माला-1047: सनातन धर्म का वास्तविक अर्थ क्या है ?, श्री Premanand Maharaj Ji के अमृत वचनों से

 1: पारिवारिक रिश्तों में बहुत अधिक आसक्ति है, इसे श्री जी की तरफ कैसे मोड़ें?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि यह संसारिक मोह भगवान की माया का परिणाम है, जिसमें जीव पूरी उम्र शरीर और रिश्तों के पीछे भागता रहता है। जब तक हमारा मन नाम जप में नहीं लगेगा, तब तक मोह बना रहेगा। जैसे-जैसे हम नाम जप करेंगे, वैसे-वैसे भीतर विवेक जागेगा और मोह मिटेगा। नाम जप से मन भगवान से जुड़ता है और अपनापन श्रीजी से होता है, जिससे बाकी सब पर प्रेम तो होता है, पर मोह नहीं रहता। मोह को खत्म करने का एक ही उपाय है – सत्संग और नाम जप। सत्संग से विवेक जागेगा, और विवेक से मोह भागेगा। यही मार्ग है श्रीजी की ओर जाने का।


 2: जिन लोगों से कष्ट मिला, उनका चेहरा देखकर मन अशांत हो जाता है, क्या करें?

उत्तर:

महाराज जी समझाते हैं कि जो भी कष्ट हमें किसी ने दिया, वह वास्तव में हमारे अपने ही कर्मों का फल है। वह व्यक्ति मात्र निमित्त है। जैसे गौतमी के पुत्र को सांप ने काटा, लेकिन उस घटना के पीछे काल, मृत्यु और अंततः कर्म था — ठीक वैसे ही, हमारे दुखों के पीछे हमारा कर्म ही है। जब तक हम यह नहीं समझेंगे, तब तक शांति नहीं मिलेगी। उस व्यक्ति को दोष देने के बजाय, हमें अपने कर्मों को स्वीकार कर क्षमा करना चाहिए। और यदि ये बातें समझ में ना आएं, तो नाम जप ही वह शक्ति है जो इन विचारों को हमारे भीतर से निकाल फेंकेगी।


 3: कोई कुछ उल्टा बोल दे तो बहुत परेशान हो जाता हूँ, मन काम से हट जाता है, क्या करें?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि यह स्थिति बहुत कमजोर मन की है। समाज में कई लोग होते हैं जो स्वयं डिस्टर्ब होते हैं और दूसरों को भी डिस्टर्ब करते हैं। हमें चाहिए कि ऐसे लोगों से प्रभावित न हों। अगर कोई कुछ कहे तो शांत रहकर आवश्यक उत्तर दें, पर अपने कर्म और कर्तव्य से विचलित न हों। गुस्से से अपराध हो सकता है, पर संयम से समाधान। हमें हारना नहीं है, न ही अपने व्यापार, सेवा या भजन से हटना है। हमें अपने मन को मजबूत करना होगा – नाम जप से ही अंदर की शक्ति जागेगी।


 4: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में संतुलन कैसे रखें?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि यदि हम धर्म के अनुसार अर्थ कमाते हैं, तो कामनाएं हमें नहीं रोक पाएंगी, बल्कि मोक्ष की ओर ले जाएंगी। लेकिन यदि हम अधर्म से धन कमाएंगे, तो वह अर्थ और काम हमें पागल बना देंगे। धर्म से अर्थ कमाया जाए, धर्म से कामनाएं नियंत्रित हों — तब मोक्ष की इच्छा स्वतः उत्पन्न होती है। इसके लिए शास्त्रों का स्वाध्याय और संतों का संग आवश्यक है। धर्म को समझकर कार्य करें, वही मार्ग मोक्ष की ओर जाता है।


 5: सनातन धर्म का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji स्पष्ट करते हैं कि सनातन धर्म कोई सीमित परिभाषा नहीं है, न ही यह किसी एक जाति, मत, संप्रदाय, या समुदाय का धर्म है। सनातन शब्द का अर्थ है — जो अनादि है, अनंत है, और नित्य है। जो कभी न पैदा हुआ, न कभी नष्ट होगा — वही सनातन है।

महाराज जी समझाते हैं कि:

ब्रह्म सनातन है। श्रीराम सनातन हैं। श्रीकृष्ण सनातन हैं। सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी — ये सब सनातन हैं।

