माला-1061: सबसे उत्तम मंत्र कौन-सा है?, श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: सबसे उत्तम मंत्र कौन-सा है जिसे हर कोई उच्चारित कर सकता है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि सबसे उत्तम मंत्र वह है जो भगवान के नाम से जुड़ा हो। भगवान के नाम अनंत हैं — राम, कृष्ण, राधा, हरि — ये सभी नाम पवित्र हैं और इन्हें कोई भी उच्चारण कर सकता है। नाम-जप में कोई विधि-विधान का बंधन नहीं है। जो व्यक्ति अपवित्र भी हो, यदि उसके होंठों पर भगवान का नाम आ जाए, तो वह भी पवित्र हो जाता है। महाराज जी कहते हैं — “नाम बाजार में बिकने वाली चीज नहीं, इसे गुरु की कृपा से प्राप्त किया जाता है।” इसलिए जो नाम हृदय को प्रिय लगे, उसी का जप करें; वही मुक्ति का द्वार है।


प्रश्न 2: मोक्ष की अवधारणा या सिद्धांत क्या है?

उत्तर:
महाराज जी के अनुसार, मोक्ष का अर्थ है — तीनों शरीरों से राग का त्याग और अपने आत्मस्वरूप का अनुभव। जब मनुष्य निर्माण, मान, और मोह से रहित होकर निंदा-स्तुति, सुख-दुख, लाभ-हानि, जन्म-मरण में समभाव को प्राप्त कर लेता है, तब वह मुक्त हो जाता है। यह स्थिति तब आती है जब साधक निरंतर आत्मा में रमण करता है। बिना इन गुणों को धारण किए कोई भी मोक्ष का अधिकारी नहीं हो सकता। साधना का लक्ष्य यही है कि व्यक्ति अपने भीतर के दोषों को जीतकर अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित हो जाए।


प्रश्न 3: भगवान सर्वज्ञ हैं, फिर हम मंदिर जाकर अपनी बातें क्यों कहते हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — जब यह प्रश्न उठता है, तो इसका अर्थ है कि अनुभव अभी अधूरा है। जिसने सच में हर जगह भगवान को देखा, वह कभी यह नहीं पूछता कि “क्यों कहना चाहिए।” भगवान सर्वत्र हैं, लेकिन जब कोई मंदिर जाता है, तो उसमें भगवान के दर्शन का भाव है, दोष-दर्शन का नहीं। मंदिर में जाकर प्रार्थना करना या मांगना गलत नहीं — वह हमारे पिता हैं, उनसे ही हम सब कुछ मांग सकते हैं। दोष दूसरों में नहीं, अपने दृष्टिकोण में है। जब दृष्टि भगवानमय हो जाएगी, तब प्रश्न मिट जाएगा।


प्रश्न 4: क्या प्रेमी भक्त को मोक्ष की इच्छा नहीं रखनी चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — सच्चे प्रेमी को मोक्ष की इच्छा होती ही नहीं। प्रेम में अलगाव भी आनंद बन जाता है। भक्त परमात्मा में लीन होना नहीं चाहता, वह परमात्मा की सेवा, नाम और प्रेम में रहना चाहता है। मोक्ष का अर्थ है “तरंग का सागर में लीन होना,” जबकि भक्त उस लीनता से भी आगे बढ़कर प्रभु का सान्निध्य चाहता है। वह कहता है — “मैं आपको देखूं, आपकी सेवा करूं, आपके गुण गाऊं।” इसलिए प्रेमी के लिए मोक्ष नहीं, प्रभु का दर्शन ही परम लक्ष्य है।


प्रश्न 5: प्रसन्नता का मार्ग क्या है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — सच्ची प्रसन्नता धन, पद, या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि भगवान के चिंतन और भक्ति में है। जो व्यक्ति नाम-जप, कथा-श्रवण और आराधना में लीन रहता है, वह ब्रह्मभूत होकर अखंड प्रसन्नता का अनुभव करता है। सांसारिक आनंद क्षणिक है — हर्ष और शोक दोनों उसमें जुड़े हैं। परंतु भक्ति का आनंद अविनाशी है, क्योंकि वह स्वयं भगवान का स्वरूप है। जब मन का सब कर्म भगवान को समर्पित हो जाए, तब मन में स्थायी प्रसन्नता जन्म लेती है।


प्रश्न 6: भगवान स्वयं परमेश्वर हैं, तो फिर कंस और कौरव उनसे क्यों लड़े?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यह सब भगवान की लीला है। कंस, रावण, और कौरव कोई साधारण जीव नहीं, बल्कि भगवान के ही पार्षद हैं, जिन्होंने लीलाओं में विरोधी भूमिका निभाई। जैसे किसी नाटक में हीरो के साथ विलेन भी जरूरी होता है, वैसे ही भगवान की लीलाओं में विरोधी पात्र लीला को रोचक बनाते हैं। भगवान अपने ही बल से उन्हें बलवान बनाते हैं, ताकि अपने ही बल का दर्शन करा सकें। उनकी लीला सुनकर ही जीव का कल्याण होता है। यही कारण है कि कथा-श्रवण और नाम-जप से ही भगवत्‌प्राप्ति संभव है।


