❖ गुरु बनाने की सही अवस्था क्या है?
महाराज जी बताते हैं कि गुरु दीक्षा में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। पहले स्वयं नाम जप करो, साधना करो। जब हृदय से भगवान की प्राप्ति की लालसा जगे, तब प्रभु से प्रार्थना करो कि हे प्रभु! आप ही मेरे गुरु से मिला दो। जब भीतर परमार्थ का उत्साह जागे, तभी सही गुरु अपने आप मिलते हैं। कोई भी केवल प्रभाव देखकर गुरु नहीं बनाना चाहिए।
❖ क्या संसार से अरुचि भक्ति का संकेत है?
यदि मन संसार में नहीं लगता और उदासी सी छाई रहती है, तो यह संकेत है कि भजन जाग्रत हो रहा है। पर इसके लिए आहार, विचार, आचरण, वाणी, दृष्टि—सबका शुद्ध होना आवश्यक है। जब तक यह सब शुद्ध नहीं होंगे, भजन में रुचि स्थिर नहीं हो पाएगी। भीतर अनासक्ति हो, पर बाहरी व्यवहार यथावत रहे।
❖ गुरु में भगवान का अनुभव क्यों होता है?
गुरु में जब भक्त को भगवान के दर्शन होने लगें, तब समझिए कि वह आत्मा सच्चे मार्ग पर है। जैसी सांसारिक चीज़ों में आसक्ति होती है, वैसी ही यदि गुरु में हो जाए—तो वही बंधन का कारण “मोक्ष” बन जाता है। संतों में ऐसी आसक्ति बहुत दुर्लभ होती है, पर जब हो जाए तो कल्याण सुनिश्चित है।
❖ नाम जप की “बैंक” का संचालन कौन करता है?
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि हम जो नाम जपते हैं, वह एक परंपरा से मिलता है—गुरु से, फिर उनके गुरु से, और अंत में वह “आचार्य” के अधीन होता है। वही आचार्य निर्णय करते हैं कि नाम का फल क्या होगा—मोक्ष, वैकुंठ या पुनर्जन्म। इसलिए यह सिस्टम अत्यंत दिव्य है।
❖ मनोयोग से हर क्रिया कैसे करें?
जब तक मन पवित्र नहीं होता, वह चंचल रहेगा। पवित्र मन ही एकाग्र हो सकता है। पवित्रता आती है—नाम जप से, सात्विक आहार से, पवित्र संग से। तब मन निष्पाप हो जाता है और हर क्रिया में मनोयोग आने लगता है। यही “योग” है—भगवान से जुड़ना।
❖ क्या उच्च स्थिति में माला की आवश्यकता नहीं रहती?
जो सिद्ध महापुरुष होते हैं, उनके लिए माला बाहरी साधन रह नहीं जाती। लेकिन एक साधक के लिए माला आवश्यक है। हमें पहले साधारण साधना करनी है—शुद्ध आचरण, संयम, और निरंतर नाम जप। जब देहाभिमान मिटे और जीवभाव समाप्त हो, तभी उच्च स्थिति प्राप्त होती है।
❖ मुक्ति क्या है और कैसे प्राप्त होती है?
मुक्ति का अर्थ है—तरंगों (कामनाओं, ममता, देहाभिमान) का शांत हो जाना। जब जीव का व्यक्तिगत अस्तित्व समाप्त हो जाए और वह ब्रह्म में विलीन हो जाए, वही मोक्ष है। इसे केवल गुरु कृपा और नाम जप से ही पाया जा सकता है। मोक्ष, भगवान का स्वरूप प्राप्त करना है।
❖ अनन्यता का वास्तविक अर्थ क्या है?
महाराज जी कहते हैं—जब तुम्हारी दृष्टि में केवल एक ही भगवान बस जाए, चाहे श्री राधा जी हों, राम जी हों या श्याम सुंदर—तब वह अनन्यता है। पहले एक नाम-रूप को पकड़ो, और डटकर भजन करो। जब दृष्टि में केवल भगवान दिखाई देने लगें, वही सच्चा अनन्य भाव है।
❖ क्या प्रभु से कुछ माँगना भक्ति में बाधा है?
नहीं। अगर हम शरणागत हैं, तो मांग भी उन्हीं से करें। जब स्थिति परिपक्व होगी, तब माँगने की आवश्यकता भी नहीं रहेगी। फिर सब बिना मांगे मिलने लगेगा। भक्ति का यह भी एक क्रम है। आज हम केवल भगवान से मांगते हैं, एक दिन आएगा जब केवल याद ही रहेगी।
❖ क्या नाम जप से नियति बदली जा सकती है?
हां। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं—”बदल सकता है, बदल सकता है!” अगर नियति नहीं बदल सकती, तो मोक्ष संभव नहीं होता। पर यह केवल गहन नाम जप से होता है। भजन इतना गहन हो कि प्रारब्ध के अंक मिट जाएं। राई समान भजन भी पर्वत समान पाप को हर सकता है।
❖ राधा जी के दर्शन के लिए क्या करना चाहिए?
राधा जी के दर्शन कोई तप से नहीं, केवल प्रेम से, भाव से, आर्तनाद से होते हैं। रो-रो कर पुकारना पड़ेगा—”हा किशोरी! कृपा करो।” नाम जप करो, राधा नाम जपते-जपते कृपा हो गई तो दर्शन भी होंगे। वरना ब्रह्मा, शिव, इंद्र के लिए भी यह दुर्लभ है।
❖ मन पर गुणों का प्रभाव कैसे समझें और जीतें?
जब मन शांत हो, भक्ति में रति हो—तब सतोगुण। जब लालसा, विकार, भोग की भावना हो—तब रजोगुण। और जब आलस्य, द्वेष, प्रमाद हो—तब तमोगुण।
पर इन सब पर विजय संभव है, यदि हर स्थिति में हम नाम जप करें।
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यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।
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