माला-1076: जरूरत से ज्यादा सोचना बंद कैसे करें?, श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: जरूरत से ज्यादा सोचना बंद कैसे करें?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि अधिक सोचना ही मनुष्य को डिप्रेशन की ओर ले जाता है। जब विचारों का प्रवाह अनियंत्रित हो जाता है, तो मन भारी और अस्थिर हो जाता है। इसे रोकने का उपाय केवल नाम जप है। जब हम “राधा राधा” का जप करते हैं, तो मन धीरे-धीरे निर्मल, शांत और आनंदमय होता है। ओवरथिंकिंग, नेगेटिव सोच — ये सब नाम जप के तेज में जलकर समाप्त हो जाते हैं। महाराज जी कहते हैं कि “जो दवाओं की दवा है, वह है नाम जप।” मन को नाम में लगाओ, वही सब रोगों का उपचार है।


प्रश्न 2: हमें भी आप जैसा ‘गवार’ बनना है, यह डिग्री कैसे मिले?

उत्तर:
महाराज जी मुस्कुराकर कहते हैं कि “हम तो गवार हैं” — इसका अर्थ अज्ञान नहीं, बल्कि अहंकार से मुक्त होना है। वे बताते हैं कि जो अपने प्रभु का दास बन गया, वही सच्चा ज्ञानी है। वे स्वयं को गवार इसलिए कहते हैं क्योंकि उनके लिए सबसे बड़ा ज्ञान है — अपने ईश्वर के चरणों में समर्पण। वे कहते हैं कि “हमारे मालिक का प्रताप ही सब कुछ है।” सच्ची गवारियत वह है जिसमें मनुष्य अपनी बुद्धि का नहीं, प्रभु की कृपा का भरोसा रखता है। यही दिव्य विनम्रता की डिग्री है।


प्रश्न 3: ‘सबको समेटकर ले जाएंगे’ — इसमें कौन आएंगे?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जो निरंतर राधा नाम जपते हैं, प्रभु की शरण में रहते हैं — वे सब प्रभु की नौका में बैठ जाते हैं। जो थोड़ी सी भी भक्ति से जुड़ते हैं, उनका उद्धार निश्चित है। प्रभु स्वयं उन्हें खींचकर ले जाते हैं, क्योंकि भक्त और भगवान का संबंध कभी अधूरा नहीं रहता। महाराज जी कहते हैं — “प्रभु के चरणारविंद रूपी नौका में गुरु रूपी खवैया सबको पार ले जाता है।”


प्रश्न 4: नाम वाणी भावपूर्वक नहीं कर पा रहा, इससे हृदय में जलन क्यों होती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह जलन शुभ है — यह आंतरिक परिवर्तन की शुरुआत है। जब साधक का अंतःकरण शुद्ध होने लगता है, तो भीतर तपन होती है। यही तपन पापों को जला देती है और भक्ति को प्रज्वलित करती है। महाराज जी कहते हैं — “यह जलन ही ठीक कर देगी।” जब यह कसक असहनीय हो जाए, तब समझना कि भगवान का कृपा प्रवाह भीतर उतर रहा है। यही भक्ति की परिपक्वता की निशानी है।


प्रश्न 5: क्या असहाय जीव की रक्षा करने से भगवत प्राप्ति होगी?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि परोपकार से पुण्य तो मिलता है, लेकिन भगवत प्राप्ति नहीं। बिना भजन के केवल पुण्य करने से मनुष्य स्वर्गलोक तक पहुंचता है, मोक्ष नहीं। भगवत प्राप्ति के लिए हर कार्य भगवान को समर्पित करना आवश्यक है। यदि किसी की सहायता ईश्वर भावना से की जाए और साथ में नाम जप हो, तब वही कर्म मोक्षदायी बनता है। वे कहते हैं — “बिना हरि भजन, भव सागर पार नहीं।”


प्रश्न 6: सूक्ष्म अहंकार पर कैसे विजय प्राप्त करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि अहंकार के तीन नाशक उपाय हैं —
1️⃣ सब में भगवान को देखना और सबको प्रणाम करना।
2️⃣ सद्गुरु को परम ब्रह्म मानकर उनकी आज्ञा के अनुसार चलना।
3️⃣ भक्तों की चरणरज, चरणामृत और नाम जप ग्रहण करना।
जब साधक हर जीव में प्रभु को देखने लगता है, तब अहंकार गल जाता है। विनम्रता ही भक्ति की पहचान है।