प्रश्न 7: अगर पाठ करते समय मन न लगे तो क्या पूजा फलदायी होगी?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — हां, पूजा फलदायी होगी। जैसे भोजन करते समय मन लगे या न लगे, पेट भर जाता है, वैसे ही नाम-जप या पाठ मन से हो या बिना मन के, उसका फल मिलता है। हां, जब मन लग जाता है, तब भक्ति का स्वाद और बढ़ जाता है। इसलिए मन लगे या न लगे, जप करते रहो; धीरे-धीरे रस उत्पन्न होगा और वही आनंद का द्वार खोलेगा।


प्रश्न 8: वानप्रस्थ आश्रम का पालन कठिन है, तो क्या नाम-जप ही पर्याप्त है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — आज के युग में वानप्रस्थ के नियम निभाना लगभग असंभव है। अब “कलियुग केवल नाम अधारा” — यही मार्ग शेष है। जब मनुष्य नाम-जप करता है, तो पाप भस्म हो जाते हैं और भाव का उदय होता है। जब भाव जागृत होता है, तब भगवान की प्राप्ति असंभव नहीं रहती। इस युग में कोई भी साधक यदि सच्चे भाव से नाम-जप करे, तो वही सबसे श्रेष्ठ वानप्रस्थ है।


प्रश्न 9: यदि नींद पर विजय न मिल सके तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — साधक की दिनचर्या साधना की रीढ़ है। अगर पहले अनुशासन था और अब ढीलापन आ गया है, तो इसका कारण केवल हमारी अपनी असावधानी है। बाहरी उपाय जैसे मिर्च लगाना कुछ नहीं बदलते; अंदर की चाहत सही होनी चाहिए। जब चाहत सच्ची हो, तो नींद, आलस्य या परिस्थिति कुछ नहीं रोक पाते। महाराज जी कहते हैं — “हमारी चाहत सही हो, तो प्रभु स्वयं हमें जगा देंगे।” सच्ची लगन से किया गया भजन कभी बाधित नहीं होता।


प्रश्न 10: यदि कोई हम पर क्रोध करे, तो क्या वह नया पाप बना रहा है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — हां, वह अपना नया कर्म बना रहा है। लेकिन साधक को उस पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। हमें किसी के क्रोध में क्रोध नहीं करना चाहिए, बल्कि क्षमा का अभ्यास करना चाहिए। यदि हम क्रोध का उत्तर क्रोध से देंगे, तो हमारा कर्म भी दूषित होगा। इसलिए “लेना-देना छोड़ो, मगन रहो।” क्षमा ही कर्मबंधन से मुक्ति का मार्ग है।


प्रश्न 11: गलत विचारों या नेगेटिव सोच को कैसे रोका जाए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “होई सोई जो राम रचि राखा।” जब हम हर घटना को भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार करते हैं, तब नकारात्मकता स्वतः मिट जाती है। नेगेटिव सोच इसलिए आती है क्योंकि हम नियंत्रण खो देते हैं। लेकिन जब हम नाम-जप में लगते हैं, तो मन भगवान से जुड़ता है, और व्यर्थ चिंतन समाप्त होता है। महाराज जी कहते हैं — “प्यार वही सच्चा है जो स्वार्थ रहित हो, और ऐसा प्यार केवल भगवान ही कर सकते हैं।” इसलिए नाम-जप ही मन का शुद्धिकरण है।


प्रश्न 12: क्या समाज सेवा भी भक्ति है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — जो भी पद या जिम्मेदारी हमें मिली है, वह समाज सेवा के लिए है। यदि हम उस सेवा को धर्मपूर्वक निभाते हैं, तो वही भक्ति है। समाज ने हमें जीवन दिया, अन्न-वस्त्र दिया — अब हमारा धर्म है समाज के प्रति उत्तरदायी होना। जो समाज के कल्याण के लिए कार्य करता है, वह अप्रत्यक्ष रूप से प्रभु की सेवा कर रहा होता है। सेवा और नाम-जप दोनों मिलकर भक्ति को पूर्ण करते हैं।


प्रश्न 13: तीर्थों में गलती हो जाए तो क्या उपाय करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — यदि किसी तीर्थ में अनजाने में भूल हो जाए, तो वहीं उसका प्रायश्चित करो। यमुना किनारे बैठो, नाम-संकीर्तन करो, परिक्रमा लगाओ और भगवान से क्षमा मांगो। तीर्थ में किया गया नाम-जप सारे पापों का नाश कर देता है। पाप को घर लाने की आवश्यकता नहीं; वहीं समाप्त करो। यही सबसे पवित्र उपाय है।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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