माला-1082: रोग और मृत्यु के भय से मन को कैसे संभालें?, श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: सांसारिक सफलता और भोगों की इच्छा रखने वाले को क्या श्री जी की प्राप्ति हो सकती है?

उत्तर: श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि यदि किसी के भीतर भोगों की इच्छा है, तब भी वह अंततः भगवत प्राप्ति के मार्ग पर जा सकता है। पहले मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति चाहता है, फिर जब उन भोगों से ऊबन आती है, तब ही भगवत लालसा जागृत होती है। भगवान कृपा करके कभी इच्छाओं को पूर्ण कर देते हैं, कभी उन्हें नष्ट कर देते हैं। परन्तु जो नाम-जप, भजन और सत्संग करता रहता है, वह धीरे-धीरे भोग से विरक्त होकर भगवान की ओर मुड़ जाता है। संसार की कोई वस्तु स्थायी नहीं; केवल श्री जी ही शाश्वत सुख का स्रोत हैं।


प्रश्न 2: रोग और मृत्यु के भय से मन को कैसे संभालें?

महाराज जी सरल बात कहते हैं—यह शरीर “व्याधि-मंदिर” है। किसी भी दिन, किसी भी बहाने से रोग आ सकता है; और एक दिन देह छोड़नी ही है। तो डर से भागो नहीं, उसे प्रभु-शरण का दरवाज़ा बना लो।

डर उठे तो तुरंत नाम पकड़ लो—राधा नाम। नाम से मन वर्तमान में टिकता है और भय से दूरी बनती है। “एक ही बार मरना है”—यह समझ कर मन को स्थिर करो। कौन-सा कारण होगा, कब होगा—यह हमारे वश में नहीं; पर नाम-स्मरण और समर्पण हमारे वश में है।

समर्पण का अभ्यास यूँ करो—भीतर से कहो, “प्रभु, मैं आपकी हूँ/आपका हूँ। यह देह भी आपकी है। आप जैसा चलाएँ, मैं वैसा ही स्वीकार करूँगा/करूँगी।” जब मन ऐसा सौंप देता है, तो मृत्यु का भाव भी कृपा-रूप लगने लगता है।

महाराज जी समझाते हैं—डर बुरा नहीं, अगर वह हमें भगवान की शरण में पहुँचा दे। भय को दबाने की जगह, उसे प्रार्थना बना दो—“नाथ, मेरे इस भय को अपने नाम में जोड़ दीजिए।” यही भाव डर को साधना में बदल देता है।

प्रारब्ध बड़ा हो तो भी निराश न हों। भगवान चाहें तो कर्म-फल काट दें, और अगर फल देना हो तो सहने की ताक़त भी वही देते हैं। इसलिए उपाय एक ही—नाम-जप, सत्संग सुनना, और मन से समर्पण।

कैंसर जैसे रोग आज आम लगते हैं; यह देखकर घबराहट बढ़ती है। ऐसे समय में बार-बार निर्णय लो—मैं भय नहीं, नाम चुनूँगा/चुनूँगी। हर घबराहट पर राधा नाम की एक माला। यही छोटी-सी निरंतर साधना मन को थाम लेती है और भीतर यह भरोसा जगा देती है कि प्रभु साथ हैं—यही सच्ची शांति है।

प्रश्न 3: आध्यात्मिक प्रेम और व्यक्तिगत प्रेम में क्या अंतर है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि सांसारिक प्रेम स्वार्थ और देह पर आधारित होता है, जबकि आध्यात्मिक प्रेम आत्मा और भगवान के प्रति होता है। सांसारिक प्रेम राग, मोह और कामनाओं से भरा होता है, जो क्षणिक है। पर भगवत-प्रेम निःस्वार्थ और अनंत है — उसमें केवल देना होता है, लेना नहीं। जब प्रेम आत्मा से जुड़ता है, तब वही सच्चा प्रेम बनता है। यही प्रेम आत्मा को परमात्मा से जोड़ देता है।


प्रश्न 4: आत्मा, परमात्मा और गुरु में कौन सर्वोच्च है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह तीनों अलग नहीं हैं। जो आत्मा है, वही परमात्मा है, और वही कृपा करके गुरु रूप में प्रकट होते हैं। गुरु कोई साधारण मनुष्य नहीं — वे स्वयं परम ब्रह्म हैं, जो हमें अपने चरणों में शरण देते हैं। जो अपने गुरु को केवल मनुष्य समझता है, वह कभी कल्याण नहीं पा सकता। गुरु, आत्मा और परमात्मा — ये तीनों एक ही तत्व के रूप हैं।


प्रश्न 5: जब जानते हैं कि दोष-दर्शन नहीं करना चाहिए, फिर भी दूसरों में दोष दिखता है — क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब हम किसी में दोष देखते हैं, तो वास्तव में वह दोष हमारे भीतर होता है। यदि हम निर्दोष होंगे तो संसार में कोई दोषी नहीं दिखेगा। भगवान की लीला में सभी गुण और दोष उनके द्वारा ही नचाए जा रहे हैं। इसलिए किसी की निंदा मत करो, किसी वैष्णव में दोष मत देखो। यदि कभी ऐसा भाव उठे, तो उसी क्षण मन से प्रणाम कर लो — “प्रभु, इसमें भी आप ही विराजमान हैं।” यह भाव हृदय को शुद्ध करता है और भक्ति को स्थिर करता है।


