माला-1053: भक्ति का सबसे शुद्ध रूप क्या है?,श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 7: महाराज जी, भक्ति का सबसे शुद्ध रूप क्या है?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी बहुत सरलता से बताते हैं कि भक्ति का सबसे शुद्ध और वास्तविक रूप नाम-जप है। वे कहते हैं कि लोग अक्सर भक्ति को आँसुओं से जोड़ते हैं — जब आँसू बहते हैं तो लगता है कि प्रेम प्रकट हो गया। लेकिन यह केवल एक अवस्था है। असली प्रेम तब प्रकट होता है जब मन पूरी तरह से मौन हो जाए, संकल्प–विकल्प शांत हो जाएं, और केवल भगवान का नाम भीतर निरंतर गूंजता रहे। यही स्थिति है — निशब्द प्रेम की अवस्था।

प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि प्रेम की जड़ नाम-जप में ही है। जब हम निरंतर नाम का जप करते हैं तो धीरे-धीरे भीतर एक प्रवाह उत्पन्न होता है। यह प्रवाह हमें साधारण स्थिति से उठाकर प्रेम-रस में डुबो देता है। फिर हृदय में स्वाभाविक रूप से आंसू आते हैं, शरीर रोमांचित हो उठता है, कंठ गदगद हो जाता है, और यह सब नाम-जप से ही उत्पन्न प्रेम की दशाएँ होती हैं।

वह समझाते हैं कि नाम-जप निरंतर चले, इसके लिए आहार और आचरण शुद्ध होना चाहिए। यदि भोजन अशुद्ध है, तामसिक या राजसिक है, तो मन भी अशांत और अस्थिर रहेगा। ऐसे में नाम-जप में रुचि नहीं टिक पाएगी। इसलिए उन्होंने कहा — “भोजन शुद्ध तो भजन सिद्ध।”
भोजन सात्विक हो, सुपाच्य हो और अल्प मात्रा में हो। संत कहते हैं — “मिताहार” अर्थात थोड़े भोजन का नियम। अगर कोई व्यक्ति डेढ़-दो किलो खा लेता है तो फिर भजन कैसे करेगा? शरीर भारी हो जाएगा, आलस्य बढ़ जाएगा और मन भोग की तरफ भागेगा। लेकिन यदि भोजन औषधि की तरह लिया जाए — केवल शरीर के पोषण के लिए — तो वही सात्विकता भजन में सहायक बनती है।

महाराज जी उदाहरण देते हैं कि पहले जब उन्हें तीन-चार दिन भोजन नहीं मिलता था और फिर एक बार में बहुत रोटियाँ खानी पड़ती थीं तो वह अलग परिस्थिति थी। लेकिन जब भगवान के मंदिर में उन्हें नियमित भोग मिलने लगा, तो उन्होंने समझा कि अब भोजन भी संयमित करना है। अधिक भोजन प्रमाद लाता है और प्रमाद भक्ति में सबसे बड़ा शत्रु है।

इसलिए वे बार-बार कहते हैं कि जो व्यक्ति शुद्ध, सात्विक और सीमित भोजन करता है, उसका मन शुद्ध होता है और जब मन शुद्ध होता है तो नाम-जप सहज में जमने लगता है। धीरे-धीरे यही नाम-जप प्रेम का रूप ले लेता है। फिर भक्त के भीतर संकल्प–विकल्प का अंत हो जाता है और वह निसंकल्प, निशब्द अवस्था को प्राप्त करता है। यही भक्ति का सबसे शुद्ध रूप है — जहाँ नाम-जप से प्रेम प्रकट होता है और प्रेम से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

प्रश्न 1: महाराज जी, आपकी किडनी फेल होने से पहले कृपा हुई या बाद में?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि कृपा तो बचपन से ही हुई थी। यदि कृपा न होती तो एक 11 वर्ष का बालक घर छोड़कर ईश्वर की खोज में क्यों निकलता? जब कोई समस्या नहीं थी, तब भी केवल भगवान की प्राप्ति का एक ही लक्ष्य था। यह पूर्व जन्मों के भजन का प्रभाव था। महाराज जी बताते हैं कि उन्हें किसी ने समझाया नहीं, न ही उन्होंने कोई सत्संग सुना — यह सब ईश्वरीय कृपा से हुआ। कृपा का अनुभव तब विशेष रूप से हुआ जब शरीर ने कष्ट देखा, लेकिन वह कृपा पहले से ही भीतर प्रवाहित थी। कृपा वही शक्ति है जो भक्त को अपने प्रभु की ओर खींचती है।


