प्रश्न 1: महाराज जी, मेरे परिवार में किसी को नहीं बल्कि मुझे ही साँप दिखाई देता है। क्या यह मेरे पिछले जन्मों का पाप है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह कोई पाप की बात नहीं है। यदि तुम्हें साँप दिखाई देता है और दूसरों को नहीं दिखाई देता, तो यह तुम्हारे देखने की दृष्टि है। इसे भ्रम या पाप मान लेना ठीक नहीं है। जैसे भगवान शंकर के गले में सर्प है — उसे देखना तो शुभ माना जाता है। शंकर जी का ध्यान परम मंगलमय है। इसलिए किसी भी दृश्य को पाप समझना उचित नहीं। यह केवल मान्यताएँ हैं जो हम बना लेते हैं। जो दिखाई देता है, वह सृष्टि का ही हिस्सा है। अतः डरने या पाप मानने की आवश्यकता नहीं, बल्कि भगवान के स्मरण में रहना चाहिए।
प्रश्न 2: गीता में लिखा है कि कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। लेकिन हमें भगवान से मिलना है, यह भी तो फल की इच्छा ही है, ऐसा क्यों?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह आकांक्षा कामना नहीं मानी जाती। भोग-विलास, धन, पद, मकान जैसी सांसारिक इच्छाएँ बंधनकारी हैं, इन्हें कामना कहते हैं। लेकिन भगवान का दर्शन पाना, उनकी रूप माधुरी में प्रवेश पाना, मोक्ष पाना — ये परमार्थ की आकांक्षा है। यह इच्छा नहीं, बल्कि निष्कामता का ही स्वरूप है। यदि कोई कहे कि हमें श्री जी का नाम जपने की आकांक्षा है, या उनकी लीला का रस पाना है, तो यह परम मंगलमय है। यह बंधनकारी नहीं है, बल्कि मुक्ति दिलाने वाली है। इसलिए भगवान से मिलने की लालसा कोई फल की कामना नहीं है, यह तो आत्मा की शुद्ध पुकार है।
प्रश्न 3: गुरुदेव श्री जी हैं यह भाव दृढ़ होने पर भी मन में यह इच्छा कि गुरुदेव प्रिया-प्रीतम के रूप में दर्शन दें — क्या यह गलत है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह भावना गलत नहीं, परंतु सबसे पहले गुरु पर दृढ़ श्रद्धा और नाम जप में भाव बनना चाहिए। यदि गुरु पर पूर्ण भाव नहीं बना, तो श्री जी के दर्शन भी संभव नहीं। गुरुदेव ने ही मंत्र दिया है, नाम दिया है, प्रभु का मार्ग दिखाया है। पहले नाम जप में पूरी निष्ठा करो। जब नाम जप दृढ़ हो जाएगा, गुरु चरणों में भाव गहरा हो जाएगा, तभी बिना चाहे श्री जी के दर्शन हो जाते हैं। इसलिए केवल प्रिया-प्रीतम रूप की आकांक्षा न रखो, पहले गुरु और नाम में डटकर भाव बनाओ।
प्रश्न 4: हर परिस्थिति में सुखी किस प्रकार रह सकते हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि सुखी वही रह सकता है जो समता को धारण करे। जो मान-अपमान, शत्रु-मित्र, लाभ-हानि, सुख-दुख सबमें समान रहे, वही हर स्थिति में मुस्कुरा सकता है। और यह समता केवल भजन से आती है। खूब नाम जप करो, शास्त्र स्वाध्याय करो और सत्संग सुनो। इन तीनों के अभ्यास से धीरे-धीरे समता आती है और क्षमता जाग्रत होती है। जब भीतर क्षमता होगी, तब बड़े-बड़े दुख भी मुस्कुराते हुए सहन हो जाएंगे।
