🕉️ 1. क्या हमारे सभी कर्म पूर्व निर्धारित हैं?
प्रेमानंद जी महाराज स्पष्ट करते हैं कि हमारे सभी कर्म पूर्व निर्धारित नहीं होते। केवल पाप और पुण्य के फल, जिन्हें प्रारब्ध कहते हैं, वे निश्चित हो सकते हैं, लेकिन आज हम क्या सोचेंगे, क्या बोलेंगे, क्या करेंगे — यह पूरी तरह हमारे ही हाथ में है। जैसी संगति होगी, वैसी ही बुद्धि बनेगी, वैसे ही हमारे कर्म होंगे। यदि सत्संग करेंगे, शास्त्र पढ़ेंगे और नाम जपेंगे तो बुद्धि निर्मल बनेगी और हम शुभ कर्मों की ओर बढ़ेंगे। इसलिए कर्म करना हमारी स्वतंत्रता है, लेकिन उसका फल प्रारब्ध के अनुसार ही मिलेगा।
🕉️ 2. भजन-कीर्तन या भक्त सेवा – श्रेष्ठ क्या है?
महाराज जी कहते हैं कि दोनों अनिवार्य हैं।
जब अंदर राधा राधा का जप चल रहा हो और बाहर भक्त सेवा हो रही हो, तो यही श्रेष्ठ मार्ग है।
“भजन करते हुए भक्त सेवा करो। यही पूर्ण साधना है।”
🕉️ 3. धन की इच्छा है, पर भोगों में रुचि नहीं – क्यों?
यह नाम जप का प्रभाव है।
महाराज जी बताते हैं कि जब भोगों से मन हटता है, पर धन की इच्छा रहती है, तो वास्तव में भोग की जड़ अभी शेष है।
“रुपया भोगों के लिए ही प्रिय लगता है। इसलिए नाम जप से ही यह आसक्ति भी मिटेगी।”
🕉️ 4. नियमों के अनुसार कार्य करने पर लोग दुखी होते हैं – क्या करें?
यदि आप विधायक हैं और नियमों के अनुसार कार्य करते हैं, तो किसी के दुखी होने पर आप दोषी नहीं हैं।
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं:
“आपके धर्म से विचलित करने वाला ही दोषी है। आप धर्म मार्ग पर अडिग रहें।”
🕉️ 5. आत्मविश्वास की कमी से भक्ति नहीं हो पा रही – उपाय?
भगवत प्राप्ति बिना भजन संभव नहीं।
जैसे गंगा स्नान के लिए गंगा जाना पड़ता है, वैसे ही प्रभु की प्राप्ति के लिए नाम जप, सेवा, कथा श्रवण अनिवार्य हैं।
“ऐसे कैसे हो जाएगा? यात्रा करनी पड़ेगी, प्रयास करना होगा।”
🕉️ 6. भजन में निरंतरता नहीं आती – क्या करें?
महाराज जी सलाह देते हैं:
- खानपान पवित्र रखें
- एकांत में रहें
- ज़्यादा बातें न करें
- जबान से नाम जप प्रारंभ करें
“मन निर्मल होगा, तो भजन में निरंतरता आएगी।”
🕉️ 7. कृपा का अनुभव कैसे होता है?
नाम जप की शुरुआत, उसमें रुचि, और साक्षात्कार — ये सब कृपा से ही होते हैं।
भगवान बिना कारण के भी कृपा करते हैं।
“बिना राधा कृपा के कोई ‘राधा’ नहीं बोल सकता।”
🕉️ 8. डर को कैसे दूर करें और ईश्वर पर विश्वास कैसे रखें?
प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि नाम जप ही डर को समाप्त करता है। जब भगवान का बल भीतर जाग्रत होता है, तब कोई भय नहीं रहता।
हमारे गलत आचरण ही हमारे भय का कारण बनते हैं। यदि मन और कर्म शुद्ध हो जाएं तो विरोधी सामने हो, तब भी भय नहीं होता।
“जब भगवान का बल जागृत हो जाता है, तो जीव निर्भय हो जाता है।”
🕉️ 9. क्या आत्मा मलिन हो सकती है?
नहीं।
मन और अंतःकरण मलिन होते हैं, आत्मा नहीं।
“आत्मा सदा निर्मल है। गंदा आचरण मन को मलिन करता है।”
🕉️ 10. पुरुषार्थ के बाद भी असफलता – कारण क्या?
यदि बार-बार प्रयास के बावजूद फल नहीं मिले, तो समझें कि प्रारब्ध बाधा डाल रहा है।
जैसे विद्यानंद जी के 23 पुरचरण के बाद भी फल नहीं मिला, पर अंततः मिला।
“भजन व्यर्थ नहीं जाता। पाप क्षीण हो रहे हैं। सफलता अवश्य आएगी।”
🕉️ 11. पीड़ा में भी आनंद से जीवन – कैसे संभव?
श्री प्रेमानंद प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं:
“तपोबल नहीं, भगवान का आश्रय बल है।”
उनकी कृपा से ही शरीर पीड़ा में भी आनंद आता है।
🕉️ 12. क्या सांसारिक सुख और आध्यात्मिक शांति साथ-साथ संभव है?
जैसे गाल फुलाकर हंसी नहीं आ सकती, वैसे ही भोग और भक्ति एक साथ नहीं हो सकते।
“निर्विषयी इंद्रियां ही अध्यात्म का अनुभव करती हैं।”
🕉️ 13. अंतिम समय में नाम न सुना पाने का पछतावा – समाधान?
यदि किसी को अंतिम समय में राधा राधा नहीं सुना पाए, तो भगवान की योजना समझिए।
“उसका कल्याण नहीं होना था, इसलिए भगवान ने अवसर नहीं दिया।”
🕉️ 14. क्या मैं गुरुजी से पहले निकुंज पहुंच सकता हूँ?
ऐसी इच्छा सैकड़ों की होती है। लेकिन यह श्री जी की योजना से ही संभव है।
“हमारे बस की बात नहीं। श्री जी की कृपा से ही सब होगा।”
🕉️ 15. निंदा क्या है? दोष दर्शन और श्रवण का प्रभाव
निंदा = दूसरों के दोषों का वर्णन करना।
निंदा, कथन और श्रवण — तीनों महापाप हैं।
“भक्तों की निंदा से जन्मों का पुण्य एक क्षण में नष्ट हो जाता है।”
🕉️ 16. श्रीराम-कृष्ण के श्याम वर्ण का वास्तविक अर्थ
भगवान के श्रीअंग की श्यामता प्रकृति में है ही नहीं।
जो भी उपमा दी जाती है — घनश्याम, मोरकंठ, नीलमणि — वे केवल संकेत हैं।
“भगवान अनुपमेय हैं। उनके रंग, रूप, माधुर्य का कोई तुल्य नहीं।”
🙏 Credit:
यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।
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