प्रश्न 2: महाराज जी, जब अकेलापन महसूस होता है तो क्या करें?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “भगवान का आश्रय ले लो, फिर अकेलापन नहीं रहेगा।” इस संसार में सबको अकेले ही जाना पड़ता है। कोई किसी के साथ नहीं जाता। जैसे हंस उड़ता है तो अकेला ही उड़ता है। वे बताते हैं कि जीवनभर अकेले रहे, पर यह अकेलापन भी प्रभु की कृपा थी। जब हृदय में साक्षात्कार की चाह होती है, तब संसार निरस लगने लगता है। यह पूर्व जन्म के भजन-साधन का परिणाम होता है। प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं कि सच्चा प्यार केवल ईश्वर में है — जहाँ त्याग और शुभेच्छा है। प्रेम का अर्थ है “तुम सुखी रहो”, भले मैं त्याग कर दूँ। यही वास्तविक भक्ति का भाव है।


प्रश्न 3: महाराज जी, गृहस्थ जीवन में किन अवस्थाओं में मंत्र-जप निषेध है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि अपवित्र दशा में — जैसे शौचालय, स्नानागार या सहवास के समय — गुरु-मंत्र का जप नहीं करना चाहिए। परंतु नाम-जप कभी निषिद्ध नहीं है। नाम पवित्र है, और किसी भी दशा में लिया जा सकता है। वे कहते हैं, “जब मन विषयों में भागता है, तो चिंता मत करो — यह उसका पुराना अभ्यास है।” अधिक नाम-जप से यह अभ्यास कट जाता है। धीरे-धीरे मन रुकना शुरू करता है। शुरुआत में कुछ सेकंड, फिर मिनटों तक रुकने लगता है। अभ्यास से ही मन भगवान में स्थिर होता है। जब नाम में मन लगने लगता है, वही मोक्ष की दिशा होती है।


प्रश्न 4: महाराज जी, मैं ब्रह्ममुहूर्त में नाम-जप करती हूँ, पर परमात्मा से मिलाप नहीं हो पा रहा?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “धीरे-धीरे करते रहो, यही साधना है।” नाम का प्रभाव वाणी से गले में, गले से हृदय में और फिर रोम-रोम में उतरता है। यह दीर्घकालिक अभ्यास है। ‘दीर्घ काल निरंतर सत्कार सेवितो दृढ़ भूमि’ — अर्थात जब नाम-जप आदरपूर्वक निरंतर किया जाता है, तो वही भगवत् साक्षात्कार का द्वार खोलता है। परमात्मा से मिलन अचानक नहीं होता; यह निरंतर साधना की प्रक्रिया है।


प्रश्न 5: महाराज जी, क्या हम अपने जीवन की परिस्थितियाँ नियंत्रित कर सकते हैं?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जीकहते हैं — “नहीं, नियंत्रण केवल परमात्मा कर सकता है।” माया का प्रवाह अत्यंत प्रबल है, और उसमें मनुष्य बह जाता है। केवल वही सुरक्षित है जो भगवान की शरण में है। जैसे नौका प्रवाह में सुरक्षित रहती है, वैसे ही जो नाम-जप और शरण ग्रहण करता है, वह जीवन के तूफानों से पार हो जाता है। भगवान ही संयम और बल देते हैं, हमारे अपने बल से कुछ नहीं होता। जब यह समझ आ जाती है कि “भगवत् बल से ही मैं साधन कर रहा हूँ,” तब माया पर विजय संभव होती है।


प्रश्न 6: महाराज जी, क्या अनन्यता बाहरी क्रिया है या आंतरिक भाव?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “अनन्यता तीनों स्तरों की है — तन, मन और वचन।” शरीर की क्रियाएँ, मन का चिंतन और वाणी का उपयोग — ये तीनों यदि भगवान को समर्पित हैं, तो व्यक्ति पूर्ण शरणागत है। भागवतिक क्रियाएँ स्वभाव को दिव्य बना देती हैं। जो व्यक्ति भोगों से विमुख होकर भगवान के गुणों का कीर्तन करता है, उसका स्वभाव स्वतः भागवतिक हो जाता है। और जब स्वभाव भगवद्भाव से भरे, तो सारे दोष नाम-जप से नष्ट हो जाते हैं।


