🙋🏻♀️ प्रश्न 1: मन बहुत अशांत रहता है, क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यदि मन को शांति देनी है, तो उसे भगवान में लगाओ। मन को संसार में लगाओगे तो अशांति, और भगवान में लगाओगे तो शांति मिलेगी। शांति पाने का सबसे सरल उपाय है — नाम जप। बार-बार भगवान का नाम लो, उनकी लीला सुनो, गुणगान करो, सत्संग में बैठो। संसार अशांत है, परंतु भगवान ‘शांत स्वरूप’ हैं। इसलिए भगवद चिंतन और धर्मपूर्वक जीवन ही मन को शांति देता है। यदि मन नाम में लग गया, तो अशांति की कोई जगह नहीं रहती।
🙋🏻♀️ प्रश्न 2: नींद बहुत आती है, भजन में मन नहीं लग पाता?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं – “नींद आना कोई दोष नहीं है, यह शरीर की स्वाभाविक प्रक्रिया है।” यदि शरीर जवान है तो कम से कम छह घंटे की नींद जरूरी है। लेकिन जब जागो, तो जागरण में प्रमाद मत करो। नींद से पहले सोने का समय पूरा दो, लेकिन जब भजन करो तो पूरे पुरुषार्थ से करो। यदि नींद भजन में बाधा बन रही है, तो खड़े हो जाओ, मुंह पर पानी डाल लो। नींद घटाने की चिंता छोड़ो — नाम जप में लीन हो जाओ, नींद अपने आप कम हो जाएगी।
🙋🏻♀️ प्रश्न 3: शरीर के प्रति आसक्ति (राग) को कैसे हटाएं?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि शरीर राग को हटाने के लिए संत सेवा अत्यंत आवश्यक है। जब भगवदप्रेमी संतों की सेवा होती है, तब हमारे पाप और अज्ञान दोनों मिटते हैं और भगवान में प्रेम जागता है। यही प्रेम धीरे-धीरे शरीर के राग को समाप्त कर देता है। संत सेवा से ज्ञान और वैराग्य पैदा होता है, और फिर नाम जप और भक्ति में सहज मन लगने लगता है। इसलिए जो भी शरीर के राग से मुक्ति चाहता है, उसे भगवत प्रेमियों की सेवा करनी चाहिए।
🙋🏻♀️ प्रश्न 4: बच्चों में भक्ति संस्कार कैसे भरें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि बच्चों को प्रेम से प्रेरित करना होगा। आजकल के बच्चों पर मोबाइल का असर है, इसलिए उन्हें वीर महापुरुषों के चरित्र सुनाएं। दिनचर्या संयमित करें — ब्रह्मचर्य, व्यायाम, पवित्र भोजन और 5 मिनट का नाम जप भी यदि नियमित हो, तो संस्कार बनते हैं। स्कूलों में प्रार्थनाएँ होती थीं – “हे प्रभु आनंददाता…” – ऐसी प्रार्थनाओं को दोहराना चाहिए। बच्चों में आध्यात्मिकता आएगी यदि गुरुजन संयम, सेवा और श्रद्धा से उन्हें मार्ग दिखाएँ।
🙋🏻♀️ प्रश्न 5: ज्ञान यज्ञ किसे कहते हैं?
उत्तर:
ज्ञान यज्ञ का अर्थ है – तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) का राग त्यागकर आत्मा में स्थित हो जाना। भगवान की चर्चा करना, शास्त्रों के सिद्धांतों को जानना, सत्संग में भाग लेना – यह भी ज्ञान यज्ञ है। इसमें ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और भगवद गुणों की लीला होती है। जब हम अपने स्वभाव से उठकर अपने ब्रह्मस्वरूप में टिकते हैं, तब ज्ञान यज्ञ की पूर्णता होती है। हर सत्संग, हर भगवद चर्चा — एक प्रकार का ज्ञान यज्ञ ही है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 6: सतोगुण क्या माया के अधीन है?
