🙋🏻♀️ प्रश्न 1: स्वार्थी प्रेम को निष्काम प्रेम कैसे बनाएं?
प्रेमानन्द महाराज जी उत्तर देते हैं:
देखो, अगर कोई कहता है कि —
“मुझे भजन में आनंद आए, मेरे दोष छूटें, मुझे भगवान की प्राप्ति हो जाए…”
तो ये स्वार्थ नहीं, परमार्थ है।
ऐसी भावना स्वार्थ के भीतर छुपा हुआ ईश्वर प्रेम है।
महाराज जी कहते हैं —
“अगर तुम्हारा यह स्वार्थ है कि मेरा भजन बढ़े, मेरे दोष छूटें और मैं प्रभु को पा लूं — तो यह बहुत ही शुभ है, यही तो परमार्थ है।”
असल में, निष्काम प्रेम अचानक नहीं आता।
यह साधना और अभ्यास से धीरे-धीरे पनपता है।
जब हम निरंतर नाम जप करते हैं, और अपने भीतर झांकते हैं,
तब धीरे-धीरे इच्छाओं का धुंधलापन हटता है और
मन शुद्ध प्रेम की तरफ बढ़ने लगता है।
महाराज जी समझाते हैं कि —
“अगर प्रेम में कोई स्वार्थ भी छुपा है, लेकिन वह प्रभु से मिलने का है,
तो वह स्वार्थ भी पवित्र हो जाता है।”
ऐसा प्रेम धीरे-धीरे निष्काम हो जाता है,
क्योंकि जब एक बार प्रभु का रस लग गया,
तो फिर कुछ और चाहना बाकी ही नहीं रह जाती।
इसलिए घबराओ मत अगर अभी प्रेम में स्वार्थ दिखाई देता है।
नाम जप करते रहो, भजन में लगे रहो,
वो स्वार्थ भी एक दिन निर्मल प्रेम में बदल जाएगा।
🙋🏻♀️ प्रश्न 2: क्या भगवान को रिझाने से सब कुछ मिल जाता है?
उत्तर अनुसार महाराज जी कहते हैं:
आप पूछ रहे हैं कि भगवान को रिझाने से क्या नहीं मिलेगा? सब कुछ मिल जाएगा।
यदि अर्जुन को देखो — जूते जहां हैं, वहां ब्रह्म भी बैठे हैं। भगवान श्रीकृष्ण सारथी बनकर खड़े हैं।
प्रेमानन्द महाराज जी कहते हैं:
“भक्तों के चरणों में भी भगवान बिक जाते हैं।”
उन्हें प्रेम चाहिए, चापलूसी नहीं।
जो नाम जप करता है, जो प्रभु को पकड़ता है, उसी की सारी समस्याओं का अंत हो जाता है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 3: निष्काम भक्ति में मुक्ति की इच्छा रखना भी स्वार्थ है?
प्रेमानन्द महाराज जी उत्तर देते हैं:
नहीं। मोक्ष की इच्छा परमार्थ है, स्वार्थ नहीं। लेकिन निष्काम भक्त में कोई इच्छा नहीं रहती।
भगवान की सेवा, प्रेम और लीला में इतना रस है, कि मोक्ष भी उसे भयावह लगता है।
उदाहरणस्वरूप, भरत जी कहते हैं –
“ना अर्थ, ना धर्म, ना काम, ना मोक्ष… बस सियाराम के चरणों में प्रेम।”
निष्काम भक्ति में केवल प्रेम होता है।
प्रेमानन्द महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि मोक्ष से भी बड़ा है प्रभु प्रेम।
🙋🏻♀️ प्रश्न 4: सभी से प्रेम करें, पर ममता न करें – यह कैसे संभव?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि यह अभिनय का अभ्यास है।
जब व्यक्ति हर किसी में भगवान का दर्शन करता है, तो प्रेम तो करता है पर आसक्ति नहीं।
“पत्नी, पुत्र, शत्रु — सब में मेरे भगवान हैं।”
जब यह अभ्यास बन जाए, तब व्यक्ति किसी में फँसता नहीं, और उसका प्रेम निष्कलंक हो जाता है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 5: क्रोध पर कैसे नियंत्रण पाएँ?
प्रेमानन्द महाराज जी का समाधान:
नाम जप करो। भगवान जैसे कुम्हार मटकी बनाते हैं – पिटाई भी करते हैं, सुधार भी करते हैं।
“जहाँ ज़रूरत होगी पूजा करवा देंगे, और जहाँ ज़रूरत होगी पिटाई।”
नाम जप, सत्संग, और भगवान को अर्पित भोजन से बुद्धि शुद्ध होती है, और विकार नष्ट होते हैं।
🙋🏻♀️ प्रश्न 6: असली बॉस कौन है — संसार के अधिकारी या भगवान?