प्रश्न 5: सब कहते हैं सुख में सुमिरन करो, दुख में करो न करो। असल में सही क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि असल में लोग सुख में सुमिरन नहीं करते। सुख में लोग भोगों में फँस जाते हैं और प्रभु को भूल जाते हैं। लेकिन यदि कोई सुख में भी सुमिरन करता है तो फिर दुख का प्रश्न ही नहीं उठेगा। यदि सुख में नाम जप हो, तो दुख आएगा ही नहीं। दुख उसी के पास जाता है जो सुख में प्रभु को भूल जाता है। इसलिए हर स्थिति में नाम जप करना चाहिए। सुख में प्रभु को मत भूलो, तभी दुख भी मंगलमय हो जाएगा।
प्रश्न 6: पूजा/माला करते समय मन बहुत भटकता है, क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब माला हाथ में चल रही है और नाम मुख से निकल रहा है, तो भटकन धीरे-धीरे मिट जाएगी। लगे रहो, निरंतर अभ्यास करो। मन का स्वभाव है भूत-भविष्य में भागना। लेकिन जब भजन से मन निर्मल होता जाएगा तो यह सब मिट जाएगा। निरंतर नाम जप करते रहो, मन को रोकने की चिंता मत करो। समय लगेगा, पर भटकन शांत हो जाएगी।
प्रश्न 7: श्राद्ध का खाना खाना उचित है या नहीं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन करवाकर प्रसाद लेना शास्त्र सम्मत है। यदि पिता का श्राद्ध है तो कम से कम एक वैदिक ब्राह्मण को बुलाकर विधि से पवाना चाहिए। उसके पैर धोकर, आरती करके, आसन पर बैठाकर भोजन करवाना चाहिए और दक्षिणा देनी चाहिए। यदि ऐसा किया है तो उसमें कोई दोष नहीं। लेकिन मनमानी करना ठीक नहीं। शास्त्रीय विधि का पालन होगा तभी श्राद्ध सफल होगा।
प्रश्न 8: मानसिक संत अपराध और संतों के दोष दर्शन हो जाएं तो क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि संतों पर दोष-दृष्टि सबसे बड़ा अपराध है। संतों की दिनचर्या को देखकर आलोचना करना गलत है, क्योंकि हमें नहीं पता कि वे कब भजन करते हैं, कितना करते हैं और किस स्थिति में हैं। यदि कभी गलती से अपराध हो जाए तो मानसिक रूप से उनके चरणों में प्रणाम कर क्षमा मांग लेनी चाहिए। वैष्णव अपराध को छोड़कर बाकी सब अपराध नाम जप से नष्ट हो जाते हैं। लेकिन संत की निंदा की है तो उसी संत से क्षमा मांगना ही उपाय है।
प्रश्न 9: सब कुछ भगवान पर छोड़ देना — क्या इसका अर्थ अपनी भूमिका को शून्य मान लेना है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह बहुत ऊँची स्थिति है। वाणी से तो सब कहते हैं कि “सब भगवान कर रहे हैं”, लेकिन भीतर अहंकार रहता है कि “मैं कर रहा हूँ।” जब तक अहंकार है, तब तक जीव कर्ता और भोक्ता भाव में फँसा है। वास्तव में जो ज्ञानी है, वही जानता है कि सब कुछ भगवान या प्रकृति कर रही है। जब यह भाव दृढ़ हो जाता है कि मैं शून्य हूँ और सब कुछ भगवान कर रहे हैं, तभी जीव जीवन-मुक्त होता है। यह स्थिति साधना से आती है, केवल कहने से नहीं।
प्रश्न 10: व्यास जी ने कहा — परमात्मा सृष्टि से पहले, बीच और अंत में है; तो परमात्मा-परमात्मा में छल-कपट क्यों दिखता है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जो क्रिया को देखता है वह अज्ञानी है, और जो कारण को देखता है वही ज्ञानी है। किसी भी छल या द्वेष का परम कारण तमोगुण है, तमोगुण का कारण मूल प्रकृति है और उसका कारण ब्रह्म है। इस तरह सब ब्रह्म ही है। इसलिए छल-कपट भी अंततः ब्रह्म के कारण हैं। ज्ञानी को सब जगह वासुदेव ही दिखाई देता है। राग-द्वेष में फँसना अज्ञान है। जब भजन और शास्त्र-स्वाध्याय से ज्ञान जागेगा, तब सब जगह भगवान ही दृष्टिगोचर होंगे।