उत्तर:
जी हाँ, महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि सतोगुण भी माया का ही अंग है, परन्तु यह सबसे उपयोगी है। जैसे कांटे से कांटा निकाला जाता है, वैसे ही सतोगुण से रजोगुण और तमोगुण को हराया जा सकता है। लेकिन अंततः सतोगुण का भी त्याग करना होता है। सात्विक भोजन, सात्विक संग और सात्विक भाव रखने से भक्ति की ओर झुकाव होता है। जब भक्ति प्रगाढ़ हो जाती है, तब गुणातीत स्थिति प्राप्त होती है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 7: प्रेम का वास्तविक स्वरूप क्या है?
उत्तर:
प्रेम का असली स्वरूप है — स्व का विस्मरण। जब प्रेम इतना गहरा हो जाए कि “मैं” की सुधि न रहे, केवल प्रियतम ही स्मरण में रहे, तभी वह सच्चा प्रेम है। महाराज जी कहते हैं, “जो प्रेम में होता है, उसे देह का भी ज्ञान नहीं रहता।” आँखों में प्रेम के आँसू, वाणी में केवल नाम, और चित्त में केवल प्रियतम — यही तो प्रेम है। प्रेमास्पद में पूर्ण लय ही प्रेम है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 8: क्रियात्मक जीवन में भाव समाधि कैसे लगती है?
उत्तर:
जब नाम जप, सत्संग और भक्ति निरंतर होती है, तब शरीर की क्रियाएँ तो चलती हैं लेकिन साधक भाव समाधि में स्थित रहता है। महाराज जी उदाहरण देते हैं — गोपियाँ दही बेचने जा रही थीं, लेकिन बोल रही थीं: “गोविंद लो, माधव लो…” यह भाव समाधि है। क्रियाएँ हो रही हैं पर चेतना भगवान में लीन है। जब आत्म समर्पण होता है, तब भगवान साधक की बुद्धि में बैठकर स्वयं कार्य कराते हैं। यह स्थिति नवधा भक्ति की चरम अवस्था है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 9: अपनी प्रशंसा सुनने से कैसे बचें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि अपनी प्रशंसा सुनना भी पुण्य को नष्ट करता है। यह अहंकार को पोषण देता है। जब कोई आपकी प्रशंसा करे, तो उसे भगवान की कृपा मानकर मौन हो जाओ। अपने मुख से अपनी प्रशंसा करना, या दूसरों से सुनकर हर्षित होना — यह हमारे अंतःकरण को अशुद्ध करता है। हमें तृणादपि सुनीचेन के भाव से — विनम्र, मौन और अहंकारशून्य बनना चाहिए।
🙋🏻♀️ प्रश्न 10: पढ़ाई, करियर और भविष्य की चिंता कैसे छोड़ें?
उत्तर:
महाराज जी सिखाते हैं – सच्चा सहारा केवल भगवान हैं। जब अकेलापन, तनाव या अवसाद हो, तब व्यायाम करो, ब्रह्मचर्य रखो, माता-पिता के चरण स्पर्श करो, और नाम जप करो। 10 मिनट सत्संग भी जीवन में उत्साह भर देता है। जब भगवान का नाम लिया जाता है, तो भीतर से आत्मबल उत्पन्न होता है। संसार में कोई सहयोगी न हो, लेकिन भगवान की कृपा हो — तो सब कुछ संभव है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 11: विषय वासना और भोग की प्रवृत्ति कैसे नष्ट हो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि विषय वासना का नाश भजन के बल से ही संभव है। जब तक मन की वासनाएँ बची हैं, तब तक गिरने का खतरा है — चाहे कोई भी अवस्था हो। जैसे जनक विदेह थे, वैसे ही जब संसार में रहकर भी भोग का आकर्षण न बचे, तब शुद्ध भजन संभव होता है। सत्संग, संयम, सेवा और नाम जप से धीरे-धीरे वासना शांत होती है और भजन में गहराई आती है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 12: अंततः क्या करें कि जीवन सफल हो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “बस नाम ना छूटे।”
नाम ही पतंग की डोरी है, श्रीजी पतंग हैं। अगर नाम पकड़ा है तो श्री जी से जुड़ना निश्चित है। हम जितना नाम जप करेंगे, उतनी कृपा प्राप्त होगी। संसार की कोई भी विधि, उपाय, कर्म — तब तक अधूरे हैं जब तक नाम नहीं है। इसलिए नाम जप करते रहो, और श्री जी की कृपा से सब कार्य सिद्ध हो जाएंगे।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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