माला-1051: “मेरी लाड़ली” की ठसक हृदय में कैसे आए?,श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप

प्रश्न 1: महाराज जी, लंबे समय से नाम जप के प्रयास करते-करते थक गया हूँ। भजन में उत्साह क्यों नहीं रह गया? कभी लगता है सब पहले से निर्धारित है और कभी लगता है कि हम ही सब कुछ कर रहे हैं। यह स्थिति क्यों आती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — यह थकावट आत्मिक नहीं, बल्कि मन और शरीर की दुर्बलता का परिणाम है। जब मनुष्य विषय-विकारों में फँस जाता है, जैसे वासना या असंयमित जीवन, तो उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है। उत्साह वहीं टिकता है जहाँ पवित्रता है। जो साधक भोग-वासनाओं से लड़ते हुए थक गया है, उसे चाहिए कि वह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर कुछ दूरी तक दौड़े, शरीर को शुद्ध रखे और फिर शांत मन से नाम जप करे।
भजन कभी थकाने वाला नहीं होता — थकाता है शरीर का आलस्य और मन का प्रमाद। महाराज जी कहते हैं, “राधा नाम में जो लग गया, वह अमर होने की तैयारी कर रहा है।” जीवन का प्रयोजन मरना नहीं, अमरत्व पाना है — और यह अमरत्व केवल नाम जप से ही संभव है।


प्रश्न 2: जब साधक स्वयं से नाम जप करता है, तो क्या वह पूर्ण फलदायी होता है, या सच्चे गुरु की कृपा आवश्यक है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — नाम जप तो आरंभ है, परंतु उसका सिद्धि रूप गुरु कृपा से ही खिलता है। बिना गुरु के नाम का वास्तविक अर्थ नहीं खुलता। गुरु वह ज्योति हैं, जो अंधेरे में भी मार्ग दिखाती है।
गुरु कृपा ही मोक्ष का मूल है — “मोक्ष मूलं गुरु कृपा, मंत्र मूलं गुरु वाक्यम।”
सच्चे गुरु के मुख से निकला नाम, साधक के भीतर वही चेतना जगा देता है जो भगवान की है। जो भक्ति गुरु के प्रति होती है, वही भगवत भाव में परिवर्तित होकर मोक्ष का द्वार खोलती है।


प्रश्न 3: कर्मकांड, दिखावा और भक्ति — इनमें क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं —
कर्मकांड वह है जो शास्त्र के आदेशानुसार किया जाता है, भक्ति वह है जो प्रेम से भगवान के लिए की जाती है, और दिखावा वह है जो लोगों को दिखाने के लिए किया जाता है।
अगर हमारा कर्म भगवान के लिए नहीं है, तो वह केवल बाह्य क्रिया है; और यदि वह केवल दिखाने के लिए है, तो वह पाखंड है।
भगवान कर्मकांड से नहीं, भाव से प्रसन्न होते हैं। जो कार्य भगवान की स्मृति में किया जाए, वही भक्ति योग है। केवल भक्ति ही भगवान से मिलाती है।


प्रश्न 4: क्या भगवत प्राप्ति के लिए किसी विशेष गुरु-मंत्र की आवश्यकता है या केवल राधा नाम जप से ही सब संभव है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — राधा नाम ही स्वयं गुरु-मंत्र है।
जब किसी संत के मुख से “राधा राधा” नाम सुनकर हृदय भाव-विभोर हो जाए, वही गुरु दीक्षा का क्षण है। राधा नाम ही मंत्र है, साधन है और साध्य भी।
इस नाम में ही सारा ब्रह्मांड समाहित है — जो इस नाम को पकड़ लेता है, वही भगवान को पकड़ लेता है। इसलिए राधा नाम का जप ही पर्याप्त है।