प्रश्न 6: जो व्यक्ति अत्यंत पीड़ा में है परंतु अध्यात्म से अनभिज्ञ है, उसकी सहायता कैसे करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को नाम-संकीर्तन और भगवत कथा का श्रवण कराओ। जब तक उसका शरीर है, तब तक उसके आसपास नाम का वातावरण रखो। वह सुन भी लेगा तो उसका मंगल हो जाएगा, क्योंकि श्रवण का फल कथन के समान होता है। यदि वह बिना भजन के चला गया, तो अपने कर्मों का फल उसे भोगना ही होगा। पर यदि अन्त समय में भी भगवान का नाम उसके कानों में पड़े, तो उसका कल्याण निश्चित है।


प्रश्न 7: मोबाइल में सत्संग का बहाना लेकर प्रपंच देखने की प्रवृत्ति कैसे रोकी जाए?

उत्तर:
महाराज जी बहुत व्यवहारिक उत्तर देते हैं — मोबाइल साधन है, बाधा नहीं। यदि हम संयम रखें तो वह साधना का माध्यम बन सकता है। समस्या यह है कि मन अनुशासित नहीं। नियम रखो कि केवल सत्संग ही देखना है, बाकी तुरंत बंद कर देना है। अन्यथा यही साधन प्रपंच का जाल बन जाएगा। संयम, नाम-जप और आत्मनियंत्रण से ही यह संभव है। राधा नाम को “लाइन ब्रेकर” बनाओ — जैसे ही मन बहकने लगे, तुरंत नाम का स्मरण करो।


प्रश्न 8: अपनी कमजोरियां जानते हुए भी उन्हें छोड़ नहीं पा रहे — क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — भगवान से प्रार्थना करो और नाम-जप करो। यदि मनमानी छोड़ोगे नहीं, तो भगवान ऐसी परिस्थिति देंगे कि विवेक जागृत हो जाएगा। पाप कर्म का परिणाम बहुत भारी होता है। इसलिए डरना सीखो — पाप से डरो, गलत आचरण से डरो। जो कर्म अभी छोटा लगता है, वही आगे प्रारब्ध बन जाता है और कई जन्मों तक भोगना पड़ता है। यदि कोई भूल हो गई है तो उसका प्रायश्चित करो, नाम-जप और भजन के द्वारा पाप नष्ट हो जाता है।


प्रश्न 9: क्या भगवान बार-बार क्षमा करते हैं?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — भगवान वात्सल्य सागर हैं। वे बार-बार क्षमा करते हैं, पर साधक को प्रयास करना चाहिए कि मन के वश में न जाए। मन बहुत चंचल और अधोगामी है। नाम-जप, सत्संग और गुरु की आज्ञा के पालन से ही इसे नियंत्रित किया जा सकता है। भोजन और संगति का भी मन पर गहरा प्रभाव है — सतोगुणी आहार और वातावरण अपनाओ। जब मन पवित्र होगा, तब भजन में स्थिरता आएगी और क्षमा की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।


प्रश्न 10: कर्म-त्याग और कर्म-संन्यास में क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि कर्म छोड़ देना सन्यास नहीं, बल्कि कर्म करते हुए फल की आशा का त्याग करना सच्चा कर्म-त्याग है। जो अपने कर्तव्य को पूर्ण श्रद्धा से करते हुए फल को ईश्वर को अर्पित करता है, वही सच्चा त्यागी है। केवल निष्क्रिय रहना, जब तक स्वरूप-बोध नहीं हुआ, व्यर्थ है। भगवान ने हर आश्रम के लिए उचित कर्म बताए हैं — उन्हें करते हुए, अहंकार त्याग कर ही मुक्ति मिलती है।


प्रश्न 11: क्या दूसरों का कल्याण करना आवश्यक है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं — जब आत्मा ब्रह्म का अनुभव करती है, तब “दूसरा” कोई नहीं बचता। स्वयं का आत्मोद्धार ही सबका कल्याण है। जब अपनी दृष्टि निर्मल हो जाती है, तो सम्पूर्ण जगत ब्रह्म स्वरूप दिखाई देता है। अतः दूसरों को सुधारने की जगह स्वयं को सुधारो — यही सर्वोच्च सेवा है।


प्रश्न 12: क्या केवल प्रणव (ॐ) जप से वेदों का सार प्राप्त हो सकता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि प्रणव (ॐ) ही वेदों का उद्गीत है। इसका निरंतर अंतर्मन में जप करने से साधक के भीतर वेदांत का सार प्रकट हो जाता है। यह वाचिक जप नहीं, बल्कि हृदय में होने वाला ध्यान है। जितना इसका मनन होगा, उतना हृदय पवित्र होगा। प्रणव जप ही वेदों का सार और मोक्ष का द्वार है।


प्रश्न 13: गुरु-कृपा और शास्त्र ज्ञान में कौन श्रेष्ठ है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — शास्त्र ज्ञान बाह्य है, जो बुद्धि को विकसित करता है, परन्तु गुरु-कृपा से प्राप्त अनुभव ज्ञान ही माया-मल का नाश करता है। गुरु ही साधक को भीतर का प्रकाश दिखाते हैं। जब साधना, नाम-जप और गुरु की कृपा एक हो जाते हैं, तब ज्ञान पूर्ण होता है और आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है।


Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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