प्रश्न 11: निर्गुण भक्त कैसे बने?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि निर्गुण मार्ग बिना सद्गुरु की शरण में गए संभव नहीं। किसी निर्गुण उपासक महापुरुष की शरण में जाओ। वेदांत और उपनिषद सब निर्गुण निराकार की उपासना का ही वर्णन करते हैं। उनका अध्ययन करो और गुरु द्वारा बताए साधन का अभ्यास करो। असल में निर्गुण-निराकार तुम्हारा ही स्वरूप है, पर तुम अपने को आकार मानकर बंधे हो। आकार से हटना साधन का काम है। जब आकार से हटोगे तो निराकार को पहचान लोगे।
प्रश्न 12: पहले किसकी आराधना करूँ — भगवान शिव या श्री जी की?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि सर्वप्रथम भगवान शिव की आराधना करो। शंकर जी की कृपा के बिना कोई भी श्री जी की भक्ति नहीं पा सकता। देवाधिदेव महादेव की आराधना से ही राधा-कृष्ण की कृपा मार्ग में मिलती है। स्वयं महाराज जी कहते हैं कि उन्हें भी मार्ग महादेव की कृपा से ही मिला। इसलिए पहले शिव जी की उपासना करो, फिर श्री जी की ओर मन अपने आप लगेगा।
प्रश्न 13: निरंतर नाम जप करने पर मन शांत हो जाता है — न हंसने का मन, न रोने का मन। यह कैसी स्थिति है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह अच्छी स्थिति है। जब विषय-भोग, निद्रा, हंसी और जगत-प्रेम कम होने लगते हैं, तो यह भजन का फल है। यह गंभीर और शांत अवस्था है, इसमें भागवतिक वृत्ति बढ़ती है। साधक को लगेगा कि उसे किसी भी सांसारिक चीज़ में आकर्षण नहीं है, केवल भजन ही शेष है। यह स्थिति ईश्वर की कृपा और भजन का परिणाम है।
प्रश्न 14: मन में दूसरों के प्रति दुर्भावना क्यों आती है और इससे कैसे बचें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि दुर्भावना तब तक रहेगी जब तक हृदय पवित्र नहीं होता। और हृदय पवित्र तभी होगा जब निरंतर नाम जप होगा। जब नाम जप करते हैं तो भीतर सद्भावना आती है और नेगेटिव विचार मिट जाते हैं। भजन बल से ही यह स्थिति आती है। केवल समझाने या सोचने से यह नहीं मिटेगा। जब भजन बल प्रकट होगा, तब सामने अपमान या बुरा बर्ताव करने वाले में भी हमें श्यामसुंदर मुस्कुराते दिखाई देंगे। यह बड़ी स्थिति है और केवल नाम जप से ही संभव है।
प्रश्न 15: अपने पिछले जन्मों के कर्म-फल इस जन्म में क्यों भोगने पड़ते हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान का दरबार बहुत बड़ा न्यायालय है। जैसे पृथ्वी पर मुकदमा वर्षों तक चलता है, वैसे ही कर्मों का हिसाब भी कई जन्मों बाद मिलता है। भीष्म जी के उदाहरण में उन्होंने 70 जन्म पहले एक साँप को कांटों में फेंका था, उसका फल उन्हें बाणों की शैया में मिला। इसलिए कभी-कभी पुराने-पुराने कर्म भी हमें भुगतने पड़ते हैं। कर्मों का हिसाब भगवान के न्यायालय में पक्का है। इसलिए हमें पाप कर्म नहीं करने चाहिए, केवल अच्छे कर्म और नाम जप करना चाहिए।