प्रश्न 7: महाराज जी, आपकी किडनी फेल होने से पहले कृपा हुई या बाद में?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि कृपा तो बचपन से ही हुई थी। यदि कृपा न होती तो एक 11 वर्ष का बालक घर छोड़कर ईश्वर की खोज में क्यों निकलता? जब कोई समस्या नहीं थी, तब भी केवल भगवान की प्राप्ति का एक ही लक्ष्य था। यह पूर्व जन्मों के भजन का प्रभाव था। महाराज जी बताते हैं कि उन्हें किसी ने समझाया नहीं, न ही उन्होंने कोई सत्संग सुना — यह सब ईश्वरीय कृपा से हुआ। कृपा का अनुभव तब विशेष रूप से हुआ जब शरीर ने कष्ट देखा, लेकिन वह कृपा पहले से ही भीतर प्रवाहित थी। कृपा वही शक्ति है जो भक्त को अपने प्रभु की ओर खींचती है।


प्रश्न 8: महाराज जी, जीवन में ‘और चाहिए’ का भाव कब खत्म होगा?

उत्तर:
“जब भगवान के विधान पर भरोसा हो जाएगा,” प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं। जब भक्त कहे — “हे प्रभु! तुम जैसे रखो, मैं वैसे ही राजी हूँ,” तभी इच्छाओं का अंत होता है। इच्छाएँ ही जन्म–मरण का कारण हैं। जो अपनी हर इच्छा को प्रभु को समर्पित कर देता है, वही शांत और मुक्त होता है। महाराज जी एक दृष्टांत देते हैं — एक राजा का अंगूठा कट गया तो वह दुखी हुआ, पर बाद में वही घटना उसकी रक्षा बन गई। इसी तरह, जो कुछ होता है, वह भगवान की कृपा से ही मंगलमय होता है।


प्रश्न 9: महाराज जी, जब शरीर कर्म करता है तो आत्मा को फल क्यों भोगना पड़ता है?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं — आत्मा ही राजा है और शरीर-इंद्रियाँ उसके सैनिक। जब सैनिक गलती करते हैं, तो दंड राजा को मिलता है। वैसे ही जब मन और इंद्रियाँ पाप करती हैं, तो आत्मा को पुनर्जन्म और भोग के रूप में उसका परिणाम भुगतना पड़ता है। इसलिए आचरण शुद्ध रखना और नाम-जप करते रहना ही आत्मा को बंधन से मुक्त करता है।


प्रश्न 10: महाराज जी, अतीत की बातें हमें बहुत प्रभावित करती हैं, क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “भूत की चिंता छोड़ो, वर्तमान में नाम-जप करो।” अतीत की यादें मन को जलाती हैं। नाम-जप से वे मिट जाती हैं। नाम-जप पॉजिटिव विचारों को बढ़ाता है और नेगेटिव विचारों को काटता है। महाराज जी कहते हैं — “जो नाम-जप करता है, वही आनंद पाता है। पैसा, पद, मकान में नहीं — सच्चा सुख तो नाम में है।” सकारात्मक विचार ही जीवन में शांति लाते हैं।


प्रश्न 11: महाराज जी, मन बार-बार भोगों की ओर क्यों जाता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “मन का स्वभाव ढलान की ओर है।” जैसे जल को ऊपर चढ़ाने के लिए यंत्र चाहिए, वैसे ही मन को भगवान की ओर उठाने के लिए नाम-जप चाहिए। भोगों से उर्ध्वगामी बनने का एकमात्र उपाय मंत्र-जप है। बार-बार जप करने से मन स्थिर होता है, और तब भोग नहीं, भक्ति प्रिय लगने लगती है।


प्रश्न 12: महाराज जी, हर कोई सुख, शांति और प्यार की खोज में है — असली खोज क्या है?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “हर व्यक्ति की खोज भगवान है।” सुख, शांति और प्रेम केवल परमात्मा में हैं, संसार में नहीं। पैसा, पदार्थ और संबंध इनका स्रोत नहीं बन सकते। जब तक मनुष्य इन्हें संसार में खोजता रहेगा, असंतोष बना रहेगा। सच्चा प्रेम, सच्ची शांति और स्थायी सुख केवल नाम-जप और प्रभु-स्मरण से मिलते हैं। “24 घंटे में 24 मिनट भगवान को दो,” महाराज जी कहते हैं — “यही जीवन को सफल बनाने का रहस्य है।”

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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