प्रश्न 1: मृत्यु से इतना भय क्यों लगता है, इस डर से कैसे मुक्त हों?
उत्तर:
मृत्यु का भय लगभग हर किसी को सताता है, क्योंकि मन को लगता है कि सब छूट जाएगा—शरीर, प्रियजन, सम्पत्ति। महाराज जी समझाते हैं कि यह डर केवल अज्ञानता और मोह के कारण है। जब ईश्वर का नाम-जप और सच्चा भजन जीवन में आ जाता है, तो मृत्यु भी एक प्राकृतिक अवस्था प्रतीत होने लगती है। भक्ति की शक्ति से मन में निरंतर यह भाव आता है कि मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि प्रभु से मिलने का एक प्रसन्न अवसर है। नाम-जप और भक्ति से डर धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है, और आत्मा को परमानंद का अनुभव होने लगता है।
प्रश्न 2: क्या यूट्यूब या सत्संग से सुना मंत्र भी गुरु मंत्र है? क्या कान फुकवाना ज़रूरी है?
उत्तर:
गुरु मंत्र को लेकर बहुत लोगों के मन में संशय रहता है। महाराज जी का स्पष्ट उत्तर है—अगर किसी संत या गुरु के वचन को सच्ची श्रद्धा और भाव से अपना लिया, चाहे वह यूट्यूब या सत्संग के माध्यम से सुना हो, और उसका नियमित जप किया जाए, तो वही मंत्र आपके लिए गुरु मंत्र बन जाता है। केवल कान फुकवाना आवश्यक नहीं, असली महत्त्व भाव और आज्ञा पालन में है। भाव और गुरु के वचनों में सच्चा समर्पण ही आपके जीवन में बड़ा बदलाव लाता है।
प्रश्न 3: जब अपने ही हमें निरादर या घृणा दें तो मन को शांत कैसे रखें?
उत्तर:
रिश्तों में जब प्रेम के बदले घृणा या निरादर मिले तो मन बहुत दुखी होता है। महाराज जी कहते हैं कि इस संसार में स्वार्थ, छल-कपट आम बात है, सच्चे हृदय और सच्चे प्रेम की पहचान बहुत कम लोगों में है। ऐसी अवस्था में मन को भगवान का नाम जपना चाहिए, क्योंकि सच्चा प्रेम और शांति केवल प्रभु की शरण में ही मिलती है। भक्त का मूल भाव यही होना चाहिए कि यह दुनिया बदलने का स्थान नहीं, बल्कि अपने मन को प्रभु में टिकाने का समय है।
प्रश्न 4: क्या अधर्मी व्यक्ति वास्तव में भीतर से शांत होता है?
उत्तर:
अधर्मी व्यक्ति चाहे बाहर से जितना भी मजबूत या सफल दिखे, उसके भीतर चैन और शांति का नामोनिशान नहीं होता। महाराज जी के अनुसार, पाप का धन अथवा अधर्मी कर्म अंततः भय, चिंता, और मानसिक अशांति ही लाते हैं। ऐसे व्यक्ति जब अकेले होते हैं, तो उनके मन में डर और पछतावा घर कर जाता है। भक्ति का मार्ग, ईमानदारी और प्रभु का नाम-जप ही सच्ची मानसिक शांति का एकमात्र उपाय है, क्योंकि अधर्म अपने साथ दुर्भाग्य और दुःख ही लाता है।
प्रश्न 5: रोज़ पाप हो जाता है, ऐसे में क्या प्रभु मिल सकते हैं?
उत्तर:
मानव से भूल-संयोगवश पाप हो ही जाते हैं, परंतु यदि कोई व्यक्ति जान-बूझकर पाप करता है तो वह सबसे बड़ी विडंबना है। महाराज जी कहते हैं कि भगवान महामित्र हैं, क्षमा कर सकते हैं, अगर अपराध गलती से हुआ है और हृदय में सच्चा पछतावा है। लेकिन जानकर बार-बार पाप को दोहराना निहायत जोखिम भरा है। भक्ति का सही मार्ग है भावपूर्वक नाम-जप और संतों की शरण लेना, और हर संभव प्रयास करके पाप से बचना।
प्रश्न 6: क्या शरणागत व्यक्ति का स्वाभिमान भी अहंकार होता है?
