाए, तो वही पूजा बन जाता है।
व्यस्त व्यक्ति को चाहिए कि दिन में तीन घंटे भगवान के नाम-जप और भजन में लगाए। यही कर्म योग है, यही सरल भक्ति का मार्ग है।


प्रश्न 3: शरणागति से पहले यदि हमने बहुत पाप किए हैं, तो क्या हमें उनका कोई प्रायश्चित करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — केवल एक उपाय है — नाम-जप
भगवान का नाम ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है। जब हृदय में पश्चाताप की आग जलती है, वही पापों का क्षय करती है।
जो व्यक्ति सच्चे मन से निश्चय कर ले कि “अब गलत नहीं करूंगा” और भगवान का नाम जपता रहे, उसका हर पाप नष्ट हो जाता है।
गुटखा, तंबाकू या नशा करके भागवत कथा या रामायण पाठ करना अधर्म है। सद्ग्रंथों को हमेशा पवित्रता से पढ़ना चाहिए।
महाराज जी चेतावनी देते हैं — अपवित्रता और नशा धर्म को नष्ट करते हैं। इसलिए नाम-जप और भक्ति ही सब प्रायश्चितों से श्रेष्ठ साधन है।


प्रश्न 4: जीवन की कठिन परिस्थितियों में मन को स्थिर रखकर कैसे निपटें?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “नाम-जप ही जीवन का आधार है।”
जब मनुष्य नाम जपता है, तो बुद्धि स्थिर होती है, और दुःख में भी आनंद बना रहता है।
मीरा, प्रह्लाद और हरिदास ठाकुर जैसे भक्तों ने नाम के बल पर विष, अग्नि और कोड़े तक झेल लिए, परंतु विचलित नहीं हुए।
भगवान का नाम तीनों तापों — दैहिक, दैविक और भौतिक — को हर लेता है।
महाराज जी कहते हैं, “जिसे नाम प्रिय हो जाए, उसके लिए कोई परिस्थिति बड़ी नहीं रहती।”
नाम जपते रहो, भजन करते रहो — यही कठिनाई से पार पाने का एकमात्र उपाय है।


प्रश्न 5: समाज में बढ़ती विभाजन की प्रवृत्ति को कैसे रोका जाए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब तक मनुष्य अध्यात्मवान नहीं बनेगा, तब तक समाज सुधर नहीं सकता।
पवित्र भोजन, पवित्र आचरण, सद्ग्रंथों का स्वाध्याय और संतों का संग — यही चार उपाय हैं समाज को सुधारने के।
आज भाई-भाई में प्रेम नहीं, माता-पिता से भी स्नेह घटता जा रहा है। यह सब अध्यात्महीनता का परिणाम है।
सच्चा सुधार धन या सुविधा से नहीं, बल्कि प्रेम और क्षमा से होता है।
महाराज जी का स्पष्ट संदेश है — “सहनशील बनो, क्षमावान बनो, अध्यात्मवान बनो। यही समाज सुधार का सच्चा मार्ग है।”


प्रश्न 6: नाम-निष्ठा कैसे दृढ़ हो?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “दीर्घकाल तक आदरपूर्वक नाम-जप करते रहो।”
नाम-निष्ठा एक दिन में नहीं आती। जब जिह्वा से निरंतर ‘राधा-राधा’ का उच्चारण होता है, तो नाम भीतर गूंजने लगता है।
फिर मन उस नाम को पकड़ लेता है, और हृदय स्वयं नाम का आश्रय बन जाता है।
महाराज जी बताते हैं कि पहले जबान से नाम लो, फिर धीरे-धीरे मन स्वयं जपने लगेगा।
निरंतर अभ्यास से नाम हृदय में प्रकाशित हो जाएगा — यही नाम-निष्ठा की दृढ़ भूमि है।


