माला-1049: क्या यह भाग्य में लिखा था या राधा नाम संकीर्तन से भाग्य बदला है?,श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से

प्रश्न 1: महाराज जी, आप जो लोगों को सही मार्ग दिखा रहे हैं, क्या यह आपके भाग्य में लिखा था या राधा नाम संकीर्तन से भाग्य बदला है?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि यह सब हमारे भाग्य में नहीं लिखा था, बल्कि यह भगवान की कृपा से हो रहा है। उन्होंने न व्याकरण पढ़ा, न कहीं से सत्संग सीखा — केवल 9वीं कक्षा तक पढ़े हैं, फिर भी वेदों की वाणी जैसी बात कह पा रहे हैं, यह स्वयं सिद्ध करता है कि यह सब भगवान की प्रेरणा और कृपा से हो रहा है।

महाराज जी विशेष रूप से कहते हैं कि भाग्य में सिर्फ दो ही बातें लिखी होती हैं — पाप का फल दुख और पुण्य का फल सुख। बाकी सब — जैसे संत मिलना, भगवत भजन करना, भगवत प्राप्ति — यह सब कृपा से होता है, भाग्य से नहीं।

वे आगे बताते हैं कि भगवान जब कृपा करते हैं तो अयोग्य को भी योग्य बना सकते हैं। और भगवान की कृपा किस पर होगी यह उनके “मौज” पर निर्भर करता है — गुण देखकर नहीं, कभी-कभी तो अवगुण देखकर भी कृपा कर देते हैं।

लेकिन एक बात जो महाराज जी बहुत जोर से कहते हैं —
भगवान दीनता पर जल्दी रीझते हैं।

“जिसके हृदय में रहता है कि मैं सर्वगुणहीन हूं, पर हे भगवान, आपका हूं — तो कृपा वहीं उतरती है।”
जहाँ अहंकार होता है, वहाँ भगवान की कृपा रुक जाती है, और जहाँ दैन्यता होती है, वहाँ भगवान की कृपा बरसने लगती है।

इसलिए यह जो उपदेशों का कार्य हो रहा है, यह महाराज जी के अनुसार भाग्य में नहीं लिखा था, यह सब भगवान की कृपा और दैन्यता के भाव से सम्भव हुआ है।


प्रश्न 2: हम कैसे जानें कि भगवान हमारे जीवन में प्रसन्न हैं या नहीं?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि जब पाप कर्म न हों, धर्म का आचरण हो और भगवान का स्मरण निरंतर बने, तब समझो भगवान प्रसन्न हैं। जब संत संग मिलता है, धर्मपूर्वक जीवन चलता है और सुमिरन सहज बनने लगे, तब यह स्पष्ट संकेत है कि भगवान की प्रसन्नता हम पर है। यदि ऐसा न हो, तो हमें प्रयास करते रहना चाहिए कि प्रभु हम पर प्रसन्न हों। उनके सुमिरन और धर्म के आचरण की शक्ति हमें मिले — यही प्रार्थना करनी चाहिए।


प्रश्न 3: भक्तों और संतों की सेवा कैसे करें?

उत्तर:
सेवा का वास्तविक स्वरूप महाराज जी बताते हैं — “संत की आज्ञा का पालन करना ही सबसे बड़ी सेवा है।” भोजन, वस्त्र देना तो सेवा का एक भाग है, परंतु मुख्य सेवा है उनकी आज्ञा में चलना। यही सेवा हमें भगवतप्राप्ति की ओर ले जाती है। संत सेवा का फल निश्चित रूप से भगवान की प्राप्ति है। यदि संत की आज्ञा में जीवन चलता है, तो फिर संसार से मुक्ति और भगवतप्राप्ति सुनिश्चित है।


प्रश्न 4: शिक्षक यदि अध्यात्म से परे हों तो धार्मिक ग्रंथों का पठन सार्थक कैसे होगा?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि जैसे मिठाई वाला मिठाई न खाए पर बेचता है, फिर भी ग्राहक को स्वाद मिलता है। वैसे ही शिक्षक स्वयं अध्यात्म से युक्त न हों, फिर भी अध्यात्मिक ज्ञान देने से बच्चों पर प्रभाव पड़ता है। अध्यात्म का प्रभाव सूक्ष्म होता है, सुनने मात्र से विवेक जागृत होता है और धीरे-धीरे वह जीवन में उतरता है। यदि शिक्षक भी स्वयं अध्यात्म में रत हो, तो और भी अच्छा — परंतु केवल ग्रंथ पठन भी लाभकारी है।


प्रश्न 5: असफलता को सफलता की कुंजी कहा जाता है, फिर भी असफल होने पर हिम्मत क्यों टूटती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि इसका कारण है — ज्ञान का अभाव। जो व्यक्ति भगवान में विश्वास करता है, वह जानता है कि असफलता भी एक अनुभव है और भजन से ही सफलता मिलती है। जब व्यक्ति ईश्वर से जुड़ता है, तो छोटे-बड़े विफलताओं को भी सहकर आगे बढ़ता है। महाराज जी बताते हैं कि भगवान से जुड़ने पर ही वास्तविक शक्ति मिलती है। भजन और सत्संग से सहनशीलता आती है, जिससे व्यक्ति समभाव में रहकर सफल होता है।


प्रश्न 6: काम और परिवार के बीच भक्ति को समय नहीं दे पाते, क्या स्मरण पर्याप्त है?

