माला-1055: क्या भगवान से सांसारिक वस्तुएँ माँगना उचित है?, श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: भक्ति करते समय मन में भय और संशय क्यों आते हैं, और उन्हें कैसे दूर किया जाए?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं — जब तक हमारी सच्ची शरणागति पुष्ट नहीं होती, तब तक मन में भय और संशय बने रहते हैं। जब हम भगवान की शरण में हैं, तो भय का कोई कारण नहीं। जैसे माँ अपने बच्चे की रक्षा करती है, वैसे ही सर्वशक्तिमान प्रभु अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। जो व्यक्ति यह समझ ले कि “मेरा स्वामी सर्वज्ञ और कृपालु भगवान हैं,” वह फिर किसी भय में नहीं रहता। भय और शंका तभी उत्पन्न होती है जब नाम-जप ठीक से नहीं होता। महाराज जी कहते हैं — “नाम-जप और भगवान की कथा सुनो, जिससे हृदय पवित्र हो जाएगा। अपवित्र हृदय में ही भय और संशय रहते हैं।” जब हृदय निर्मल हो जाता है, तो श्रद्धा और विश्वास दृढ़ होते हैं। तब साधक जान जाता है कि “जो भी होता है, वह भगवान के विधान से होता है, और वह सदा मंगलमय है।” यही दृढ़ विश्वास भय को समाप्त कर देता है।


प्रश्न 2: ध्यान लगाते समय मन क्यों भटक जाता है, और सच्चा ध्यान कैसे स्थापित किया जाए?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं — ध्यान कोई अचानक मिलने वाली चीज़ नहीं, यह अनुशासन और अभ्यास का परिणाम है। योग में ध्यान से पहले नियम, आसन, प्राणायाम और धारणा आते हैं। अगर ये स्थिर नहीं हुए, तो ध्यान में अंधकार ही दिखाई देगा। महाराज जी कहते हैं — “कलियुग में सच्चा ध्यान केवल नाम-जप से ही संभव है।” जब मन बार-बार भटकता है, तो उसे प्रेम से फिर जोड़ो, बार-बार जोड़ो। अभ्यास करते-करते पत्थर पर भी निशान बन जाता है, तो मन क्यों न टिकेगा? नाम का ध्यान करते समय जब मन पूरी तरह नाम में रम जाता है, तब वही ध्यान साकार रूप ले लेता है। महाराज जी का सन्देश स्पष्ट है — ध्यान का केंद्र भगवान का नाम है; नाम ही ध्यान का द्वार है। इसलिए ध्यान की साधना में निरंतरता, धैर्य और श्रद्धा अनिवार्य हैं।


प्रश्न 3: जब हम अधर्म करने वालों को सुखी देखते हैं, तो धर्म मार्ग पर टिके रहने की प्रेरणा कैसे बनाए रखें?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं — जो अधर्म करता है, उसका सुख क्षणिक होता है। रावण, हिरण्यकश्यप, दुर्योधन — सबने अधर्म किया, और अंत में विनाश को प्राप्त हुए। धर्म मार्ग कठिन अवश्य है, परंतु शाश्वत शांति उसी में है। अधर्म से प्राप्त संपत्ति, वैभव और प्रसिद्धि कुछ समय तक चमकती है, फिर नष्ट हो जाती है। धर्म से अर्जित साधन भले सीमित हों, पर उनसे मिलने वाला सुख स्थायी और पवित्र होता है। महाराज जी समझाते हैं — “जो धर्म से नमक-रोटी खाता है, वह सुखी है; जो अधर्म से कोठी बनाता है, वह अंततः विनाश पाता है।” इसलिए धर्म पर टिके रहना ही सच्चा लाभ है। भले संसार में चमक कम दिखे, पर आत्मा के भीतर शांति और भगवान की कृपा बढ़ती रहती है — यही स्थायी संपत्ति है।


प्रश्न 4: क्या भगवान से सांसारिक वस्तुएँ माँगना उचित है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं — भगवान से माँगना कोई दोष नहीं है, क्योंकि वे हमारे पिता हैं। भगवान ने स्वयं कहा कि चार प्रकार के भक्त होते हैं — आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी। जो भक्त भगवान से अपनी आवश्यकताएँ माँगता है, वह भी उनके ही शरणागतों में आता है। “हम भगवान के बच्चे हैं, और पिता से अपनी जरूरत माँगना हमारा अधिकार है,” महाराज जी कहते हैं। किंतु भोग के लोभ से नहीं, श्रद्धा और विश्वास से माँगना चाहिए। जब भक्त सच्चे भाव से कहता है — “प्रभु, मुझे जो चाहिए वह केवल आपकी कृपा से मिले,” तब उसकी याचना भी भक्ति का रूप ले लेती है। माँगने का भाव स्वार्थ नहीं, समर्पण होना चाहिए। भगवान कृपालु हैं, वे केवल वही देते हैं जो हमारे कल्याण के लिए उचित है।