प्रश्न 5: “मेरी लाड़ली” की ठसक हृदय में कैसे आए? क्या पूरा जीवन लाड़ली को अर्पित करने से यह भाव स्वतः उत्पन्न होता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “लाड़ली की ठसक कोई बाहरी ठसक नहीं है, यह भीतर का दिव्य गौरव है। जब साधक का ‘मैं’ पूरी तरह गल जाता है और केवल ‘मेरी लाड़ली’ शेष रह जाती है, तब यह ठसक अपने आप प्रकट होती है।”
यह भाव तब आता है जब मन, वचन और कर्म — तीनों एक दिशा में बहने लगते हैं, जहाँ केवल राधा नाम की लहर है। जिस दिन साधक के हृदय में यह भाव जाग जाता है कि “अब मेरा कुछ भी नहीं, सब कुछ मेरी लाड़ली का है,” उसी दिन से भीतर एक अनकहा आनंद, एक आत्मिक गरिमा जन्म लेती है। वही है लाड़ली की ठसक।

महाराज जी आगे समझाते हैं — “जब तुम्हें कोई अपमान करे और तुम्हें क्रोध न आए, बल्कि भीतर से यह भाव उठे कि यह भी मेरी लाड़ली की लीला है, तब समझो कि ठसक आ गई है। जब सब कुछ खोकर भी तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान हो, तब वह ठसक है। जब दुनिया तुम्हें कुछ कहे और तुम भीतर से कहो — ‘मेरा तो सब कुछ मेरी राधा है’, तब वह प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है।”

यह ठसक न तो शब्दों में उतर सकती है, न ही किसी दिखावे में। यह तो बस अनुभव में आती है — जब हृदय राधा के नाम में गलकर प्रेम की मिट्टी बन जाता है।


प्रश्न 6: जीवन में इतने दुख, रोग और विपत्तियाँ क्यों आती हैं? क्या यह जीव हिंसा या मांसाहार का फल है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — हाँ, जीव हिंसा ही दुख का मूल कारण है।
जो जीवों को कष्ट देता है, वही कष्ट किसी रूप में लौटकर उसके पास आता है।
मांस-भक्षण शरीर को विष देता है और आत्मा को कठोर बनाता है। यही कर्म आगे चलकर रोग, कष्ट और अशांति के रूप में फलित होते हैं।
महाराज जी कहते हैं — “दूसरों को सुख दो, जीवों पर दया करो, नाम जप करो — वही तुम्हारा रोग, विपत्ति और पाप सब भस्म कर देगा।”


प्रश्न 7: अस्पताल या जिम्मेदारी भरा जीवन बहुत तनावपूर्ण होता है। ऐसे में मन की शांति और भक्ति कैसे बनी रहे?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “अपने कार्य को पूजा मान लो।”
जब सेवा को भगवान की सेवा समझ लिया जाए, तो वही तनाव साधना बन जाता है।
मरीज रूपी भगवान की सेवा करते समय यह भाव रखो कि मैं रोगी नहीं, भगवान का ही उपचार कर रहा हूँ।
भक्ति केवल मंदिर में नहीं — हर जगह है जहाँ प्रेम और करुणा है। इसलिए हर कर्म को भगवान को समर्पित करो, वही नाम जप बन जाएगा।


प्रश्न 8: आज समाज में लोग धर्म के बंधन को स्वतंत्रता का विरोध मानते हैं। क्या धर्म का बंधन आवश्यक है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — धर्म का बंधन ही सच्ची स्वतंत्रता है।
जैसे रोगी को परहेज़ में बाँधा जाता है ताकि वह स्वस्थ रहे, वैसे ही धर्म के नियम हमें पतन से बचाते हैं।
जो धर्म को छोड़ता है, वह माया के बंधन में बँध जाता है।
बंधन अगर भगवान का है तो वह मुक्ति देता है, और बंधन अगर विषयों का है तो वह विनाश लाता है। इसलिए धर्म का अनुशासन ही जीवन की रक्षा है।


