प्रश्न 1: नाम जप करते समय राधा जी के स्वरूप का चिंतन करें या केवल राधा नाम का?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि राधा जी का स्वरूप मनुष्य की साधारण दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। यह स्वरूप माया की सीमा से परे है, इसलिए सामान्य आंखों से उसका दर्शन असंभव है। राधा नाम का जप करते हुए जब साधक का मन निर्मल होता जाता है, तब दिव्य दृष्टि धीरे-धीरे प्रकट होती है। यही नाम जप की साधना का रहस्य है — पहले नाम को साधो, स्वरूप स्वयं प्रकट होगा।
महाराज जी कहते हैं कि जो रूप कृष्ण को भी मोहित कर देता है, वह केवल नाम की कृपा से दिखाई देता है। जब साधक श्रद्धा से राधा नाम का जप करता है, तब उसके भीतर वह दिव्यता प्रकट होने लगती है जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। जैसे किसी मिठाई का स्वाद केवल चखने से जाना जा सकता है, वैसे ही राधा नाम का रस भी अनुभव से जाना जाता है, वर्णन से नहीं।
राधा नाम जप का अर्थ है — अपने भीतर उस माधुर्य, उस प्रेम और उस निश्चल समर्पण को जगाना जो राधा स्वरूप का सार है। जब साधक नाम में खो जाता है, तब राधा जी का स्वरूप उसी के अंतःकरण में चमक उठता है। इसलिए, रूप का चिंतन नहीं, नाम का जप ही राधा स्वरूप का साक्षात्कार कराता है।
प्रश्न 2: जीवन के कठिन समय में अध्यात्म तथा आध्यात्मिक गुरु से कैसे मदद प्राप्त करें ताकि नकारात्मकता और चिंता से मुक्ति मिले?
उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि कठिन समय में मनुष्य का सबसे बड़ा आधार उसका गुरु और उसका भजन होता है। जब मन दुखी हो, जब संसार प्रतिकूल लगे, तब बाहरी परिस्थितियों को नहीं, बल्कि अपने मन को बदलना आवश्यक है। यही अध्यात्म का आरंभ है। गुरु की कृपा का अर्थ है — अपने भीतर यह शक्ति जागृत होना कि हम उनकी बताई दिशा में चल सकें।
जीवन में जब भी तनाव, चिंता या असफलता आती है, तो मनुष्य सामान्यतः बाहरी समाधान खोजता है; पर महाराज जी समझाते हैं कि यह सब मन की अशुद्धि से उपजता है। नाम जप करते हुए जब मन शांत होता है, तब भीतर से एक दिव्य ऊर्जा जन्म लेती है जो हमें हर परिस्थिति का सामना हँसते हुए करने की शक्ति देती है। यही आध्यात्मिक पावर है।
वे यह भी बताते हैं कि विपत्ति कोई दंड नहीं, बल्कि साधक की परीक्षा है। यदि हम नाम जप करते रहें, सदाचरण में टिके रहें, और गुरु वचन में विश्वास रखें, तो कोई नकारात्मकता हमें छू नहीं सकती। वर्तमान में रहते हुए, हर कार्य को ईश्वर अर्पण भाव से करना ही शांति का रहस्य है। प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — जब उद्देश्य भक्ति हो जाए, तब जीवन का हर कार्य पूजा बन जाता है।
प्रश्न 3: ब्रह्मानंद, समाधि और लीला अनुभव में क्या अंतर है?
उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि अध्यात्म के अनेक मार्ग हैं और प्रत्येक का अनुभव अलग-अलग है। अष्टांग योग से मिलने वाला अनुभव ‘समाधि’ कहलाता है, जिसमें साधक मन और इंद्रियों को पूरी तरह स्थिर कर देता है। वेदांत मार्ग से जो अनुभव होता है, उसे ‘ब्रह्मानंद’ कहा गया है — जहाँ आत्मा अपने स्वरूप का बोध करती है और कहती है, “मैं वही हूँ।”
किन्तु भक्ति मार्ग में जो अनुभव प्रकट होता है, वह सबसे मधुर है — वह है ‘लीला अनुभव’। इसमें साधक स्वयं को ईश्वर की सेवा में पूर्ण रूप से विलीन कर देता है। यह केवल ज्ञान नहीं, प्रेम का सागर है, जहाँ आत्मा और भगवान का संबंध प्रेम से बंधता है।
महाराज जी कहते हैं कि भक्ति मार्ग में प्रवेश केवल भाव से होता है, ज्ञान से नहीं। जब गुरु की कृपा से साधक अपने स्थूल और सूक्ष्म शरीर की सीमाओं को पार करता है, तब वह ‘चिदानंदमय देह’ में प्रवेश करता है, जो ईश्वर की नित्य लीला में सहभागी होती है। समाधि और ब्रह्मानंद जहाँ सीमित योग या ज्ञान की परिणति हैं, वहीं लीला अनुभव अनंत है — यह साक्षात आनंद का प्रवाह है, जो केवल राधा-कृष्ण प्रेम में मिल सकता है।
प्रश्न 4: क्या बिना ब्रह्मज्ञान के “अहम् ब्रह्मास्मि” कहा जा सकता है?
उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं कि केवल “अहम् ब्रह्मास्मि” कह देने से ब्रह्मत्व की प्राप्ति नहीं होती। जैसे कोई व्यक्ति स्वयं को प्रधानमंत्री कह दे, तो वह बन नहीं जाता, वैसे ही ब्रह्म की घोषणा भी तभी सत्य होती है जब उसके अनुरूप शक्ति और चेतना प्रकट हो।
ब्रह्मज्ञान केवल वाणी से नहीं, साधना और गुरु कृपा से आता है। गुरु ही वह शक्ति हैं जो साधक को माया से पार ले जाते हैं। वे बताते हैं कि स्वयं ब्रह्मर्षि भी श्रीकृष्ण की इच्छा के विपरीत कुछ नहीं कर सकते — क्योंकि परम ब्रह्म श्रीकृष्ण ही हैं।
महाराज जी कहते हैं कि “अहम् ब्रह्मास्मि” का भाव गलत नहीं है, परंतु इसे अहंकार से कहना सबसे बड़ा भ्रम है। यह वाक्य आत्मबोध का प्रतीक है, न कि अधिकार का। जब गुरु कृपा से साधक अपने भीतर स्थित दिव्यता का साक्षात्कार करता है, तब यह वाक्य स्वतः सत्य हो जाता है।
कलियुग में यह मार्ग अत्यंत कठिन है — क्योंकि मनुष्यों में विरक्ति और एकाग्रता दोनों क्षीण हैं। इसलिए महाराज जी सलाह देते हैं कि यदि कोई “मैं राधा-कृष्ण का दास हूँ” यह भाव अपनाए, तो वही ब्रह्मज्ञान का सार बन जाता है। शरणागत भाव ही सच्चा ब्रह्मत्व है।
प्रश्न 5: जब परिवार की चिंता बनी रहे, तब शरणागति कैसे सुदृढ़ करें?
उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि शरणागति का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि उसे भगवान की सेवा रूप में स्वीकार करना है। परिवार, बच्चे या समाज — ये सब ईश्वर द्वारा सौंपे गए दायित्व हैं। जैसे मंदिर में ठाकुर जी की सेवा होती है, वैसे ही गृहस्थ जीवन में भी सेवा होती है।
जब माता अपने बच्चे की देखभाल करती है, तो वह भी एक प्रकार की पूजा है, क्योंकि वह ईश्वर की सृष्टि की रक्षा कर रही है। चिंता तब समस्या बनती है जब उसमें “मैं” का भाव आ जाता है। जब साधक समझ लेता है कि सब कुछ प्रभु की लीला है और वह केवल निमित्त है, तब चिंता शरणागति में परिवर्तित हो जाती है।
महाराज जी बताते हैं कि हर व्यक्ति को अपने कर्तव्य निभाने चाहिए — पर उद्देश्य भगवान होना चाहिए। यही भक्ति का सार है। जब हम धन कमाएँ, व्यापार करें या परिवार का पोषण करें, तो यह भावना रखनी चाहिए कि यह सब भगवान के कार्य हैं।
सच्ची शरणागति वह है, जहाँ मनुष्य सब संबंधों से ऊपर उठकर केवल अपने इष्ट को ही “अपना” मानता है। बाकी सब सेवा का माध्यम हैं। प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं — जब जीवन का उद्देश्य भक्ति बन जाए, तो चिंता मिट जाती है, क्योंकि तब हर क्रिया पूजा बन जाती है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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