इस सृष्टि का कण-कण उसी सनातन से निकला है। यह वायु जो हमें जीवन देती है, यह अग्नि जो हमें ऊर्जा देती है, यह पृथ्वी जो हमें धारण किए हुए है — ये सब उसी सनातन ब्रह्म की अभिव्यक्ति हैं। इसीलिए चराचर जगत (चल और अचल सृष्टि) उसी ब्रह्म से प्रकट हुआ है, उसी में पलता है और उसी में विलीन हो जाता है।

महाराज जी कहते हैं:

जैसे आकाश व्याप्त है, वैसे ही सनातन तत्व ब्रह्म हर जगह व्याप्त है।
वह एक व्यक्ति विशेष का धर्म नहीं, वह तो सम्पूर्ण सृष्टि का मूल धर्म है।”

सनातन धर्म कोई मत या पंथ नहीं है — यह तो संपूर्ण सृष्टि की आत्मा है। जैसे आकाश में सब कुछ समाया हुआ है, वैसे ही सनातन में ही सब कुछ है। Premanand Maharaj Ji बार-बार दोहराते हैं कि:

सनातन किसी व्यक्ति का धर्म नहीं है, सनातन ब्रह्म है।

इसका भाव यह है कि जब हम “सनातन धर्म” की बात करते हैं, तो हम किसी संगठन या संस्था की नहीं, बल्कि परमात्मा की शाश्वत सत्ता की बात कर रहे होते हैं — वही सत्ता जो सृष्टि के पहले भी थी, सृष्टि में भी है और सृष्टि के बाद भी रहेगी।


 6: क्या सरकारी कर्तव्यों को प्रभु सेवा मान सकते हैं?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि संसार में किए गए सभी कार्य यदि भगवान को समर्पित भाव से किए जाएं, तो वे सेवा बन जाते हैं। सरकारी कार्य हो या पारिवारिक, अगर हम उन्हें करते हुए नाम जप करें और प्रभु को अर्पित करें — “हे प्रभु! यह सेवा आपकी है” — तो वही कर्म भगवान की ओर ले जाएगा। नाम जप के साथ किया गया कर्म भगवत सेवा बन जाता है।


 7: नाम जप में राधा जी और साकार गुरु एक ही रूप में दिखते हैं, यह स्थिति कैसी है?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि यह स्थिति बहुत ही शुभ और दिव्य है। यदि राधा जी और गुरु एक ही स्वरूप में दिखते हैं, तो यह साधक की उच्च स्थिति का संकेत है। इसमें कोई चिंता नहीं, यह स्थिति आगे अपने आप मार्गदर्शन की भूख जगाएगी और उचित समय पर गुरु दीक्षा की भावना भी जागेगी।


 8: पूजापाठ के बावजूद मन की शांति नहीं मिल रही, क्या करें?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji स्पष्ट कहते हैं — “नाम जप करो।” जब तक चित्त भगवान से नहीं जुड़ता, शांति नहीं मिलती। केवल धन, मकान या संसाधन से संतोष नहीं होता। चित्त जब श्री नाम में लगता है, तब ही मन शांत होता है। इसलिए उठते, बैठते, चलते, फिरते नाम का जाप करते रहो — सब कुछ अपने आप शुद्ध और शांत हो जाएगा।


 9: भगवान को पूर्ण समर्पण कैसे करें?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि समर्पण का अर्थ है – तन, मन और वाणी तीनों से भगवान के चरणों में लीन होना। शरीर से पाप या अधर्म न करें, वाणी से झूठ, निंदा या दुखद बातें न करें और मन से किसी का अहित न सोचें। नाम जप, सत्य वचन, और सेवा भाव — यही समर्पण की नींव हैं। जब तन, मन और वाणी शुद्ध होकर प्रभु को अर्पित हो जाते हैं, तभी सच्चा समर्पण होता है।


 10: इच्छाएँ पूरी होती हैं पर नई इच्छाएँ बढ़ती जाती हैं, क्या करें?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji कहते हैं — “चाहे जैसे” वाला भाव खतरनाक है। इच्छाओं को धर्म से ही पूरा करना चाहिए, अधर्म से नहीं। भगवान कृपा करें तो पूर्ण करेंगे, नहीं तो उनका भी कारण है। हमें अपने मन को ‘जैसे भी हो’ से हटाकर ‘जैसा प्रभु चाहें’ में स्थिर करना होगा। जितना भजन करेंगे, उतनी ही इच्छाओं की पूर्ति और नियंत्रण दोनों होंगे।