प्रश्न 16: “मन जीते जगजीत” – इस लक्ष्य को पाने का मार्ग क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मन को भगवदाकार कर देना ही मुक्ति है। मन को विषयाकार बनाना बंधन का कारण है। जब मन, बुद्धि, चित्त सब कृष्णाकार हो जाएं, तभी मोक्ष है। इसके लिए राम-राम, राधा-राधा, कृष्ण-कृष्ण का निरंतर जप करना चाहिए। पहले जबान से जपो, फिर मन से जपवाओ, और दोनों को एक कर दो। तभी मन पर विजय होगी। मन को जीतने का और कोई मार्ग नहीं है। नाम जप ही सर्वोत्तम साधना है।
प्रश्न 17: जब अपने करीबी ही प्रेम/इज्ज़त न दें तो कैसे देखें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब प्रियजन प्रतिकूल आचरण करें, तब हमें उदासीन होना चाहिए। उदासीन का अर्थ है — न मित्रता, न शत्रुता; सम व्यवहार। यदि हम भजन करेंगे तो उनका प्रतिकूल आचरण हमें चोट नहीं पहुंचाएगा। अन्यथा हम दुखी हो जाएंगे और नकारात्मक चिंतन में डूब जाएंगे। इसलिए भजन करते रहो, नाम जप करते रहो और पॉजिटिव चिंतन बनाए रखो।
प्रश्न 18: स्वप्न के अनुभव का क्या महत्व है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि स्वप्न स्वप्न ही है, उसका कोई सत्य महत्व नहीं। जागृत अवस्था भी स्वप्न के समान है। जैसे राजा जनक ने अनुभव किया था कि जब स्वप्न में भीख मांग रहे थे तो जगत असत्य था, और जागृत में आने पर स्वप्न असत्य था। इसलिए स्वप्न को सत्य मानना मूर्खता है। साधना जागृत में करनी है, स्वप्नों से भ्रमित नहीं होना चाहिए।
प्रश्न 19: कभी 10,000 नाम जप अच्छे से हो जाते हैं — क्या यह पर्याप्त है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि 10,000 नाम जप तो अभी शुरुआती स्तर है। इसे बड़ा जप मत समझो। लाखों नाम जप करने चाहिए। असली भजन वह है जब साधक अपने को सबसे छोटा और तुच्छ समझे। जो अपने को भजनानंदी समझता है, वह भजन नहीं कर पाता। इसलिए संख्या पर गर्व मत करो, बल्कि नम्र होकर निरंतर नाम जप करते रहो।
प्रश्न 20: आत्मबल मज़बूत करने और भगवत-प्राप्ति की प्रबल इच्छा पूरी करने का उपाय क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि इसके लिए संत संग करो, भगवान की कथा सुनो, नाम जप करो, पवित्र भोजन और आचरण रखो। अधिक बोलो मत, अधिक सुनो और नाम जप करो। नाम जप करते-करते आत्मबल बढ़ेगा और भगवान के नजदीक पहुँचते जाओगे। जैसे पतंग डोरी से ऊपर जाती है, वैसे ही नाम डोरी है जो साधक को भगवान के पास ले जाती है। नाम जप ही भगवत-प्राप्ति का सीधा मार्ग है।
प्रश्न 21: जीवन की भागदौड़ और थकान में विश्राम कैसे मिले?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब संसार की भागदौड़ और थकान से मन थक जाए, तब सत्संग में बैठो। संतों का संग नया उत्साह और आत्मबल देता है। संसार में निराशा ही निराशा है, लेकिन सत्संग में बैठने से जीवन धन्य हो जाता है। साधु संग ही सच्चा विश्राम स्थल है। इसलिए थकान मिटानी हो तो साधु संग करो, नाम जप करो और जीवन को भगवान को समर्पित करो।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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