प्रश्न 7: क्या भगवत-प्राप्ति से पहले भगवान का साक्षात्कार संभव है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — भगवान सर्वत्र हैं, पर बिना पात्रता के वे दिखाई नहीं देते।
अर्जुन को भी श्रीकृष्ण का विराट रूप देखने के लिए “दिव्य दृष्टि” की आवश्यकता हुई।
जब तक मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर से मुक्त नहीं होता, तब तक दिव्य दृष्टि नहीं खुलती।
भगवान किसी पर भी कृपा कर सकते हैं, पर जिसे भगवान मिल जाते हैं, वह कभी मुख से नहीं कहता।
उसका हृदय, उसकी आँखें, उसका रोम-रोम यह प्रमाण बन जाते हैं कि वह प्रभु से जुड़ चुका है।
सच्चा भक्त अपने मिलन का गर्व नहीं करता — वह केवल मौन प्रेम में डूबा रहता है।


प्रश्न 8: देह-भाव से मुक्त कैसे हुआ जाए?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि केवल यह सोच लेने से कि “मैं शरीर नहीं हूं” — देहभाव नहीं मिटता।
भजन, नाम-जप, परोपकार और अच्छे आचरण से धीरे-धीरे मोह नष्ट होता है।
जितना मोह घटेगा, उतना आप निरपेक्ष होंगे।
भजन के बल से ही अनुभवजन्य ज्ञान आता है, केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं।
महाराज जी कहते हैं — “जो ज्ञान हृदय से उपजे, वही माया का नाश करता है।”
अतः निरंतर भजन करते रहो, तभी सच्चा आत्मज्ञान मिलेगा।


प्रश्न 9: असली सुख मनोकामनाओं की पूर्ति में है या उनके त्याग में?

उत्तर:
महाराज जी के अनुसार — “त्याग ही शांति है, और शांति ही सुख है।”
कामनाओं की पूर्ति क्षणिक सुख देती है, लेकिन नई इच्छाएँ जन्म देती हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — “त्यागात् शान्तिरनन्तरम्।”
जो मनुष्य भगवान से प्रेम करता है, वह सहज त्यागी बन जाता है।
महाराज जी कहते हैं, “जिसका भगवान से सहज स्नेह है, उसके हृदय में परम शांति है।”
भोग की इच्छा दुख का कारण है, त्याग की भावना आनंद का स्रोत।
इसलिए इच्छाओं को धर्मपूर्वक संयमित करो और अधर्मयुक्त कामनाओं का त्याग कर दो — यही असली सुख है।


प्रश्न 10: क्या संत महाराज जी जैसी एक समान दिनचर्या से थकान नहीं होती?

उत्तर:
महाराज जी मुस्कुराकर कहते हैं — “थकान तो तब होती है जब मन प्रतिकूल कार्य करे।”
भजन में लगा मन कभी नहीं थकता।
हर दिन का प्रभु-चिंतन, हर रात्रि का नाम-स्मरण — सब कुछ नया लगता है।
महाराज जी बताते हैं कि उनकी साधना में हर दिन “नवीन रस” है —
“नवल श्याम, नवल राधा, नवल वृंदावन।”
उबन का प्रश्न ही नहीं।
वे कहते हैं — “हमने दुख को ही अपना साथी बनाया है, इसलिए सुख की इच्छा ही नहीं।”
यही संत जीवन की पराकाष्ठा है — भक्ति में रम जाना और हर क्षण को प्रभु की नव्यता से भर देना।


प्रश्न 11: एक करोड़ नाम-जप धीरे-धीरे करते रहें तो क्या वह गिना जाएगा? और विदेश में रहकर भी क्या भक्ति संभव है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “भगवान का नाम गिनती का विषय नहीं, भाव का विषय है।”
एक करोड़ नाम जपने से शरीर निष्पाप होता है, लेकिन यदि हृदय से दस बार ‘राधा’ कहा जाए तो उसका प्रभाव करोड़ गुना होता है।
विदेश में रहना कोई बाधा नहीं। भक्ति का देश नहीं, उद्देश्य मायने रखता है।
यदि मन पवित्र है, खान-पान सात्विक है, और नाम-जप निरंतर चल रहा है — तो हर स्थान वृंदावन है।
महाराज जी कहते हैं — “जहाँ नाम जपा जाए, वही प्रभु का धाम है।”
इसलिए स्थान नहीं, भावना को पवित्र बनाओ — यही सच्चा नाम-साधक है।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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