माला-1056:क्या किस्मत जैसा सच में कुछ होता है?, श्री Premanand Maharaj Ji के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: क्या किस्मत जैसा सच में कुछ होता है? क्या हमारी किस्मत हमारे ही हाथों में होती है?

उत्तर:
Premanand Maharaj Ji बताते हैं कि किस्मत कोई कल्पना नहीं, बल्कि हमारे कर्मों का प्रतिफल है। जीवन में जो कुछ घटता है, वह हमारे पूर्व जन्मों और वर्तमान कर्मों के अनुसार ही होता है। मनुष्य सोचता है कि वह अपनी तकदीर खुद लिख सकता है, पर वास्तव में सब विधाता के विधान से संचालित है। हां, एक बात निश्चित है — जब व्यक्ति नाम-जप करता है, तो भगवान उसे दुख सहने की शक्ति और आगे बढ़ने की क्षमता देते हैं। नाम ही वह शक्ति है जो हमारे भाग्य की दिशा बदलने की सामर्थ्य रखती है। इसलिए Maharaj Ji कहते हैं — किस्मत बदलनी नहीं है, उसे भक्ति से सुंदर बनाना है।


प्रश्न 2: काम, क्रोध, मोह, मत्सर का आक्रमण होने पर सबसे पहले क्या करना चाहिए?

उत्तर:
Premanand Maharaj Ji समझाते हैं कि जब मन पर काम या क्रोध का आक्रमण होता है, तब भगवान का स्मरण मानसिक रूप से कठिन हो जाता है। उस समय नाम का उच्चारण ज़रूरी है। मौन जप नहीं, बल्कि जोर से कीर्तन करना चाहिए — ताकि मन का विकार टूटे। वातावरण बदलना, सत्संग में बैठना या भगवद चर्चा सुनना भी मदद करता है। जब तक मन अस्थिर है, तब तक भगवान का दर्शन नहीं हो सकता। इसलिए ऐसे क्षणों में सबसे अच्छा उपाय है — “राधा-राधा” का कीर्तन करना और परिस्थिति से स्वयं को अलग कर लेना। यह नाम ही वह शक्ति है जो हमें अंदर की अशुद्धियों से बचाता है।


प्रश्न 3: नाम-जप और नाम-कीर्तन में क्या फर्क है?

उत्तर:
Premanand Maharaj Ji बताते हैं कि नाम-जप और नाम-कीर्तन दोनों का उद्देश्य एक ही है — भगवद स्मरण। अंतर केवल स्थिति का है। जब मन शांत हो, तब नाम-जप करें — भीतर ही भीतर “राधा-राधा” की धारा बहने दें। लेकिन जब मन अशांत या भावावेश में हो, तब नाम-कीर्तन करें। नाम को गाते हुए उच्चारित करने से भाव प्रकट होता है और मन के विकार दूर होते हैं। यह दोनों ही भक्ति के दो पंख हैं — एक अंतरमुखता देता है, दूसरा भावप्रवाह। अंततः दोनों का लक्ष्य एक ही है — प्रभु का अनुभव।


प्रश्न 4: वर्तमान समय में नैतिक शिक्षा के गिरते स्तर का जिम्मेदार कौन है?

उत्तर:
Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि दोष किसी एक व्यक्ति का नहीं, यह युग का प्रभाव है। जब माता-पिता मर्यादा छोड़ते हैं, तो बच्चे भी अनुशासन भूल जाते हैं; जब शिक्षक आदर्श नहीं रखते, तो विद्यार्थी दिशा खो देते हैं। कलियुग का धर्म ही ऐसा है कि असत्य, छल, व्यसन और लालच बढ़ रहे हैं। लेकिन इसका उपाय भी इसी युग में है — भगवान का नाम-जप। नाम-जप से वह पुण्य जागता है जो हजारों वर्षों की तपस्या से भी नहीं मिलता। यही साधन है जो घर-घर में कलियुग के अंधकार को दूर कर सकता है।


प्रश्न 5: जब सेवा करते हुए मन थकने या निराशा महसूस करे, तब क्या करें?

उत्तर:
Maharaj Ji कहते हैं कि यह थकान इस बात का संकेत है कि हमने अपने कर्म को ईश्वर से नहीं, संसार से जोड़ लिया है। जब सेवा में भगवान का आश्रय होता है, तब थकावट नहीं आती, केवल संतोष रहता है। जो व्यक्ति निस्वार्थ होकर सेवा करता है, उसकी हर आवश्यकता स्वयं भगवान पूरी करते हैं। Maharaj Ji स्वयं कहते हैं कि जब साधु-संतों का भोजन, आवास और व्यवस्था भगवान करा सकते हैं, तो भक्त की आवश्यकताएँ भी वही पूरी करेंगे। इसलिए निराशा का इलाज है — नाम-जप और श्रद्धा। सेवा को भगवान का कार्य मानकर कीजिए, तो हर थकावट भक्ति में विलीन हो जाएगी।


प्रश्न 6: श्री जी की कृपा कैसे प्राप्त होती है? कृपा पात्र साधक कैसे बने?