प्रश्न 5: भीतर की प्रेरणा और मन की कल्पना में कैसे भेद करें?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं — जो प्रेरणा सत्य, शास्त्रसम्मत और पवित्र हो, वही भगवान की प्रेरणा है; और जो प्रेरणा असत्य, अधर्मयुक्त या वासनाओं से भरी हो, वह मन की कल्पना है। मन के दो भाग हैं — सत् मन और असत् मन। सत् मन भगवान से जुड़ा है, असत् मन भोगों की ओर खींचता है। जब सत् मन कमजोर होता है, तब असत् मन हावी होकर हमें भ्रमित करता है। इसलिए साधना का उद्देश्य सत् मन को मजबूत बनाना है। महाराज जी कहते हैं — “सत्संग और शास्त्र-श्रवण से विवेक उत्पन्न होता है। विवेक से हम जान पाते हैं कि कौन-सी प्रेरणा दिव्य है और कौन-सी माया की।” जब मन भगवान की ओर झुकता है, तो वह सत् प्रेरणा है; और जब संसार की ओर भागता है, तो वह कल्पना मात्र है। साधना से यह भेद स्वतः स्पष्ट हो जाता है।


प्रश्न 6: भगवान की शरणागति में कृपा का क्या महत्व है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं — “भगवान की कृपा के बिना कोई नाम-जप, सत्संग या भजन संभव नहीं।” कृपा ही वह शक्ति है जो हमें भगवद् मार्ग में लाती है। जैसे मनुष्य शरीर भगवान की कृपा से मिला, वैसे ही संत-संग भी कृपा से मिलता है। जब भगवान कृपा करते हैं, तो वे हमें सच्चे संतों की संगति देते हैं। उन्हीं के वचनों से हृदय निर्मल होता है और शरणागति पुष्ट होती है। श्री प्रेमानंद जी कहते हैं — “जो व्यक्ति संत वाणी के अनुसार चलने लगता है, वही सच्चा शरणागत होता है।” इसलिए कृपा कोई बाहरी वस्तु नहीं, यह वही आंतरिक प्रकाश है जो हमें सत्य की ओर प्रेरित करता है। जब हृदय में यह भाव आता है कि “सब कुछ प्रभु की कृपा से है,” तब शरणागति पूर्ण होती है।


प्रश्न 7: कृपा और अक्रिपा में क्या अंतर है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के अनुसार — कृपा का अर्थ है भगवान की ओर मन का लगना, और अक्रिपा का अर्थ है संसार और भोगों में रत रहना। जब मन सदा भगवान के चिंतन में स्थिर हो, तो वह कृपा का पात्र है। पर जब मन रुपया, वैभव और इंद्रिय-सुखों में डूबा हो, तो वह अक्रिपा का संकेत है। महाराज जी कहते हैं — “मुख वचन से नाम का स्मरण, चित्त से हरि का चिंतन और कर्म से संसारिक कर्तव्य — यह ही कृपा है।” जो व्यक्ति यह जान लेता है कि भगवान का नाम ही सच्चा धन है, वही कृपा का पात्र बनता है। और जो भोग में आसक्त है, वह भगवान से विमुख होकर अक्रिपा का पात्र होता है। कृपा के बिना मन निर्मल नहीं होता, और निर्मलता ही भक्ति का प्रवेश द्वार है।


प्रश्न 8: मल, विक्षेप और आवरण क्या हैं, और ये कैसे दूर होते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं — “मल” हमारे भीतर जन्म-जन्मांतर से जमा भोगों की वासना है, “विक्षेप” मन का बार-बार विषयों में भटक जाना है, और “आवरण” अहंकार है जो हमें सत्य देखने नहीं देता। ये तीनों ही आत्मा को ढँक लेते हैं। ये तभी मिटते हैं जब भगवत् प्रेम या शुद्ध ज्ञान प्रकट होता है। प्रेम और ज्ञान, दोनों का द्वार नाम-जप है। श्री प्रेमानंद जी कहते हैं — “नाम ही वह अग्नि है जो मल, विक्षेप और आवरण को जला देती है।” नाम-जप करते-करते मन निर्मल और स्थिर होता है। जब हृदय में नाम बस जाता है, तब ये दोष बिना प्रयास के मिट जाते हैं। यही कारण है कि महाराज जी कहते हैं — “हर समय नाम जपो, चिंता मत करो, भगवान की कृपा से मन एक दिन शांत और निर्मल हो जाएगा।”


