रोग रूपी भगवान और औषधि रूपी पूजा
प्रश्न: जब आपकी किडनी खराब हुई और आपने दवा लेने से मना किया, तब गुरुदेव ने क्या कहा?
उत्तर:
प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि गुरुदेव ने कहा – “रोग रूप से भगवान आए हैं, औषधि रूप से पूजा कीजिए।”
महाराज जी ने स्पष्ट किया कि यदि रोग भगवान के रूप में आया है, तो उसकी दवा भी भगवान के पूजन की एक विधि है। यह पूर्व जन्म की फसल है, जो इस जीवन में काटनी ही है। आज जो साधन-भजन हो रहा है, वह नई खेती है, जिसका फल भविष्य में मिलेगा।
क्या पति सेवा से भगवत प्राप्ति संभव है?
प्रश्न: मन, वचन और कर्म से पति की सेवा करें और उनमें भगवान की भावना रखें, तो क्या भगवत प्राप्ति संभव है?
उत्तर:
प्रेमानंद जी महाराज स्पष्ट करते हैं – केवल पति की आराधना से पति लोक मिलेगा, भगवत धाम नहीं।
भगवत प्राप्ति के लिए जरूरी है:
- पति में भगवान की भावना
- साथ ही निरंतर नाम जप
सहने से अशुभों का नाश कैसे होता है?
प्रश्न: दूसरों के उपकार के बाद भी यदि वे विरोध करें, तो क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं, सहन करना ही तप है।
- हमारे उपकार भगवान की प्रसन्नता के लिए हैं।
- जो दुख या अपमान मिल रहा है, वह हमारे अशुभ कर्मों को काट रहा है।
इसलिए मौन रहो, क्षमा करो, और परोपकार का स्वभाव मत छोड़ो।
क्या शिव-पार्वती और राधा नाम दोनों रख सकते हैं?
प्रश्न: राधा नाम का जप करते हुए शिव-पार्वती का विश्वास भी रखना चाहूं, तो?
उत्तर:
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं – “कोई समस्या नहीं। सब एक ही हैं।”
आप राधा नाम में रुचि कीजिए, धीरे-धीरे शिव-पार्वती की कृपा से राधा नाम में अनन्यता आ जाएगी।
नाम जप सबसे कठिन साधना क्यों है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं, “सबसे कठिन भजन नाम जप है।”
चार घंटे एक ही नाम पर मन टिकाना – साहसिक कार्य है। यही तो भक्ति की पराकाष्ठा है। पूजा, आरती तो सहज हैं, लेकिन एक ही नाम में स्थिर रहना – यही साधना है।
गुरु की आज्ञा और समाज का विरोध
प्रश्न: यदि गुरु की आज्ञा हो लेकिन समाज और परिवार विरोध करें, तो क्या करें?
उत्तर:
गुरु की आज्ञा सर्वोपरि है, लेकिन एक बार फिर गुरु चरणों में निवेदन अवश्य करें – कि समाज और परिवार विरोध कर रहे हैं, क्या मैं आगे बढ़ूं?
संवाद बनाए रखें, स्थिति के अनुसार निर्णय लें।
भक्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है?
उत्तर:
तदर्पिता अखिलाचारिता तस्मरण परम व्याकुलते – यही है शुद्ध भक्ति।
- सभी कर्म भगवान को अर्पित हो
- हर क्षण स्मरण हो
- और यदि स्मरण छूट जाए तो मन व्याकुल हो उठे
मछली जल के बिना जैसे तड़पे, वैसा ही भक्त का भाव हो।
क्या राधा-कृष्ण से शिव भक्ति मिल सकती है?
उत्तर:
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं – “दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।”
- यदि हरि से शिव भक्ति मांगो, तो वो देंगे।
- और यदि शिव से हरि भक्ति मांगो, तो वो भी देंगे।
एक की कृपा से दूसरा अवश्य प्राप्त होता है।
गुरु से संवाद कैसे करें जब वे प्रत्यक्ष न हों?
उत्तर:
गुरु हमारे हृदय में ही हैं।
- जैसे मां से हम कुछ नहीं छुपा सकते, वैसे ही हृदय की बात गुरु तक स्वतः पहुँचती है।
- लेकिन फिर भी, प्रकट गुरु का होना आवश्यक है, क्योंकि वे जीव के दोषों की पहचान कर मार्गदर्शन देते हैं।
विद्यार्थियों को अध्यात्म से कैसे जोड़ें?
उत्तर:
- मित्रवत व्यवहार करें
- उन्हें समझाएं कि आधुनिक शिक्षा के साथ आध्यात्मिक शिक्षा जरूरी है
- ब्रह्मचर्य, शील, विनय, संयम – ये विषय अध्यात्म से ही मिलते हैं
शुद्ध जीवन ही महानता की ओर ले जाता है।
घर-गृहस्थी और नाम जप साथ कैसे चले?
उत्तर:
महाराज जी गोपियों का उदाहरण देते हैं:
- वे घर-परिवार के कार्य करते हुए भी नाम में मग्न रहती थीं
- सेवा भी करतीं, पर मन कृष्ण में स्थित रहता था
संसारिक क्रिया और भगवत स्थिति – यही गोपी भाव है।
आत्मविश्वास कैसे आए? असफलता में क्या करें?
उत्तर:
- आत्मविश्वास तब आता है जब हृदय पवित्र हो – नाम जप, तीर्थ सेवा, परोपकार से
- असफलता भक्ति को पुष्ट करती है, और सफलता अहंकार को
भगवान ही सच्चे सहयोगी हैं। लोग स्वार्थ से जुड़े होते हैं।
प्रमाद, आलस्य और पूर्वनिर्धारित भाग्य का समाधान
उत्तर:
सब कुछ पूर्व निर्धारित नहीं होता।
- प्रारब्ध = सुख-दुख
- लेकिन भजन, पुरुषार्थ – हमारे हाथ में है
- मनुष्य जन्म कर्म परिवर्तन के लिए मिला है
भाग्य के भरोसे न बैठें, नाम जप ही सब संकटों का समाधान है।
Credit:
यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।
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