माला-1042: गुरु तत्व का स्वरूप कैसा है?, श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के अमृत वचनों से

प्रश्न 6: गुरु तत्व का स्वरूप

प्रश्न: महाराज जी, गुरु तत्व क्या है?
उत्तर:गुरु तत्व का अर्थ प्रेमानंद महाराज जी की वाणी में यह है कि गुरु कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं ब्रह्म का जीवंत रूप हैं। गुरु ही जीव को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। कभी वे प्रेम से समझाते हैं, तो कभी प्रतिकूल परिस्थिति देकर अहंकार तोड़ते हैं। असली शरण वही है जहाँ मन, वाणी और कर्म से आज्ञा मानें। शुरुआत वाणी से हो सकती है—“हे प्रभु, मैं आपका हूँ।” धीरे-धीरे यह भाव हृदय और जीवन तक पहुँच जाता है। इसलिए महाराज जी कहते हैं—गुरु की शरण ही साधना और मुक्ति का सबसे सच्चा आधार है।


प्रश्न 2: शराब छोड़ने के बाद पाप का प्रश्न

प्रश्न: महाराज जी, मैंने 20 साल शराब पी, आपकी कृपा से छोड़ दी है। अब पाठ करता हूँ। क्या मेरे पाप कट जाएंगे?
उत्तर: गुरु जी समझाते हैं कि जैसे रुई का पहाड़ एक छोटी सी अग्नि से भस्म हो जाता है, वैसे ही नाम-जप और पाठ से पुराने पाप मिट जाते हैं। ध्यान कभी इधर-उधर भी जाए तो भी लाभ मिलेगा। भले ही मन न लगे, लेकिन नाम-जप का प्रभाव निश्चित होता है। इसलिए निरंतर जपते रहना चाहिए।


प्रश्न 3: गलती हो जाने पर क्या करें

प्रश्न: महाराज जी, कभी-कभी अनजाने में गलती हो जाती है और मन बहुत परेशान हो जाता है। ऐसे में क्या करें?
उत्तर: गुरु जी कहते हैं कि जब कोई गलती हो जाए, तो तुरंत भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए और नाम-जप करना चाहिए। बड़े-बड़े महापुरुषों से भी भूल हो जाती है। सच्चे भाव से प्रार्थना करके और यह नियम लेकर कि अब आगे गलती नहीं करेंगे, पाप क्षमा हो जाता है। यही सही मार्ग है।


प्रश्न 4: तन-मन-धन अर्पण की कठिनाई

प्रश्न: महाराज जी, हम कहते तो हैं कि तन-मन-धन सब आपका है, परंतु हृदय से ऐसा नहीं कर पाते। क्या करें?
उत्तर: महाराज जी बताते हैं कि शुरुआत वाणी से करनी चाहिए। जब वाणी से बार-बार बोलेंगे कि “हे प्रभु, मैं आपका हूँ”, तो यह भाव धीरे-धीरे हृदय में उतर जाएगा। फिर मन और शरीर भी उसी भाव में ढलने लगेंगे। निरंतर अभ्यास से तन-मन-धन सचमुच शरणागत हो जाते हैं।


प्रश्न 5: अहंकार और गुरु की कृपा

प्रश्न: महाराज जी, देहाभिमान और अहंकार मिटाने का क्या उपाय है?
उत्तर: गुरु जी कहते हैं कि गुरु कभी-कभी प्रतिकूल परिस्थितियाँ रचकर अहंकार को तोड़ते हैं और कभी ज्ञान देकर अज्ञान का नाश करते हैं। यदि साधक साधना में दृढ़ है तो वह इन परिस्थितियों को सहन कर लेता है। यह सब गुरु की कृपा है जो हमें शुद्ध बनाती है और शरणागति की ओर ले जाती है।


प्रश्न 6: वैभव और प्रसिद्धि की चाह

प्रश्न: महाराज जी, अगर संसार में वैभव, यश और प्रसिद्धि प्राप्त करनी हो तो कैसे करें?
उत्तर: प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि यश, मान और प्रसिद्धि जहर के समान हैं। ये दिखने में आकर्षक लगते हैं, लेकिन अंततः हमें नीचे गिराते हैं। लोकप्रिय होना सबसे खतरनाक है क्योंकि यह अहंकार को जन्म देता है। सच्चा वैभव केवल भगवान के नाम-जप में है। नाम जपते हुए यदि कीर्ति आती है तो वह पवित्र होती है और आत्मा को ऊँचा उठाती है।