प्रश्न 9: मनुष्य जानता है कि शरीर नश्वर है, फिर भी मोह क्यों नहीं छूटता?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं — “हम जानते तो हैं कि शरीर नश्वर है, पर असल में उसे अनुभव नहीं करते।” जैसे स्वप्न में सब कुछ सत्य लगता है, वैसे ही यह जीवन भी हमें स्थायी लगता है, जब तक हम ‘जाग’ न जाएँ। जब यह बोध होता है कि यह शरीर, धन, संबंध सब अस्थायी हैं, तब मोह स्वतः समाप्त हो जाता है। लेकिन यह बोध केवल नाम-जप और साधना से आता है। महाराज जी कहते हैं — “जो हर क्षण यह समझ ले कि कुछ भी साथ नहीं जाएगा, वह जीवन का एक भी पल व्यर्थ नहीं करेगा।” जब यह सत्य भीतर उतरता है कि केवल भगवान ही शाश्वत हैं, तब भक्ति सहज हो जाती है और संसार का मोह छूट जाता है। ज्ञान वही सच्चा है जो हृदय में वैराग्य उत्पन्न करे।


प्रश्न 10: अपने ‘स्व’ को पहचानने और आत्म-दर्शन की विधि क्या है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं — “अपने को जानना बहुत कठिन साधना है।” इसके लिए तीन तत्व आवश्यक हैं — गुरु में श्रद्धा, साधना में निरंतरता और भगवान के चिंतन में एकाग्रता। आत्म-दर्शन तभी संभव है जब मन बाहरी आकर्षणों से हटकर भीतर की ओर मुड़ता है। महाराज जी बताते हैं — “जब मनुष्य संसारिक मनोरंजन, विषय और भोगों से विरक्त होता है, तब विवेक उत्पन्न होता है।” यही विवेक आत्म-ज्ञान का द्वार खोलता है। हमें यह बार-बार सोचना चाहिए — “मैं कौन हूँ? यह शरीर नहीं, आत्मा हूँ।” यह विचार जब स्थायी हो जाता है, तब संसार का आकर्षण मिट जाता है और आत्मा का प्रकाश प्रकट होता है। महाराज जी कहते हैं — “जो अपने को जान गया, वह मुक्त हो गया।”


प्रश्न 11: यदि किसी के भले के लिए झूठ बोला जाए, तो क्या वह पाप कहलाता है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी स्पष्ट करते हैं — “यदि झूठ किसी को भय या दुख से बचाने के लिए कहा जाए, तो वह पाप नहीं कहलाता, लेकिन झूठ से समस्या का समाधान नहीं होता।” इसलिए हमें झूठ की जगह उपाय बताने चाहिए। महाराज जी कहते हैं — “यदि कोई भयभीत है, तो उसे भक्ति की ओर प्रेरित करो, सकारात्मक विचार दो।” उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को अगर कालसर्प दोष का डर है, तो उसे भय न दिखाकर कहो — “नाम-जप करो, सब दोष मिट जाएगा।” यह सत्य भी है और हितकारी भी। अतः झूठ का उपयोग किसी को भ्रमित करने के लिए नहीं, बल्कि उसे ईश्वर की ओर मोड़ने के लिए होना चाहिए। झूठ तभी दोष है जब उससे किसी का अहित हो; यदि उससे किसी का मन भगवान की ओर बढ़े, तो वह पाप नहीं माना जाता।


प्रश्न 12: घर में क्रोध या अप्रसन्नता के कारण भोजन छोड़ देना क्या उचित है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज जी कहते हैं — “अन्न ब्रह्म है। भोजन फेंकना या क्रोध में तिरस्कार करना बुद्धिभ्रष्टता का लक्षण है।” यदि मन शांत नहीं है, तो बेहतर है कि भोजन को प्रणाम करके शांतिपूर्वक उठ जाएँ। लेकिन अन्न का अपमान न करें। महाराज जी बताते हैं — “यदि आप क्रोध को नियंत्रण में रखने के लिए उपवास करना चाहें, तो यह ठीक है, पर किसी पर दबाव डालने के लिए नहीं।” भोजन छोड़ना तपस्या होनी चाहिए, अहंकार नहीं। यदि क्रोध के कारण भोजन छोड़ा जाए, तो वह दोष है; पर आत्मसंयम के लिए छोड़ा जाए, तो वह साधना है। जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि अन्न ईश्वर का प्रसाद है, वह कभी उसे तिरस्कार से नहीं देखता। शांत भाव से भोजन ग्रहण करना ही सच्चा भोग है।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

यह भी पढ़ें : माला-1053

1 thought on “माला-1055: क्या भगवान से सांसारिक वस्तुएँ माँगना उचित है?, श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा”

Leave a Reply