उत्तर:
महाराज जी इस विषय में स्पष्ट हैं—प्राकृतिक या माया से जुड़ा अहंकार त्याज्य है, लेकिन “मैं प्रभु का दास हूँ” यह भाव, यह स्वाभिमान बिलकुल वाजिब है। सच्चे भक्त को अपने प्रभु की दासता और प्रेम का गर्व होना चाहिए, वह अहंकार नहीं है। जब अहंकार में सेवा, विनम्रता और अपनापन जुड़ जाए तो वह अहंकार नहीं, बल्कि भक्ति की पराकाष्ठा है। अतः शरणागत का आत्मगौरव प्रभु की कृपा का प्रमाण है।
प्रश्न 7: केवल कथा/प्रवचन सुनने से क्या ईश्वर की प्राप्ति संभव है?
उत्तर:
सवाल है कि क्या केवल प्रवचन, कथा सुनने भर से परमात्मा की प्राप्ति होती है? महाराज जी का उत्तर है—केवल सुनना पर्याप्त नहीं, जरूरी है कि जीवन में उन उपदेशों को उतारा जाए। जैसे रसोई की विधि सुनने से स्वाद नहीं आता, वैसे ही कथा का फल तभी मिलेगा जब उसका अभ्यास किया जाए, मन में नाम-जप और सेवाभाव आए। सत्संग, श्रवण से पुण्य होता है, लेकिन परमात्मा की प्राप्ति के लिए मनन, भाव और अभ्यास अनिवार्य हैं।
प्रश्न 8: गुरु का लाडला बनने के लिए क्या केवल गुरु-कृपा काफी है?
उत्तर:
गुरु का लाडला बनने के लिए क्या सिर्फ गुरु-कृपा चाहिए या स्वयं का प्रयास भी आवश्यक है? महाराज जी का उत्तर है कि केवल कृपा ही नहीं, तन-मन-प्राण से समर्पण और स्वयं का पुरुषार्थ भी जरूरी है। सच्चा शिष्य वही है जो गुरु की आज्ञा पर अपने जीवन का सर्वस्व समर्पित कर दे। मात्र नाम के लिए शिष्य बनना पर्याप्त नहीं, समर्पण और प्रयत्न दोनों के मेल से ही शिष्य वास्तव में गुरु का प्रिय बनता है।
प्रश्न 9: भगवान से बार-बार माँगना चाहिए या सब कुछ उनकी इच्छा पर छोड़ देना चाहिए?
उत्तर:
भगवान से अपने जीवन की जरूरतें बार-बार माँगनी चाहिए या फिर सब कुछ उन्हें समर्पित कर देना चाहिए? महाराज जी के मुताबिक़, भगवान का भंडार अनंत है। अपनी भावनाएँ प्रभु को बताने में हरज नहीं, लेकिन कम की कामना मत करो, बल्कि प्रभु पर भरोसा रखो कि वह स्वयं उत्तम देंगे। सारे दुःख-सुख, इच्छाएँ और भरोसा प्रभु पर छोड़ दो, और उसी में आनन्दित रहो—यही सच्चा भक्ति मार्ग है।
प्रश्न 10: जब संतों की बातों पर तर्क या शंका आती है, तो क्या करना चाहिए?
उत्तर:
अगर कभी किसी संत की बात में तर्क या संशय आता है, तो उसे मन में दबाना नहीं चाहिए। महाराज जी समझाते हैं कि गुरु या संत से सीधा प्रश्न करो, तर्क का समाधान शांति से लो। संशय गलत नहीं, लेकिन उसे दबाने से मन भटकता है। भक्ति मार्ग पर भरोसा रखो, और नाम-जप की शक्ति से सब उलझन दूर होती है—क्योंकि नाम-जप में अपार सामर्थ्य है, और तर्क-शंकाओं का शांति से उत्तर लेना विवेक का परिचायक है।
प्रश्न 11: टोटके, उपाय आदि की जगह सिर्फ नाम-जप क्यों सबसे बड़ा है?
उत्तर:
संकट या दुख आने पर लोग टोटकों या उपायों की ओर जाते हैं, परंतु महाराज जी का स्पष्ट निर्देश है कि असली शांति, सुख और मंगल केवल भगवान के नाम-जप और भजन में है। टोटकों से कुछ नहीं मिलता, ये केवल भ्रम हैं। प्रारब्ध में जो कष्ट है, उसका भोग भी नाम-जप से शक्ति और साहस मिलता है। परमकल्याण, पाप का नाश, और सच्चा मंगल नाम-जप व भक्ति से ही संभव है—अन्य उपाय केवल समय गँवाते हैं।
प्रश्न 12: अगर जीवन में हमें सद्गुरु बहुत देर से मिले, तो कैसा भाव रखना चाहिए?