प्रेमानन्द महाराज जी उत्तर देते हैं:
हम असली बॉस के चक्कर में पड़े हैं। संसार के नकली बॉस तो चापलूसी से रिझ जाते हैं, लेकिन असली बॉस — भगवान — की चापलूसी नहीं चलती। वो शुद्ध सच्चिदानंदमय हैं। उन्हें रिझाने का उपाय है – नाम जप और निष्काम भक्ति।
जब भगवान कृपा करते हैं, तब संसार के सारे बॉस स्वतः अनुकूल हो जाते हैं।
मानव से कृपा चाहने वाले लोग धोखा खाते हैं क्योंकि मानव स्वार्थी होता है। लेकिन प्रेमानन्द महाराज बताते हैं कि भगवान एकमात्र ऐसे हैं जो गलती होने पर भी ठुकराते नहीं, हृदय से लगाए रखते हैं।
इसलिए, असली बॉस से बात करनी चाहिए – जो अखिल ब्रह्मांड नायक हैं।
🙋🏻♀️ प्रश्न 7: भगवान का पात्र बनने के लिए कितनी पीड़ा सहनी होती है?
प्रेमानन्द महाराज जी विस्तार से समझाते हैं:
जैसे मिट्टी को कुम्हार गूंथता है —
- खुदाई
- कुटाई
- कचराई
- चाक पर चढ़ाना
- और फिर आकृति देना
वैसे ही भगवान अपने पात्र को पीड़ा सहने के बाद दिव्य बनाते हैं।
“बुराई से पिटोगे तो मिट जाओगे,
अच्छाई से पिटोगे तो चमक जाओगे।”
🙋🏻♀️ प्रश्न 8: गुरु और ईष्ट का क्या योगदान है?
उत्तर अनुसार:
गुरु ही कुम्हार हैं, और शिष्य मिट्टी।
शिष्य बोले नहीं, गुरु जैसा चाहें वैसा बना देते हैं – मटका, कुल्हड़, कलश।
शरणागति का यही अर्थ है – “प्रभु जैसा चाहो वैसा बना लो।”
🙋🏻♀️ प्रश्न 9: प्रकट रूप में गुरु का सानिध्य कैसे अनुभव करें?
उत्तर:
नाम जप से।
महाराज जी कहते हैं –
“जैसे ही नाम जपते हो, गुरु-संत हृदय में उभरते हैं।”
नाम ही वो जीवंत पुल है, जो भौतिक दूरी को मिटाकर गुरु को हृदय में बैठा देता है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 10: प्रतिकूलता या अनुकूलता – कौन सहयोगी है?
प्रेमानन्द महाराज जी कहते हैं:
“अनुकूलता गिरा देती है,
प्रतिकूलता ऊपर उठाती है।”
जब कोई नहीं होता, तब मन भगवान की तरफ भागता है।
विपरीत परिस्थितियाँ ही भगवद प्रेम का बीज बोती हैं।
🙋🏻♀️ प्रश्न 11: मृत्यु का भय क्या सचमुच चला जाता है?
उत्तर:
नहीं।
“मृत्यु का भय हर किसी को होता है – चाहे कोई महात्मा ही क्यों न हो।”
जब तक शरीर का होश है, तब तक भय रहेगा।
महाराज जी कहते हैं –
“जो कहे मृत्यु से नहीं डरता, वो झूठा है।”
केवल वही भयमुक्त है जो पूर्ण रूप से भगवत्स्वरूप में लीन हो चुका है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 12: सेवा का अहंकार कैसे मिटे?
उत्तर:
हर सेवा को ‘कृष्णार्पणमस्तु’ कहकर समर्पित करो।
“जब सेवा समर्पित होती है, तब अहंकार दासत्व में बदल जाता है।”
प्रेमानन्द महाराज जी कहते हैं —
सेवा अहंकार नहीं, भक्ति का मार्ग होनी चाहिए।
🙋🏻♀️ प्रश्न 13: क्या गृहस्थ छोड़कर भक्ति में जाना चाहिए?
उत्तर:
नहीं।
“गृहस्थ में रहकर सिंह की तरह नाम जप करो।”
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि जब तक स्त्री, धन और कीर्ति का आकर्षण नहीं मिटता,
तब तक विरक्त होना विपत्ति है।
कमाओ, पालो, नाम जपो – यही श्रेष्ठ है।
🙋🏻♀️ प्रश्न 14: आत्म शांति की खोज – भौतिकता से कैसे अलग हों?
प्रेमानन्द महाराज जी उत्तर देते हैं:
“नाम जप सबका समाधान है।”
जैसे अच्छी दवा पर विश्वास हो, वैसा ही गुरु के वचनों पर विश्वास रखो।
नाम जप जीवन को बदल देता है।
जीवन की दौड़ में सफलता भी देगा और आत्म शांति भी।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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