प्रश्न 1: भगवान के दर्शन का सबसे आसान उपाय क्या है?
उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवान के दर्शन का सबसे सरल उपाय नाम-जप है। जब मनुष्य प्रेम से प्रभु का नाम जपता है, तो वह भीतर से निर्मल होने लगता है। नाम-जप केवल शब्द नहीं है, यह प्रेम का स्रोत है। जितना अधिक नाम-जप किया जाए, उतना हृदय शुद्ध होता है और उतना ही भगवान का अनुभव स्पष्ट होने लगता है। जब मन पवित्र हो जाता है, तब भगवान स्वयं प्रकट होते हैं। इसलिए महाराज जी कहते हैं — “नाम जपो, भगवान की लीला सुनो और हर जगह भगवत भावना करो।” जब मन निर्मल हो जाता है, तब भगवान उसी में अपना साक्षात्कार कराते हैं।
प्रश्न 2: क्या राधा रानी की कृपा प्राप्त करना कठिन है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “कृपा कठिन नहीं, हमारी दृष्टि ही गलत है।” यदि हम मानते हैं कि राधा रानी बहुत दूर हैं, तो वह दूर दिखाई देंगी। पर यदि हम उन्हें अपने हृदय में अनुभव करें, तो वे सबसे निकट हैं। भगवान बाहर भी हैं और भीतर भी — बस हमारी श्रद्धा की दिशा सही होनी चाहिए। जो यह मानता है कि “मैं राधा रानी की कृपा से ही जीवित हूं”, वही कृपा के सागर में डूबा रहता है। कृपा का अर्थ कुछ मांगना नहीं, बल्कि यह अनुभव करना है कि “कृपा पहले से ही मुझ पर है।” इसलिए महाराज जी कहते हैं — नकारात्मक सोच छोड़ो, पॉजिटिव सोचो, और हृदय से नाम-जप करते रहो।
प्रश्न 3: क्या आज के समय में अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है?
उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं कि मोक्ष कोई भागने का मार्ग नहीं है, बल्कि धर्मयुक्त कर्म करने का फल है। जो व्यक्ति अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करता है और साथ ही निरंतर नाम-जप करता है, वही मुक्ति के निकट पहुंचता है। संसार में रहकर, अपने परिवार और समाज के कर्तव्य निभाते हुए भी यदि मन भगवान में स्थित है, तो वही सच्चा योग है। कर्म करो, पर उसका फल भगवान को अर्पित करो — यही कर्म योग है जो अंततः भक्ति योग में बदल जाता है।
प्रश्न 4: किसी दोषी व्यक्ति का बचाव करने वाले वकील के लिए धर्म क्या कहता है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि “धर्म बड़ा सूक्ष्म है।” यदि किसी व्यक्ति के दोषी होने का ज्ञान हो और फिर भी उसे धन के लालच में बचाया जाए, तो यह अधर्म है। वकील का धर्म है — न्याय की रक्षा करना, न कि झूठ को सिद्ध करना। यदि कोई निर्दोष व्यक्ति आपके माध्यम से बचता है तो वह पुण्य है, परंतु यदि आप अपराधी का बचाव करते हैं तो यह बुद्धि को विकृत करता है। महाराज जी का संदेश है कि “धन से ऊपर धर्म को रखो।” गलत पक्ष के लिए काम करना आत्मा को दूषित कर देता है। इसलिए केवल धर्म युक्त कर्म ही मोक्ष का मार्ग खोलते हैं।
प्रश्न 5: नए कार्य या नाम-जप की शुरुआत में उत्साह क्यों घट जाता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि उत्साह की कमी का कारण अशुद्ध आचरण है। जब हमारे भीतर नकारात्मक संस्कार और पुराने पाप सक्रिय रहते हैं, तो वे उत्साह को धीरे-धीरे नष्ट करते हैं। इसके विपरीत, पवित्र आचरण और संयम से उत्साह बढ़ता है। समाधान भी स्पष्ट है — “नाम-संकीर्तन।” भगवान का नाम कीर्तन पापों को जलाकर मन को पवित्र करता है। महाराज जी कहते हैं — “नाम संकीर्तनम यस सर्व पाप प्रणाशनम।” प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा नाम-जप करो, संयम रखो, और गंदे विचारों से दूर रहो। उत्साह अपने आप लौट आएगा, क्योंकि जहाँ भक्ति है वहाँ आनंद स्वतः है।
प्रश्न 6: क्या किसी साधु से मिला पंचाक्षरी मंत्र बिना विधिपूर्वक ग्रहण किए जपा जा सकता है?
उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — “मंत्र का कीर्तन नहीं, जप होता है।” पंचाक्षरी या द्वादशाक्षरी मंत्र शास्त्र अनुसार केवल गुरु से विधिपूर्वक ग्रहण करने के बाद ही जपा जा सकता है। आजकल लोग इन मंत्रों को सार्वजनिक रूप से स्पीकर पर उच्चारित करते हैं, जो अमंगलकारी है। मंत्र कान में गुरु द्वारा दिया जाता है, गाड़ी पर लिखने या गाने का विषय नहीं है। मानसिक या उपांश जप ही शुद्ध माना गया है। महाराज जी चेतावनी देते हैं कि “मंत्र का अपमान नरक का द्वार खोलता है।” इसलिए केवल योग्य गुरु से मंत्र ग्रहण कर, पवित्र स्थान पर मन लगाकर जप करना चाहिए।
प्रश्न 7: अनन्यता का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “अनन्यता का अर्थ है — एक के सिवा दूसरा न देखना।” जैसे मीरा कहती हैं, “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।” जब हृदय में केवल एक ही इष्ट का भाव रह जाए और अन्य कोई विचार न टिके, वही अनन्यता है। तुलसीदास जी कहते हैं — “एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।” जब भक्त का मन केवल भगवान में विलीन हो जाए और संसार का आकर्षण समाप्त हो जाए, तब भक्ति पूर्ण होती है। महाराज जी के अनुसार, “अपने इष्ट को पूरे जगत में देखना, यही अनन्यता का चरम रूप है।”
प्रश्न 8: क्या कर्म को प्रभु को समर्पित करना कर्म योग है या भक्ति योग?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जब हम निष्काम भाव से कर्म करते हैं — यानी किसी फल की इच्छा नहीं रखते — तो वह कर्म योग है। लेकिन जब वही कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए किया जाता है और अंत में उन्हें समर्पित कर दिया जाता है, तो वह भक्ति योग बन जाता है। इस अवस्था में कार्य पूजा बन जाता है। महाराज जी उदाहरण देते हैं — जैसे नंदी जी अपने हर कार्य को महादेव को अर्पित करते हैं। ऐसा भाव आने पर मनुष्य कर्मी नहीं, भक्त हो जाता है।
प्रश्न 9: समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का मार्ग क्या है?
उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि सकारात्मकता केवल तभी फैल सकती है जब व्यक्ति के भीतर शांति और आनंद हो। यदि मन चिंता, भय और विषाद से भरा है, तो बाहर सकारात्मकता का अभिनय ही होगा। जब हम भगवान की शरण में जाते हैं और हर व्यक्ति में भगवान का रूप देखते हैं, तब भीतर की प्रसन्नता से पॉजिटिव ऊर्जा निकलती है। यही कारण है कि संतों का संग आवश्यक है — संतों का समागम हमें नेगेटिविटी से निकालकर आनंद से भर देता है। महाराज जी कहते हैं — “जब हम आनंद में होते हैं, तभी दूसरों को आनंद दे सकते हैं।”
प्रश्न 10: मृत्यु के बाद संत या गुरु की निकटता कैसे बनी रहती है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि शरीर नाशवान है, पर आत्मा अविनाशी। जब कोई शिष्य अपने गुरु की आज्ञा पर चलता है, तो गुरु का चिदानंद स्वरूप उसके हृदय में बस जाता है। शरीर की दूरी प्रेम की दूरी नहीं होती। जैसे महाराज जी स्वयं कहते हैं कि “जो हमारी वाणी को अपनाता है, वह हमारे साथ ही है।” संतों की निकटता शरीर से नहीं, श्रद्धा से होती है। यदि श्रद्धा अटल है, तो संत का चिदानंद स्वरूप सदा साथ रहता है। यही सच्ची निकटता है, जो काल और मृत्यु से परे है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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