उत्तर:
Premanand Maharaj Ji बताते हैं कि कृपा साधन से नहीं, साधन के भाव से मिलती है। जैसे यशोदा मैया ने भगवान को पकड़ने का प्रयास किया, पर वह भागते रहे। जब मैया थककर व्याकुल हुईं, तभी भगवान पकड़ में आए — क्योंकि वह थकावट प्रेम से भरी थी। इसी तरह जब साधक भजन में, सुमिरन में, या भक्ति में सम्पूर्ण मन से लग जाता है, तब कृपा बरसती है। कृपा पाने का उपाय है — निरंतर प्रेमपूर्वक भजन, विनम्रता, और दैन्यता। कृपा प्रयास से नहीं मिलती, पर प्रयास के बिना भी नहीं मिलती।


प्रश्न 7: क्या गुरुदेव, धाम और नाम-जप भी कृपा से ही मिलते हैं?

उत्तर:
हाँ, Maharaj Ji के अनुसार, गुरु का सानिध्य, नाम-जप की प्रेरणा, और धाम का आशीर्वाद — ये सब कृपा के ही रूप हैं। जिन पर कृपा नहीं होती, वे “राधा” नाम भी नहीं बोल सकते। इसलिए जब हम नाम जपते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि यह भी ईश्वर की कृपा है। लेकिन जब हम अहंकार करते हैं कि हम भजन कर रहे हैं, तब वही कृपा हमसे दूर हो जाती है। विनम्रता और समर्पण ही कृपा को स्थायी बनाते हैं।


प्रश्न 8: “गुरुदेव भगवान हमारे साथ हैं” — इस ठसक का क्या अर्थ है?

उत्तर:
Premanand Maharaj Ji समझाते हैं कि यह ठसक तभी सच्ची मानी जाएगी जब हर समय स्मरण हो। यदि नाम-जप बंद है और हम केवल भाव के आधार पर जी रहे हैं, तो यह भ्रम है। सच्ची ठसक वह है, जहाँ भगवान का नाम हर श्वास में चल रहा हो। विपरीत परिस्थितियों में भी जो भक्त सुमिरन करता है, वही वास्तविक ठसक वाला भक्त है। सुख में तो सब भक्ति करते हैं, पर जो दुख में भी नाम नहीं छोड़ता, वही कृपा का पात्र है।


प्रश्न 9: ध्यान क्यों भटकता है?

उत्तर:
Premanand Maharaj Ji बताते हैं कि ध्यान भटकने का कारण केवल एक है — अभ्यास की कमी। जैसे सैनिक बार-बार अभ्यास करता है तो लक्ष्य साध लेता है, वैसे ही साधक को भी मन को केंद्रित करने का अभ्यास करना चाहिए। संसार का अभ्यास गहरा है, इसलिए जब हम माला उठाते हैं, तो मन रिश्तों और बातों में भटक जाता है। समाधान यही है — निरंतर अभ्यास। धीरे-धीरे जब नाम की लय जम जाती है, तो मन कहीं नहीं जाता। अभ्यास ही भक्ति की स्थिरता है।


प्रश्न 10: गृहस्थ आश्रम के कर्मों का पालन आज कैसे संभव है?

उत्तर:
Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि आज का समय शास्त्रीय मर्यादाओं से बहुत दूर हो गया है। ब्रह्ममुहूर्त में उठकर संध्या-वंदन करना, गायत्री जप करना, शुद्धता का पालन — यह सब अब दुर्लभ हो गया है। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हम असमर्थ हैं। कम से कम अपनी जीविका को धर्मसम्मत बनाएँ, भोजन को पवित्र रखें और ईमानदारी को जीवन का आधार बनाएं। यही आधुनिक गृहस्थ के लिए सबसे बड़ा यज्ञ है। जो अपने कर्म को ईश्वर को समर्पित कर देता है, उसका गृहस्थ जीवन भी साधना बन जाता है।


प्रश्न 11: प्रचार और साधना का संतुलन कैसे बनाएं?

उत्तर:
Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि प्रचार तभी फलदायी है जब उसके पीछे भगवत भावना हो। यदि प्रचार में अहंकार, पैसे या प्रशंसा की इच्छा जुड़ जाए, तो यह भक्ति नहीं रहती। प्रचार का उद्देश्य दूसरों के हृदय में नाम की ज्योति जगाना होना चाहिए। लेकिन इसके लिए सबसे आवश्यक है — आत्मसंयम। जो प्रचारक हर व्यक्ति में भगवान का स्वरूप देखता है, वही सच्चा प्रचारक है। बिना द्वेष, बिना लोभ और बिना स्वार्थ का प्रचार ही भगवत कार्य है।


प्रश्न 12: जब जीवन में बीमारी या मृत्यु समीप हो, तब क्या करना चाहिए?

उत्तर:
Premanand Maharaj Jiकहते हैं कि जब शरीर कमजोर हो जाए, तब भी नाम-जप न छोड़ें। राधा नाम ही वह शक्ति है जो मृत्यु के भय को मिटाती है। शरीर तो नश्वर है, पर नाम अमर है। Maharaj Ji कहते हैं — प्रेमानंद चला जाएगा, पर राधा नाम रहेगा। इसलिए मृत्यु को भी उत्सव की तरह स्वीकार करें, क्योंकि यह उस परम मिलन की तैयारी है जिसके लिए जीवन मिला है। जो राधा नाम में लीन है, उसके लिए मृत्यु भी मोक्ष का द्वार बन जाती है।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

यह भी पढ़ें : माला-1054

1 thought on “माला-1056:क्या किस्मत जैसा सच में कुछ होता है?, श्री Premanand Maharaj Ji के अमृत वचनों से नाम जप महिमा”

Leave a Reply