माला-1024: श्री प्रेमानंद जी महाराज के अमृत वचनों से जीवन के जटिल प्रश्नों के सरल उत्तर

1. मृत्यु का विचार – डर या भक्ति का द्वार ?

श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि “मरना है” – यह वाक्य नकारात्मक नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई की याद है। मृत्यु का स्मरण व्यक्ति को नाम-जप, अच्छे कर्म और परोपकार की ओर प्रेरित करता है। जब कोई कहे “मैं मरना चाहता हूं”, तो वह पलायन नहीं, बल्कि वैराग्य की चेतना हो सकती है।

2. क्या मेरी शरणागति पूर्ण है ?

शरणागति तीन प्रकार की होती है – वचन, मन और तन से। श्री प्रेमानंद जी महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि जब तक तन, मन, वचन और स्वयं का समर्पण नहीं होता, तब तक पूर्ण शरणागति नहीं मानी जाती। केवल वाणी से “मैं आपकी शरण में हूं” कहना पर्याप्त नहीं, जीवन भी उसी अनुरूप हो

3. जब लोग आपके अच्छे व्यवहार का मूल्य न समझें

आप किसी को कितना भी सुख दें, लेकिन प्रत्युत्तर में वही व्यक्ति आपको दुख दे सकता है – यही संसार का स्वभाव है। श्री जी कहते हैं, “जो तुम्हें गाली दे, उसका भी मंगल सोचो।” अपना कर्तव्य निभाओ, बाक़ी सब भगवान पर छोड़ दो

4. तपोबल और अभिमान की पहचान

जब तपोबल आता है तो अहंकार भी छुपकर आता है। उसकी पहचान यह है कि दूसरों में दोष और अपने में गुण दिखने लगते हैं। श्री महाराज जी बताते हैं कि अगर विकार शांत हो रहे हैं, गाली मिलने पर भी शुभकामना होती है, तो समझो भजन परिपक्व हो रहा है

5. बीमारी से उबरे बच्चे के लिए चिंता और समाधान

महाराज जी कहते हैं – यह मृत्यु लोक है, सबकी मृत्यु निश्चित है। जब तक जीवन है, नाम जपो, परोपकार करो और निश्चिंत रहो। चिंता से कुछ नहीं बदलता; भजन से बल आता है

6. अच्छे के साथ बुरा क्यों होता है?

यदि अच्छा व्यक्ति दुख में है और बुरा व्यक्ति सुख में, तो कारण भूतकाल के कर्म हैं। श्री प्रेमानंद जी समझाते हैं कि आज का पुण्य भविष्य में फल देगा, जबकि आज का दुख पूर्व के पापों का परिणाम है।

7. भगवत-प्राप्ति की “ठसक” को कैसे बढ़ाएं?

“ठसक” यानी दृढ़ विश्वास कि अब प्रभु के अलावा कुछ नहीं चाहिए। महाराज जी कहते हैं, जितना नाम जपोगे, उतनी दिव्यता आएगी, दुर्वासनाएं मिटेंगी, संसार का आकर्षण छूटेगा।

8. नाम संकीर्तन: राधा नाम या महामंत्र?

श्री महाराज जी ने स्पष्ट किया – दोनों ही प्रभु के नाम हैं। जिसमें अधिक प्रीति हो, उसी का संकीर्तन करें। यदि बच्चे राधा नाम में रमते हैं, तो आप उनके अनुसार सामंजस्य बैठाइए

9. जब किसी प्रियजन की मृत्यु का भाव मन में आए

श्री प्रेमानंद जी महाराज जी बताते हैं कि जब किसी के जाने की घड़ी आती है, तो उसका संकेत भी हृदय में आता है। लेकिन यह भावना कारण नहीं, परिणाम है। हमें यह नहीं मानना चाहिए कि हमारे सोचने से कुछ हुआ।

10. कॉलेज में गलत संगति और अहंकारी की उपाधि

यदि सहपाठी लड़कियों की बातें अश्लील और विकृत हों, तो उनसे दूरी बनाए रखना ही धर्म है। अहंकारी कहने दो। धर्म और पवित्रता से बढ़कर कुछ नहीं।

11. जब मन कई देवी-देवताओं की ओर आकर्षित हो

श्री प्रेमानंद जी कहते हैं, “यह भक्ति है, प्रेम नहीं।” प्रेम एक ही प्रभु में होता है। अभी विविधता है, पर जब प्रेम आएगा, तब मन केवल एक नाम में रम जाएगा

12. जब परिवार भजन से टोकता है

पत्नी यदि भजन में बाधा डालती है, तो अभिनय करो। बाहर से सामान्य दिखो, भीतर नाम जपो। यही चातुरता है – संसार और साधना का संतुलन।

13. व्यापारी का धर्म और भक्ति का संतुलन

व्यापार में ईमानदारी आवश्यक है। धार्मिक व्यापार, उचित मुनाफा और शुद्ध व्यवहार – ये सब भगवान की पूजा बन सकते हैं। बेईमानी ही बाधा है, व्यापार नहीं।

14. क्या संतोष केवल परिवार की भलाई से है?

श्री महाराज जी कहते हैं – जब शरीर छूटे, तब देखो क्या करके जा रहे हो? परिवार का सुधार अच्छा है, लेकिन मुख्य साध्य नाम-जप और परोपकार है

15. कुसंस्कारों के बीच प्रेम की सम्भावना

मन में गलत विचार आना भीतर छिपे दोषों की सफाई है। घबराना नहीं चाहिए। नाम-जप करते रहो, प्रेम की अवस्था धीरे-धीरे आती है

16. संसारिक कर्म करते हुए प्रभु में लीन कैसे हों?

भजन कोई मूर्खता नहीं, बल्कि प्रवीणता लाता है। अभिनय से परिवार को प्रसन्न रखें और भीतर से नाम-जप करते रहें। यही श्रेष्ठ मार्ग है।

🙏 अंतिम वाक्य (Credit)

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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