उत्तर:
यदि किसी को सद्गुरु या भक्ति का मार्ग जीवन के मध्य या उत्तरार्ध में मिले, तो क्या पश्चाताप करना चाहिए? महाराज जी कहते हैं—बीता हुआ समय भूल जाओ, जितना समय अब मिला है, वही पर्याप्त है। जितने भी क्षण मिल गए, उनका उपयोग सेवा, नाम-जप और परोपकार में करो, वही सबकुछ बदल सकता है। अतीत पर पछताने की जगह वर्तमान को प्रभु-जीवन और भक्ति में लगाना ही श्रेयस्कर है।
प्रश्न 13: महाराज जी बिना बताए शिष्यों के मन का प्रश्न कैसे जान लेते हैं?
उत्तर:
कई लोग अनुभव करते हैं कि महाराज जी बिना कहे शिष्यों के मन का प्रश्न जान जाते हैं—इसका राज क्या है? महाराज जी कहते हैं कि इसका कारण है कि भगवान सभी के हृदय में एकसाथ बैठे हैं। वही प्रश्न कराने वाला, वही उत्तर देने वाला है। जब मन में सच्चा प्रश्न आता है, भगवान अपने साधक के मुख से तुरंत उसका समाधान करा देते हैं। यह सब प्रभु की प्रेरणा और लीला है, उसमें अहंकार नहीं, केवल विश्वास चाहिए।
प्रश्न 14: सत्य मार्ग पर चलने के बावजूद जब दुख आता है, तो क्यों आता है?
उत्तर:
धर्म और सच्चाई से चलने वाले व्यक्ति को निर्बाध सुख क्यों नहीं मिलता? महाराज जी के अनुसार, यह पुराने प्रारब्ध, पूर्व के कर्मों का फल है। कभी-कभी धर्मात्माओं को भी दुख भोगना पड़ता है, और पापियों को सुख मिलता है—but यह सब अस्थायी है। सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाले को अंत में विजय और शांति अवश्य मिलती है। इसलिए दुख की घड़ी में भी नाम-जप, भक्ति और विश्वास न छोड़ें।
प्रश्न 15: जब लोग हमारे साथ गलत व्यवहार करें, तब हमें कैसा आचार रखना चाहिए?
उत्तर:
अगर कोई हमारे साथ छल, धोखा या बुरा व्यवहार करता है तो बदले में हमें क्या करना चाहिए? महाराज जी का उत्तर है—गलत के बदले गलती मत करो। संयम, विनम्रता और क्षमा में ही सच्ची शक्ति है। अपमान सहकर, हिंसा या प्रतिक्रियात्मक कार्रवाइयों से बचना चाहिए। परमात्मा सब देखता है और हर व्यक्ति को उसके कर्म का फल जरूर मिलता है। क्षमा, शांति और भक्ति में ही उन्नति है।
प्रश्न 16: भक्ति और भाव में क्या अंतर है?
उत्तर:
भक्ति और भाव का फर्क क्या है? महाराज जी समझाते हैं—भक्ति साधना है, भाव उसका मधुर फल है। भक्ति के माध्यम से जब मन पूरी तरह प्रभु में डूब जाता है, तब प्रेम, अपनापन यानी “भाव” उत्पन्न होता है। भगवान सिर्फ भक्ति या सेवा से नहीं, भाव से प्रसन्न होते हैं। बिना भाव के, भक्ति अधूरी है। भाव वही तत्त्व है जो सेवक को प्रभु के सर्वाधिक समीप पहुंचाता है।
प्रश्न 17: श्री जी की सेवा में अपनापन और समर्पण भाव कैसे प्रकट करें?
उत्तर:
श्री जी की सेवा करते समय मन में अपनापन और समर्पण कैसे उत्पन्न करें? महाराज जी कहते हैं—नाम-जप, भजन या सेवा को जब अपनापन और भावना पूर्वक करते हैं, तब वह सच्चा समर्पण कहलाता है। जैसे अपने बच्चे की देखभाल में जितना प्रेम, उतना ही श्री जी को सेवा में भी लाओ। जो कुछ भी प्रेम से अर्पित किया जाता है, चाहे वह तुलसी-दल हो, चुल्लू जल हो, जब उसमें अपनापन और प्रेम होता है तो श्री जी बड़े प्रसन्न होते हैं। यही सेवा का रहस्य है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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