प्रश्न 9: आज के युवाओं में नशाखोरी, अनुशासनहीनता और चरित्र पतन क्यों बढ़ रहा है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — जब जीवन से अध्यात्म हट जाता है, तब ही अधःपतन शुरू होता है।
संस्कार और संयम खोने से मनुष्य पशु प्रवृत्ति में उतर जाता है।
युवाओं में जागृति तभी आएगी जब वे नाम जप को जीवन का केंद्र बना लें।
महाराज जी कहते हैं — “नशा छोड़ो, नाम का नशा पकड़ो। जो राधा नाम का नशेबाज बन गया, उसे संसार का कोई प्रलोभन हिला नहीं सकता।”


प्रश्न 10: नाम जप करते हुए भी कभी-कभी पुराने पाप याद आ जाते हैं और मन में जलन होती है। क्या यह जलन पापों को भस्म कर देती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — यही जलन शुद्धि की अग्नि है।
जब हृदय में अपने कर्मों के प्रति व्यथा होती है, वही भीतर का संस्कार जलाकर भस्म करती है।
जो सुख-दुख को समान भाव से सह लेता है, वही परम पद का अधिकारी होता है।
इसलिए उस पीड़ा से भागो मत — वही तुम्हें पवित्र बना रही है।


प्रश्न 11: वृंदावन में कहा जाता है कि यदि हमारी अंतिम श्वास यहीं निकले तो मुक्ति मिलती है। क्या यह सत्य है, जबकि भगवान तो सर्वत्र हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — भगवान सर्वत्र हैं, पर वृंदावन उनका हृदय है।
यह भूमि उन आंसुओं से पवित्र हुई है जो गोपियों ने प्रेम में बहाए।
यहाँ हर कण में भगवान का नाम ध्वनित होता है।
इसलिए वृंदावन में प्राण त्यागने का अर्थ है — भगवान की स्मृति में देह छोड़ना।
लेकिन सबसे बड़ा सत्य यह है कि जहाँ भी भगवान की स्मृति बनी रहे, वहीं वृंदावन है।


प्रश्न 12:यदि हमें नौकरी के कारण अलग-अलग शहरों में रहना पड़े, और जहाँ पहले से मांस-मदिरा का वातावरण रहा हो, तो वहाँ भक्ति की पवित्रता कैसे धारण करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — भगवान के नाम का प्रभाव सबसे शक्तिशाली है।
जहाँ एक बार भगवत नाम का कीर्तन हो जाए, वहाँ की वायु तक पवित्र हो जाती है।
यदि तुम उस घर में भजन करोगे, नाम जप करोगे, तो वही घर धाम बन जाएगा।
जहाँ नाम की ध्वनि गूँजती है, वहाँ माया का प्रवेश नहीं होता।


प्रश्न 13:अगर हमने जीवन के बाद के वर्षों में नाम जप शुरू किया है, तो क्या अब भी मुक्ति संभव है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “जब जगे, तभी सवेरा।”
नाम जप में कभी देर नहीं होती। यह जीवन का नया जन्म है।
लेकिन सावधान रहो — नाम जप केवल अभ्यास नहीं, यह प्रेम का मार्ग है।
जब नाम की लत लग जाती है, तब माया भय और प्रलोभन दोनों फेंकती है।
जो दोनों से बच गया, वही नाम का सच्चा पियक्कड़ है — वही मुक्त है।


प्रश्न 14:नाम जप से मन शांत रहता है, पर कभी-कभी घर में झगड़े की स्थिति हो जाए तो भक्ति डगमगाने लगती है। ऐसी स्थिति में क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — परिवार ही तुम्हारा मंदिर है।
पति-पत्नी के झगड़े प्रेम की परीक्षा हैं, द्वेष की नहीं।
मौन रहो, क्रोध में उत्तर मत दो, और भीतर नाम जप करो।
जब दूसरा व्यक्ति क्रोध में है और तुम शांत रहो, तो उसका क्रोध भी भस्म हो जाता है।
जिसने अपने परिवार को भगवान का रूप समझ लिया, उसके लिए हर दिन पूजा बन गया।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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