प्रश्न 1: गृहस्थ जीवन में अनेक जिम्मेदारियों के बीच भगवत् प्राप्ति का सरल मार्ग क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “नाम जप सबसे सरल, सुलभ और निष्कपट मार्ग है।”
नाम जप में न कोई धन लगता है, न पवित्रता–अपवित्रता का भेद रहता है।
जैसी भी अवस्था हो — रसोई में, सेवा करते हुए, सोते-जागते —
हर समय भगवान का नाम जप किया जा सकता है।
जो भी भगवान का नाम स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर से पवित्र हो जाता है।
महाराज जी कहते हैं — “मन लगे या न लगे, नाम जप करते रहो।
जैसे बिना मन लगे भोजन करने पर भी पेट भरता है,
वैसे ही बिना मन के नाम जप करने से भी हृदय पवित्र होता है।”
नाम जप से दसों दिशाओं में मंगल होता है।
जो भाव से या कु-भाव से भी नाम लेता है, उसका भी कल्याण होता है।
प्रश्न 2: यदि नाम जपते-जपते ऐसी अवस्था आ जाए कि एक पल भी नाम छूटे तो मृत्यु समान लगे, तब गृहस्थ कैसे रहें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “ऐसी अवस्था बड़ी धन्य है।
परंतु गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी कर्म करना आवश्यक है।”
भगवान ने अर्जुन को भी यही उपदेश दिया कि
“माम अनुस्मर युद्ध्य च” — मेरा स्मरण करते हुए अपना कर्तव्य करो।
इसलिए उदासी मन में हो, फिर भी कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
माता-पिता की सेवा, परिवार का पालन, समाज का हित —
सब ईश्वर की पूजा के समान हैं।
नाम जप करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना ही सच्ची भक्ति है।
प्रश्न 3: क्या हर धर्म के लिए भगवान का स्वरूप एक ही है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “भगवान एक हैं, रूप अनेक हैं।”
कहीं वे निराकार रूप में हैं, कहीं साकार रूप में।
जैसे यमुना के कई घाट हैं पर जल एक ही है।
इसी प्रकार धर्म भिन्न हो सकते हैं, पर परमात्मा एक ही है।
अलग-अलग आचरणों के कारण लोग एक-दूसरे को नहीं समझ पाते,
पर हमें अपने धर्म से विचलित नहीं होना चाहिए।
जो अधर्म है — जैसे हिंसा, बलि, नशा —
वह भगवत् प्राप्ति का मार्ग नहीं।
सच्चा धर्म वही है जो दूसरों की रक्षा करे।
महाराज जी कहते हैं — “दूसरों को सिखाने नहीं, स्वयं नाम जप करके अपने धर्म को पुष्ट करो।”
प्रश्न 4: जो लोग कम नाम जप पाते हैं, वे भगवत् प्राप्ति की किस श्रेणी में आते हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “नाम जप ही हमारी लिफ्ट है।
जो इस लिफ्ट में बैठ गया, वह अवश्य पार होगा।”
चाहे नाम जप कम हो या अधिक, पर श्रद्धा बनी रहनी चाहिए।
नाम जप ही शरणागति है, नाम जप ही जहाज है जो हमें पार कर देता है।
महाराज जी कहते हैं — “नाम जप बढ़ाओ, यह लिफ्ट स्वयं भगवान तक ले जाएगी।”
प्रश्न 5: प्रियाल माया का पर्दा कैसे हटे?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं — “सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण — यही माया के तीन पर्दे हैं।”
जब तक साधक त्रिगुणातीत नहीं होता, तब तक साक्षात्कार संभव नहीं।
सात्विक आहार, सात्विक संग, सात्विक दृश्य और सत्संग से
रजोगुण व तमोगुण का नाश होता है।
जब निरंतर भजन किया जाता है, तब साधक गुणातीत हो जाता है,
और तब माया का पर्दा हट जाता है।
फिर हर कण, हर क्षण में भगवान का दर्शन होने लगता है।
प्रश्न 6: क्या गुरु मंत्र और नाम जप साथ-साथ किए जा सकते हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “यह दो नाव में पैर रखना नहीं,
बल्कि एक ही लक्ष्य की दो विधियाँ हैं।”
जब मन गुरु मंत्र में नहीं लगता तो नाम जप करो।
जब नाम में नहीं लगता, तो कीर्तन करो, सत्संग सुनो।
सबका उद्देश्य एक ही है — चित्त को भगवान में लगाना।
महाराज जी कहते हैं — “एन केन प्रकारेण अभ्यास करो,
ताकि चित्त प्रभु से अलग न हो।”
प्रश्न 7: यदि सारी आसक्ति भगवान में लगा दी जाए, तो क्या जीवन में ‘मज़ा’ आ जाता है?