उत्तर:
हाँ, महाराज जी कहते हैं कि हर कर्म को कृष्णार्पण करने से वह भक्ति बन जाता है। जैसे अर्जुन युद्ध कर रहे थे, पर वह भी पूजा बन गया। वैसे ही गृहस्थ अपने काम को भगवान को समर्पित कर दे और मन ही मन स्मरण करता रहे, तो वही कर्म भक्ति हो जाता है। यह ही भागवत धर्म है — कर्म को धर्मयुक्त करके भगवान को समर्पण। इससे भगवान की प्राप्ति होती है।


प्रश्न 7: गृहस्थ जीवन में रहते हुए निर्मोह स्थिति कैसे आए?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि जब हम सब में भगवान को देखने लगते हैं, तब मोह समाप्त होकर प्रेम बन जाता है। पत्नी, पुत्र, माता, पिता — सबमें शरीर न देखकर भगवान का अंश देखें। सत्संग और नाम जप के द्वारा विवेक उत्पन्न होता है और जब विवेक आता है, तो मोह नष्ट होता है। हर व्यक्ति में भगवत स्वरूप देखने की दृष्टि ही निर्मोह अवस्था की कुंजी है।


प्रश्न 8: जो कृपा और भक्ति मिली है, क्या वह माया या विकार छीन सकते हैं?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि जो भगवान भक्ति देते हैं, वही उसका पालन और रक्षा भी करते हैं। गीता में भगवान ने कहा है — “योगक्षेमं वहाम्यहम्”, अर्थात् जो भक्त मेरा चिंतन करता है, उसके योग और क्षेम का मैं वहन करता हूँ। इसलिए हमें चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि नाम जप और भक्ति में लगे रहना चाहिए। भगवान स्वयं रक्षा करेंगे।


प्रश्न 9: पति और बच्चों में से किस ओर अधिक कर्तव्य निभाना चाहिए?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि दोनों ही महत्वपूर्ण हैं — बच्चों में वात्सल्य है और पति में धर्म है। यदि कभी दोनों में टकराव हो तो धर्म का पक्ष लेना चाहिए, अर्थात् पति का। परंतु पति को अनुकूल करके ही बच्चों का पालन-पोषण किया जाए। धर्म और वात्सल्य का संतुलन रखना ही गृहस्थ का कर्तव्य है।


प्रश्न 10: विग्रह सेवा में त्रुटि का डर रहता है, क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — डर मत करो। विग्रह सेवा पुत्रवत करो। जैसे अपने बच्चे को स्नान कराते हो, भोजन कराते हो, वैसे ही ठाकुर जी की सेवा करो। डर सेवा में बाधा बनता है। सेवा तो स्नेह से होती है। केवल अपवित्र दशा (जैसे मासिक धर्म) में सावधानी रखो, अन्यथा प्रेम से, अपनत्व से सेवा करो — निश्चित कल्याण होगा।


प्रश्न 11: पति भजन नहीं करते, नाराज़ होते हैं, क्या करूँ?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — यदि कहने से परिवर्तन न हो, तो भजन करके उन्हें समर्पित करो। नाम जप में सामर्थ्य है, वह बुद्धि को बदल देता है। यदि प्रार्थना से न हो, तो भजन से परिवर्तन होगा। स्वयं नाम जप करो और उन्हें अर्पण कर दो, वही उनकी बुद्धि का परिष्कार करेगा।


प्रश्न 12: हम संतों जितना भजन नहीं कर पाते, तो निकुंज वास कैसे संभव?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी बहुत सुंदर उत्तर देते हैं — “हम डिब्बा हैं, संत इंजन हैं।” डिब्बा इंजन से जुड़ जाए तो वही गति पाता है। यदि हम आचार्य से जुड़ गए, उनके चरणों में शरणागत हो गए, तो उनके साथ हमारा भी कल्याण हो जाएगा। हमें केवल संबंध जोड़ना है — गुरु से, भगवान से। उनका साथ ही मोक्ष का मार्ग है।


प्रश्न 13: इच्छाएं पूरी न होने पर भक्ति से संदेह क्यों होता है?

उत्तर:
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि इच्छाओं की पूर्ति नहीं, आवश्यकता की पूर्ति ही ईश्वर करते हैं। अनावश्यक इच्छाएं पूरी न हों — यह भी उनकी कृपा है। यदि हमारी इच्छाएं हमें संसार में फंसा सकती हैं, तो भगवान उन्हें रोक लेते हैं। इसलिए भगवान पर संदेह नहीं, विश्वास करना चाहिए। भजन करते रहो — वही पाप को नष्ट करेगा और योग्य फल देगा।


📜 Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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