प्रश्न 7: शरणागत साधक की त्रुटि का दोष गुरु पर क्यों लगता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह भय हर शिष्य में रहना चाहिए कि हमारे कारण गुरु को पीड़ा न पहुंचे। गुरु केवल व्यक्ति नहीं, वे चराचर में व्याप्त चेतना हैं। यदि हम किसी को दुख देते हैं, तो वह हमारे गुरु को ही दुख पहुँचता है। इसलिए सजग रहना ही शिष्य का धर्म है — “गुरुदेव को सुख देना हमारा कर्तव्य है, दुख देना सबसे बड़ा अपराध।”


प्रश्न 8: संत पुण्य संग्रह की प्रेरणा क्यों देते हैं?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि जो भगवत प्रेम से रहित होते हैं, वही स्वर्ग और पुण्य की बात करते हैं। जिनके हृदय में ईश्वर प्रेम जागा है, वे केवल प्रेम और नाम की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं — “स्वर्ग सार बात नहीं, भगवान का चरणारविंद ही सार है।” पुण्य से स्वर्ग मिलता है, लेकिन नाम से भगवान मिलते हैं।


प्रश्न 9: क्या कृपा मार्ग में सब कार्य सहजता से होते हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह मार्ग सीढ़ियों और लिफ्ट दोनों जैसा है। कुछ साधक श्रम करके चढ़ते हैं, और कुछ कृपा रूपी लिफ्ट में बैठ जाते हैं। जिनके भीतर भरोसा है कि “प्रभु की कृपा से ही प्रभु की प्राप्ति होगी,” वही कृपा मार्ग के यात्री हैं। नाम जप करते हुए, गुरु की शरण में रहकर जो चलता है, वह कृपा की लिफ्ट में चढ़ चुका है।


प्रश्न 10: प्रतिकूलता में भजन का आनंद अधिक क्यों मिलता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि असली साधक के लिए अनुकूलता–प्रतिकूलता दोनों समान हैं। जो हर परिस्थिति में राधा नाम जपता है — वही विजयी है। जब सुख या दुख का प्रभाव भजन पर नहीं पड़ता, तब भक्ति स्थिर होती है। “मान है तो राधा, अपमान है तो राधा, यही जीत है।” प्रतिकूलता मन को झुकाती है, और वही झुकाव प्रेम को जन्म देता है।


प्रश्न 11: अपनों से मोह खत्म हो रहा है, क्या यह स्वार्थ है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि अगर यह मोह भक्ति के प्रभाव से घट रहा है, तो यह बड़ी कृपा है। जब भजन गहराता है, तो आसक्ति हटती है और प्रेम शुद्ध होता है। भक्त अपने परिवार को अब मोह से नहीं, बल्कि ईश्वर के रूप में देखता है। लेकिन यदि हमारे व्यवहार में रूखापन आ गया, तो यह भक्ति नहीं, स्वार्थ है। सच्चा भक्त सबमें भगवान को देखता है और सबके प्रति मधुरता रखता है।


प्रश्न 12: मेरा कोई इष्ट नहीं, सब नाम प्यारे लगते हैं — क्या यह बाधा है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “नहीं, प्रारंभ में सब रूप, सब नाम प्रिय लगते हैं।”
जब साधना आगे बढ़ती है, तब मन एक में टिकता है। जैसे विवाह से पहले अनेक चेहरे सुहावने लगते हैं, पर विवाह के बाद केवल एक ही प्रिय होता है। भक्ति भी ऐसी ही है — प्रारंभ में अनेक नाम प्रिय लगते हैं, पर अंत में केवल एक नाम में प्रेम समा जाता है। अतः चिंता नहीं, साधना करते रहो।


प्रश्न 13: गिरिराज जी की दंडवत परिक्रमा गरीब लोग ही क्यों करते हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि वास्तव में वही सच्चे अमीर हैं जो गिरिराज जी की रज में लोटते हैं। जिनके पास भक्ति का धन है, वही धनी हैं। जो केवल सांसारिक धन में रमे हैं, वे तो अपने पुण्य का भोग कर रहे हैं। गिरिराज की परिक्रमा करने वालों के लिए महाराज जी कहते हैं — “उनको प्रणाम करो, सेवा करो, क्योंकि वे तन, मन, धन से गिरिराज के चरणों में लोट रहे हैं।”

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

यह भी पढ़ें : माला-1064

1 thought on “माला-1076: जरूरत से ज्यादा सोचना बंद कैसे करें?, श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा”

Leave a Reply