प्रश्न 7: ठाकुर जी की मूर्ति में मोलभाव

प्रश्न: महाराज जी, ठाकुर जी का विग्रह लेते समय मोलभाव करना अपराध है क्या?
उत्तर: गुरु जी कहते हैं कि ठाकुर जी की मूर्ति को खरीदने का भाव नहीं रखना चाहिए। यह भगवान को घर लाने जैसा है। यदि मूल्य में थोड़ा बहुत अंतर हो तो यह अपराध नहीं, परंतु भाव न्योछावर का होना चाहिए। हमें यह मानना चाहिए कि हम भगवान को भेंट दे रहे हैं, व्यापार नहीं कर रहे।


प्रश्न 8: गुरु दर्शन में विलंब

प्रश्न: महाराज जी, एक शिष्य को गुरु के दर्शन में बहुत विलंब क्यों होता है?
उत्तर: गुरु जी कहते हैं कि गुरु प्रारब्ध से नहीं, बल्कि भगवान की कृपा से मिलते हैं। जब तक भगवान कृपा नहीं करते, तब तक सच्चे गुरु का दर्शन नहीं होता। इसलिए शिष्य को निरंतर भजन, नाम-जप और प्रार्थना करते रहना चाहिए। यही मार्ग है गुरु तक पहुँचने का।


प्रश्न 9: भक्ति की बैटरी क्यों डाउन हो जाती है

प्रश्न: महाराज जी, वृंदावन आने पर भक्ति की बैटरी चार्ज हो जाती है, पर बाहर जाकर डाउन क्यों हो जाती है?
उत्तर: गुरु जी बताते हैं कि जब तक देहाभिमान और त्रिगुणों का प्रभाव है, तब तक भक्ति स्थिर नहीं रहती। इसलिए साधना और नाम-जप से चित्त को शुद्ध करना आवश्यक है। धीरे-धीरे जब मन पवित्र होगा, तब भक्ति स्थायी और एकरस हो जाएगी।


प्रश्न 10: निरंतर नाम-जप का अभ्यास

प्रश्न: महाराज जी, कैसे करें कि नाम-जप निरंतर चलता रहे और भगवान का विस्मरण न हो?
उत्तर: गुरु जी कहते हैं कि शुरुआत वाचिक जप से करें। फिर उपांशु और अंततः मानसिक जप की ओर बढ़ें। सांसों के साथ नाम जोड़ दें—श्वास-प्रश्वास में “राधा-राधा”। इस अभ्यास से हर समय नाम चलता रहेगा और मन भगवान में स्थिर होगा।


प्रश्न 11: दुखों से मुक्ति का उपाय

प्रश्न: महाराज जी, मैं दुखों से हमेशा के लिए मुक्त होना चाहती हूँ, लेकिन नाम-जप में रुचि नहीं है। क्या करूँ?
उत्तर: गुरु जी कहते हैं कि संसार स्वभाव से दुखमय है। यहाँ कोई भी उपाय स्थायी सुख नहीं देता। केवल भगवान का नाम-जप ही दुखों से छुटकारा दिला सकता है। रुचि हो या न हो, नाम-जप करते रहना चाहिए। यही साधन हमें स्थायी शांति देता है।


प्रश्न 12: रिश्तों में लेन-देन का बंधन

प्रश्न: महाराज जी, रिश्तेदारों के साथ लेन-देन से अगले जन्म का बंधन बनता है क्या?
उत्तर: गुरु जी बताते हैं कि यदि हम रिश्तेदारों को भगवान का स्वरूप मानकर सेवा करें, तो यह लेन-देन कर्मबंधन नहीं बनेगा। यह भगवत-सेवा बन जाएगा। इसलिए हर रिश्ते में भगवान को देखकर व्यवहार करना चाहिए। तभी हम कर्मफलों से मुक्त होंगे।


प्रश्न 13: संसार माया है, इससे कैसे बचें

प्रश्न: महाराज जी, यह संसार माया है। इससे कैसे बचा जाए?
उत्तर: महाराज जी कहते हैं कि यह त्रिगुणमयी माया भगवान की ही शक्ति है। इससे पार होने का उपाय केवल भगवान की शरण है। नाम-जप, कथा और सत्संग से हम माया पर विजय पा सकते हैं। यदि हर जगह भगवान को देखें, तो माया भी उनकी लीला लगने लगेगी।


प्रश्न 14: नाम-जप में उत्साह और माया का प्रभाव

प्रश्न: महाराज जी, नाम-जप सुनकर उत्साह आता है, पर थोड़ी देर बाद माया खींच लेती है। क्या करें?
उत्तर: गुरु जी कहते हैं कि यही कारण है कि बार-बार सत्संग आवश्यक है। जब तक सत्संग से उत्साह दृढ़ नहीं होता, तब तक माया खींचती रहेगी। निरंतर अभ्यास और संगति से नाम-जप में स्थिरता आती है। जब स्वाद मिल जाएगा, तो कोई खींच नहीं पाएगा।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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