माला-1026: भगवत साक्षात्कार का रहस्य संत क्यों नहीं बताते?, श्री महाराज जी की अमृत वाणी से

❖ बुरे कर्मों का प्रायश्चित: नाम-जप या भोगना?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि नाम-जप से संचित और वर्तमान के पापों का प्रायश्चित संभव है, लेकिन प्रारब्ध कर्मों को भोगना ही पड़ेगा

“जो प्रारब्ध बन गया है – वह भोगना ही पड़ेगा, चाहे बड़े से बड़ा संत ही क्यों न हो।”

नाम-जप के बल से हमारी शुद्धि होती है, लेकिन प्रारब्ध – जो पहले से शरीर के साथ जुड़ा हुआ है – वह जीवन में भोगना अनिवार्य है। नाम-जप से हमें वह शक्ति मिलती है कि हम दुख को शांत भाव से सह सके

❖ प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण कर्मों की समझ

उत्तर:
तीन प्रकार के कर्म होते हैं:

  1. क्रियमाण: जो हम वर्तमान में कर रहे हैं (पाप या पुण्य)।
  2. संचित: करोड़ों जन्मों के संचित कर्मों का भंडार।
  3. प्रारब्ध: संचित से चयनित कर्म जो इस जन्म में भोगने को तय हुए हैं।

नाम-जप से हम क्रियमाण को सुधार सकते हैं, संचित को भस्म कर सकते हैं, लेकिन प्रारब्ध को सिर्फ भोगकर ही काटा जा सकता है।


❖ क्या जीवन में गुरु अनिवार्य हैं?

उत्तर:
“गुरु बिना ज्ञान नहीं हो सकता।”
महाराज जी कहते हैं कि एक सच्चा गुरु मिलना भगवान की कृपा से होता है। हमें भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें ऐसे संत से मिला दें जो हमें भगवत्प्राप्ति के मार्ग पर ले चले।


❖ सच्चे संत की पहचान कैसे करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि साधुता और साधु-भेष में अंतर है।

“साधु-भेष कोई भी धारण कर सकता है, लेकिन साधुता भगवान से मिलती है।”

सच्चा संत वही है जो भगवान के प्रेम में डूबा हो और जिसका व्यवहार निःस्वार्थ और निर्मल हो।


❖ हनुमान जी को प्रसन्न करने का सही मार्ग

उत्तर:
हनुमान जी को प्रसन्न करने का मार्ग राम नाम और रामचरित है।

“जय हनुमान बोलने से नहीं, जय सियाराम बोलने से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं।”

हनुमान जी रामकथा सुनने में आनंद लेते हैं, इसलिए उनकी प्रसन्नता का मार्ग भी राम नाम और रामकथा है।


❖ भगवत साक्षात्कार का रहस्य संत क्यों नहीं बताते?

उत्तर:
भगवत प्राप्ति लौकिक संपत्ति से भी अधिक गोपनीय होती है।
संत इसे प्रकट नहीं करते क्योंकि उसमें अहंकार का लेश भी नहीं होता

“जो संत भगवतप्राप्त होते हैं, वे सभी में भगवान को देखते हैं और नम्रता के साथ चुप रहते हैं।”


❖ संत की सहनशीलता और सामर्थ्य का चमत्कार

उत्तर:
जयदेव जी और तुलसीदास जी के प्रसंगों में दिखता है कि संत किसी भी प्रकार की दुष्टता का प्रत्युत्तर दया से देते हैं
उनकी शक्ति भजन और भक्ति से आती है, लेकिन वे उसे कभी दिखावे में प्रयोग नहीं करते


❖ अहंकार और “मैं” की वास्तविकता

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि “मैं” का कोई अस्तित्व नहीं।
हमारी हर वस्तु, शरीर, मन, बुद्धि भगवान द्वारा रचित है।

“जो ‘मैं’ करता है, वह अज्ञान से ग्रसित है। सच्चा अहंकार बस एक है – ‘मैं भगवान का दास हूं।’”


❖ क्या दुख, अमंगल घटनाएं भगवान की इच्छा होती हैं?

उत्तर:
नहीं। हमारे ही कर्म हमारे सुख-दुख का कारण हैं।

“भगवान किसी का अमंगल नहीं करते। हमारे द्वारा किए गए पाप ही दुख का कारण बनते हैं।”


❖ जन्मदिन: उत्सव या आत्मनिरीक्षण का दिन?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जन्मदिन शोक दिवस है।

“एक साल और कट गया जीवन से… हमें यह दिन आत्मनिरीक्षण, सेवा और नाम-जप में लगाना चाहिए।”


❖ मन में अपशब्द बोलना – क्या यह भी पाप है?

उत्तर:
हाँ। मन में किसी के प्रति द्वेष रखना भी पतन का कारण बनता है।

“जब मन में बुरे विचार आते हैं, तो वह मन को दूषित कर देते हैं।”


❖ झूठ बोलने की आदत कैसे छोड़े?

उत्तर:
झूठ बोलना कलियुग का प्रभाव है।
नाम-जप और सज्जनों का संग इसे दूर करने का उपाय है।

“आपके भीतर झूठ से घृणा हो रही है – यही शुभ लक्षण है।”


❖ क्या जीवन समाप्त करने की भावना भी भक्ति है?

उत्तर:
बिल्कुल नहीं। आत्महत्या महापाप है।

“भगवान में भरोसा रखकर संघर्ष करें। समस्याओं से भागना समाधान नहीं है।”


❖ क्या कोई ऐसा साधन है जिससे दुख झट से दूर हो जाएं?

उत्तर:
ऐसा कोई झटपट साधन नहीं।

“प्रारब्ध को भोगना ही पड़ेगा। लेकिन नाम-जप से मन आनंदित रहेगा, चाहे शरीर को कष्ट हो।”


❖ क्या संतों के पास जाने से काम सिद्ध हो जाता है?

उत्तर:
संतों का संग हमारे कर्मों को सुधारता है, परंतु सिद्धि हमारे ही पुण्य और भावना पर निर्भर है।

“प्रेमानंद से नहीं, तुम्हारे कर्म और श्रद्धा से काम बना।”

Credit:

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

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