1. शहरी जीवन की भागदौड़ में शांति कैसे संभव है?
उत्तर –
प्रेमानंद जी महाराज स्पष्ट करते हैं कि जीवन में शांति पाने का मार्ग केवल नाम-जप है। संसार की दौड़, तनाव, और भोग-विलास से बचा नहीं जा सकता, लेकिन उसके बीच में भी यदि पल-पल राधा राधा का स्मरण हो, तो मन में स्थिरता और प्रसन्नता बनी रहती है।
“यदि नाम जप करने लगूं तो सब बात ठीक हो जाए।”
संसार का विचार चलता रहे, लेकिन उसी समय नाम-जप भी चलता रहे — यही उपाय है। यही ध्यान, यही भजन, और यही शांति का मार्ग है।
2. प्रारब्ध का भोग कब पूर्ण होता है, यह कैसे समझें?
उत्तर –
प्रारब्ध तब तक बना रहता है जब तक शरीर है। जैसे ही शरीर समाप्त होता है, प्रारब्ध भी समाप्त हो जाता है।
“शरीर छूटा, प्रारब्ध खत्म। जब तक शरीर है, प्रारब्ध का भोग रहेगा।”
दुख-सुख का क्रम प्रारब्ध के अनुसार चलता है, और उसमें किसी को भी छूट नहीं है।
3. नकारात्मक पारिवारिक माहौल में नाम-जप कैसे करें?
उत्तर –
महाराज जी कहते हैं कि प्रतिकूलता में किया गया भजन अधिक फलदायी होता है। ऐसे वातावरण को पार कर लिया, तो जीवन के किसी भी मोड़ पर गिरने की संभावना नहीं रहती।
“नकारात्मक सोच और वातावरण — दोनों को भजन के बल से रौंदना होगा।”
अनुकूलता की प्रतीक्षा न करें, जो भी वर्तमान परिस्थिति है — उसी में भजन करना सीखो।
4. जब लोगों पर भरोसा नहीं होता तो क्या करें?
उत्तर –
महाराज जी समझाते हैं कि भरोसा केवल भगवान पर रखें। मनुष्य से परोपकार मिले तो स्वीकार करें, लेकिन अपेक्षा न करें।
“व्यक्ति का परोपकार कर दे, उस पर भरोसा ना करें। भरोसा भगवान का रखें।”
संसार में कपट, छल, और धोखा मिलेगा — इससे बचने का एकमात्र उपाय है: भगवान में पूर्ण विश्वास।
5. भजन में प्रतिस्पर्धा उचित है या ईर्ष्या?
उत्तर –
महाराज जी कहते हैं कि भजन में प्रतिस्पर्धा का स्थान नहीं है। जो अधिक भजन करता है, उसका सम्मान करें, ईर्ष्या नहीं।
“जो अधिक भजन करते हैं, उनके चरणों में प्रणाम करें। ईर्ष्या या अहंकार से भजन नहीं होता।”
भजन का मूल है दैन्यता, न कि प्रतिस्पर्धा।
6. गुरु जी को प्रसन्न रखने के लिए क्या करें?
उत्तर –
महाराज जी कहते हैं:
“गुरु कभी प्रतिकूल नहीं होते। जो प्रतिकूल दिखता है, वही हमारे उत्थान का मार्ग है।”
यदि गुरु कोई कटुता दिखाएं या जीवन में बाधाएं आएं — तो वह हमें अनासक्ति की ओर ले जाने के लिए होती हैं। गुरु की कृपा का स्वरूप प्रतिकूलता भी हो सकती है।
7. क्या भगवत प्राप्ति प्रयास से नहीं, समर्पण से होती है?
उत्तर –
हाँ, भगवत प्राप्ति समर्पण से ही होती है। नाम-जप, धर्म का पालन, पर उपकार — यही समर्पण का स्वरूप है।
“कह देना आसान है, पर निभाना कठिन। इस मार्ग में अहंकार बिल्कुल न हो।”
दैन्य, नम्रता और सावधानी — यही तीनों भगवत प्राप्ति की कुंजी हैं।
8. क्या प्रारब्ध को बदला जा सकता है?
उत्तर –
नहीं, प्रारब्ध को बदला नहीं जा सकता। उसे भोगना ही पड़ता है।
“राम जैसे पुत्र होकर भी दशरथ जी को पुत्र वियोग का शोक भोगना पड़ा।”
इसलिए, नए पाप कर्म न हों — इस हेतु नाम-जप और सदाचरण आवश्यक है।
9. निकुंज में ‘केलीकुंज’ जैसा कोई विभाग होगा?
उत्तर –
नहीं, वहां कोई भिन्नता नहीं रहती।
“निकुंज में सब एकरस होते हैं। वहां मैं-तू नहीं रहता।”
निकुंज प्रेम, आनंद और सच्चिदानंद की लीला है — वहाँ सब ‘एक’ हो जाते हैं।
10. क्या श्री जी के रूप का ध्यान करना ज़रूरी है?
उत्तर –
महाराज जी कहते हैं कि नाम में रूप समाया हुआ है। यदि हम राधा नाम का जप करें, तो श्री जी का स्वरूप स्वतः प्रकट होने लगता है।
“नाम में ही रूप समाया है। ध्यान में धीरे-धीरे श्री जी झलकने लगते हैं।”
इसलिए राधा नाम का ध्यान ही सर्वोत्तम साधना है।
11. कलियुग में सच्चे संत की पहचान कैसे करें?
उत्तर –
वास्तव में, सच्चे संत की पहचान भगवान ही कर सकते हैं। बाहरी लक्षणों से कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
“बाल, दाढ़ी, तिलक से साधुता नहीं आती। संत की पहचान उनके आंतरिक भाव से होती है।”
भगवान से प्रार्थना करें, वे स्वयं आपको सच्चे संत से मिलवा देंगे।
12. क्या संत वेश से पहचाने जाते हैं या स्थिति से?
उत्तर –
स्थिति से। वेश तो स्वांग भी हो सकता है।
“संत की पहचान उनकी स्थितप्रज्ञता, भगवान में आसक्ति, और प्रेम से होती है।”
वेश + स्थिति = उत्तम संत, लेकिन सिर्फ वेश से संत नहीं पहचाने जा सकते।
13. ब्रज क्या है? इसका वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर –
“ब्रज” का अर्थ है व्यापक। यह वही भूमि है जहाँ परमात्मा ने लीला की।
“ब्रज = 84 कोस भूमि, श्रीकृष्णमय, परमात्ममय।”
ब्रज में वास करना मानो श्रीकृष्ण की गोद में वास करना है।
Credit:
यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।
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