 11: मैं सैनिक हूँ, पर मातापिता के लिए पर्याप्त नहीं कर पाता, क्या करूँ?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji सैनिकों को संतों के समान मानते हैं। जो देश की सेवा में अपने प्राण अर्पित कर देता है, उसकी चिंता स्वयं भगवान करते हैं। राष्ट्रधर्म में लगे सैनिक का कर्तव्य ही उसकी सर्वोच्च सेवा है। भगवान आपके माता-पिता की रक्षा और देखभाल स्वयं करेंगे। आपका जीवन महान है, देश को और ईश्वर को समर्पित है।

 12: बिना दीक्षा के महामृत्युंजय मंत्र का संकल्प ले लिया, अब क्या करें?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि यदि आपने अज्ञानवश मंत्र जप शुरू किया है, तो अब डरने या पछताने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य जीवन में भगवान ने हमें जप का अधिकार दिया है। आप किसी योग्य संत से दीक्षा लें और मंत्र जाप को विधिवत पूरा करें। यदि पहले किसी पंडित के साथ संकल्प लिया था, तो उन्हें ही गुरु मानकर भी जप जारी रख सकते हैं। भगवान भावना के भूखे हैं, नियमों में अटकने से अधिक आवश्यक है – मन की श्रद्धा और समर्पण। डटकर जप करें, और डरें नहीं।


 13: क्या केवल फलाहार करने से भगवान मिल जाते हैं?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji इस प्रश्न पर स्पष्ट कहते हैं कि केवल फलाहार या उपवास से भगवान नहीं मिलते। यदि ऐसा होता तो जंगल के सारे पशु-पक्षी, जो फल ही खाते हैं, उन्हें भगवान मिल जाते। लेकिन ऐसा नहीं है। भगवान मिलते हैं भजन से, दैन्य भाव से, आंतरिक तपस्या से। भोजन में पवित्रता होनी चाहिए, दिखावा नहीं। अगर फलाहार करके अहंकार पनपता है, तो वह भक्ति को नष्ट कर देगा। अतः प्रेम से भोजन कर, उसे प्रभु को समर्पित कर, डटकर नाम जप करो – यही सही मार्ग है।


 14: क्या हर जन्म में अलग दीक्षा गुरु होते हैं?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji कहते हैं कि यदि पिछले जन्म में सच्चा भजन होता, तो भगवत प्राप्ति हो गई होती। इसलिए आज जो अवसर मिला है, वह बहुत मूल्यवान है। पूर्वजन्म की असफलताओं को छोड़कर, इस जन्म में ही लक्ष्य तय करो – डटकर भजन करो, सद्गुरु की शरण में जाओ, और भगवत प्राप्ति का प्रयास करो। कलयुग की गति बहुत तेज़ है – मोबाइल, विकर्षण और भोग की बाढ़ है। ऐसे में आगे फिर यह अवसर मिले या नहीं, कह नहीं सकते। इसलिए इस जन्म को ही अंतिम समझकर साधना करो।


 15: मोबाइल, रील्स, इंटरनेट के कारण भजन में रुचि नहीं रही, क्या करें?

उत्तर:

Premanand Maharaj Ji बड़े ही करुण भाव से कहते हैं कि यह स्थिति गंभीर है। मोबाइल अब साधन नहीं, विकार का कारण बनता जा रहा है। छोटे बच्चे, विद्यार्थी, गृहस्थ – सभी इसके दुष्प्रभाव से ग्रस्त हैं। पहले लोग सुबह उठकर माता-पिता के चरण छूते थे, अब 9 बजे तक मोबाइल में डूबे रहते हैं। इसलिए उपाय यही है – स्विच ऑफ करो, सीमित उपयोग करो, और भजन के समय मोबाइल से दूरी बनाओ। यह संयम अगर रख लिया, तो जीवन सुधर जाएगा। याद रखो – भोग और भजन एक साथ नहीं हो सकते। निर्णय लो — अब जीवन को भगवान की ओर मोड़ना है।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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