उत्तर:
महाराज जी मुस्कराते हुए कहते हैं — “हाँ, वही सच्चा आनंद है।”
जो व्यक्ति संसार में आसक्त होता है, वही जब अपनी आसक्ति भगवान में लगाता है,
तो वह अनुराग बन जाती है।
जब शरीर, संबंध और भोगों से राग मिट जाता है,
तब केवल भगवान से प्रेम रह जाता है।
तब अपमान और सम्मान में कोई भेद नहीं रहता।
मीरा जी की तरह विष भी अमृत बन जाता है।
सारी आसक्तियों को समेटकर भगवान में लगाना ही सर्वोच्च भक्ति है।
प्रश्न 8: तुलना और ईर्ष्या से भटकते हुए मन को शांत कैसे करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “जब तक भजन नहीं होगा, बुद्धि रजोगुणी रहेगी।”
रजोगुण में होड़, ईर्ष्या, मत्सरता स्वाभाविक है।
पर जब भजन होता है, तो हृदय शीतल होता है।
तब भीतर का सुख बाहर की होड़ को समाप्त कर देता है।
ईर्ष्या मन को जलाती है, नष्ट कर देती है।
इसलिए नाम जप से बुद्धि शुद्ध करो —
क्योंकि जब तक भजन नहीं, जीवन व्यर्थ है।
प्रश्न 9: मन की बेचैनी कैसे कम हो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “विषय चिंतन से मन अशांत होता है।”
इच्छाओं की पूर्ति न हो तो क्रोध, और हो जाए तो लोभ जन्म लेता है।
ये दोनों भगवत् स्मृति को नष्ट करते हैं।
इसलिए विषयों का चिंतन छोड़ो और निरंतर नाम जप करो।
भगवान के सान्निध्य से ही मन शांत होता है, भोगों से नहीं।
प्रश्न 10: मंत्र जप के बीच में जीवन की समस्याएँ मन को भटकाती हैं, क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “मन को बार-बार वहीं से हटाकर नाम में लगाओ।”
नाम को इतनी तीव्रता से जपो कि मन को भटकने का समय ही न मिले।
स्वास के साथ नाम जोड़ दो — “राधा” लेते हुए श्वास लो,
“कृष्ण” छोड़ते हुए श्वास छोड़ो।
नाम और स्वास का भेद मिट जाए, यही सर्वोच्च साधना है।
धीरे-धीरे चिंतन मिटकर भगवदाकार स्थिति आ जाएगी।
प्रश्न 11: दान-पुण्य और नाम जप में क्या अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “दान पुण्य का फल क्षणिक है,
पर नाम जप का फल शाश्वत है।”
यदि कर्म भगवान को समर्पित कर दिए जाएँ,
तो वे भगवत् प्राप्ति के साधन बनते हैं।
वरना केवल पुण्य रह जाते हैं जो नाशवान हैं।
इसलिए सेवा और दान के साथ निरंतर नाम जप आवश्यक है।
प्रश्न 12: विद्यार्थी जीवन में ‘अनन्य चिंतन’ कैसे अपनाएँ?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “विद्या भी भक्ति बन सकती है।”
यदि पढ़ाई को भगवान को अर्पित किया जाए, तो वह कर्मयोग हो जाता है।
जो कुछ करो, प्रभु को समर्पित भाव से करो —
स्वाध्याय, कर्म, अध्ययन — सब भजन बन जाते हैं।
फिर शेष समय नाम जप के लिए रखो, यही विद्यार्थी का धर्म है।
प्रश्न 13: वृंदावन से क्या स्मृति ले जानी चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “वृंदावन की रज, ठाकुर का चरणामृत और वृंदावन की स्मृति।”
वृंदावन का चिंतन करोड़ों जन्मों के पापों का नाश करता है।
बाहरी वृंदावन की स्मृति से आंतरिक वृंदावन जागृत होता है,
जहाँ सर्वत्र भगवान का अनुभव होता है।
प्रश्न 14: यदि गुरु का दर्शन दुर्लभ हो जाए तो विरह कैसे सहें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “जहाँ सच्चा विरह है, वहाँ अदर्शन हो ही नहीं सकता।”
प्रेम में दूरी नहीं होती।
विरह में जो तड़प होती है, वही मिलन से भी बढ़कर होती है।
विरह को गुप्त रखो, वही हृदय को भगवदाकार बनाता है।
जैसे भ्रंगी कीड़ा जिस कीड़े को ध्यान में रखता है,
वह उसी जैसा बन जाता है।
वैसे ही गुरु का चिंतन करते-करते शिष्य गुरु-मय हो जाता है।
प्रश्न 15: क्या अपने गुरु पर अभिमान रखना उचित है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “यदि अहंकार भगवान या गुरु के लिए है,
तो वह वंदनीय है, निंदनीय नहीं।”
“मैं उनका सेवक हूँ” — यह अभिमान तो हर क्षण रहना चाहिए।
यह अहंकार हमें बल देता है और भगवान से जोड़ता है।
जो कहे — “मेरे गुरुदेव मेरे जीवन का सौभाग्य हैं,”
वह अहंकार नहीं, भक्ति है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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