1️⃣ प्रश्न: गुरु की अंग सेवा की इच्छा — स्वार्थ या विशुद्ध प्रीति?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि संसार की प्रीति और गुरु-इष्ट की प्रीति में अंतर है। संसार में जो प्रेम है, उसमें राग, आसक्ति और स्वार्थ मिला होता है। लेकिन गुरु और इष्ट के प्रति जो भाव है, वह परमार्थ स्वरूप है। यदि मन में यह इच्छा उठे कि “काश मुझे गुरुदेव की सेवा मिले, मैं उनके चरण धोऊँ, उनके लिए भोजन बनाऊँ, उनकी जूठन पाऊँ” — तो यह स्वार्थ नहीं, यह विशुद्ध प्रीति है।
गुरु और इष्ट परमार्थ स्वरूप हैं। उनसे कुछ माँगना भी स्वार्थ नहीं, यदि वह प्रसाद भाव से हो। संसार में मांगना स्वार्थ है, पर गुरु में मांगना आत्म समर्पण का भाव है। इसलिए सेवा की चाह रखना दोष नहीं, यदि उसमें अधिकार भाव नहीं, केवल दासत्व हो।
2️⃣ प्रश्न: स्वप्न में गुरु आज्ञा दें तो क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी बहुत स्पष्ट मार्गदर्शन देते हैं। यदि स्वप्न में गुरुदेव दिखाई दें और कोई आज्ञा दें, तो तुरंत उसे अंतिम सत्य न मानें। पहले प्रगट गुरुदेव से निवेदन करें। यदि वे पुष्टि करें कि “हाँ, ऐसा करो” तो मान लें। यदि वे कहें कि “नहीं” तो समझें कि वह मन की चाल थी।
मन बहुत चतुर है। वह गुरु का रूप धारण करके भी भ्रम दे सकता है। इसलिए विवेक आवश्यक है। गुरु की आज्ञा का आधार जाग्रत पुष्टि होना चाहिए।
यह सावधानी साधक को भ्रम से बचाती है। गुरु का आश्रय मतलब मन की कल्पना नहीं, बल्कि प्रगट मार्गदर्शन में चलना।
3️⃣ प्रश्न: ईश्वर स्मरण में गुरु की छवि आए तो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — यह तो भगवान की विशुद्ध कृपा है। शास्त्रों में कहा गया है — “ध्यान मूलम गुरु मूर्ति, पूजा मूलम गुरु पदम्।” गुरु और इष्ट अलग नहीं हैं।
यदि भगवान का स्मरण करते समय गुरु का ध्यान आए, तो समझो साधना सही दिशा में है। गुरु ही इष्ट हैं, इष्ट ही गुरु हैं।
भक्त, भक्ति, भगवंत और गुरु — कहने को चार हैं, पर तत्व एक है।
इसलिए गुरु का स्मरण भगवान का स्मरण है। इसमें भ्रम की कोई बात नहीं। यह मंगलमय स्थिति है।
4️⃣ प्रश्न: गुरु में इष्ट भावना कैसे करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — भावना करनी नहीं, माननी पड़ती है। जैसे हम पत्थर की मूर्ति में भगवान की भावना कर लेते हैं, तो चैतन्य सदगुरु में क्यों नहीं?
शास्त्रों ने कहा — “गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु…”। हमें श्रद्धा से मानना पड़ेगा कि गुरुदेव भगवान स्वरूप हैं।
जब हम उनके आसन का सम्मान करेंगे, उनके वचनों का पालन करेंगे, उनके दिए मंत्र का जप करेंगे — भावना पुष्ट होगी।
पहले श्रद्धा से मानो, फिर अनुभव अपने आप आएगा।
5️⃣ प्रश्न: सच्चे गुरु मिलने पर क्या अनुभव होता है?
उत्तर (महाराज जी के भाव अनुसार):
महाराज जी बताते हैं कि सच्चे गुरु का मिलना कोई बाहरी घटना नहीं, यह भीतर की क्रांति है। गुरु को पहचानने के लिए चमत्कार नहीं, हृदय की दशा देखो। जिनके दर्शन से मन शांत हो जाए, जिनके समीप बैठते ही भीतर की अशांति ढीली पड़ने लगे, जिनकी वाणी सुनकर जीवन की दिशा बदलने लगे — समझो गुरु मिल गए।
सच्चे गुरु मिलने पर यह अनुभव होता है कि जैसे अब तक भटक रहा था, अब मार्ग मिल गया। मन में एक अदृश्य भरोसा आता है — “अब मैं अकेला नहीं हूँ।” गुरु के पास बैठकर संसार की बातें फीकी लगने लगती हैं और भगवत चर्चा मधुर लगने लगती है।
महाराज जी कहते हैं — जब गलत आदतें छूटने लगें, भजन में रुचि बढ़ने लगे, और भीतर से यह भाव उठे कि “इनके चरणों से हटना नहीं है” — वही सच्चा संकेत है।
सच्चे गुरु मिलने पर हृदय में विनम्रता आती है, जिद घटती है, और जीवन में एक नई गंभीरता आती है। यह अनुभव शब्दों से नहीं, भीतर की शांति और परिवर्तन से पहचाना जाता है।
यही गुरु कृपा का आरंभिक स्पर्श है। 🙏
6️⃣ प्रश्न: गुरु चरणों की सेवा — कृपा से मिलती है या कर्म से?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि गुरु की अंग-संग सेवा साधारण उपलब्धि नहीं है। यह न केवल कर्म से मिलती है, न केवल प्रयास से। यह मुख्यतः कृपा का विषय है। संसार में बहुत लोग साधु संग में आते हैं, दर्शन करते हैं, भजन भी करते हैं, लेकिन हर किसी को निकट सेवा का अवसर नहीं मिलता।
सेवा तभी मिलती है जब गुरु हृदय से द्रवित होते हैं। जब वे देखते हैं कि यह जीव केवल बाहरी सम्मान नहीं चाहता, बल्कि वास्तव में दासत्व चाहता है, तब कृपा प्रकट होती है।
हाँ, पुरुषार्थ व्यर्थ नहीं है। श्रद्धा, विनम्रता, आज्ञा पालन — ये सब सेवा के पात्र बनाते हैं। पर अंतिम निर्णय कृपा का ही है। इसलिए सेवा को अधिकार नहीं, सौभाग्य समझना चाहिए।
7️⃣ प्रश्न: गुरु प्रदत्त ऐश्वर्य और सम्मान को कैसे संभालें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — ऐश्वर्य संभालने का एक ही उपाय है — दासत्व भाव। यदि गुरु ने किसी को प्रतिष्ठा, साधन, वैभव दिया है, तो वह उसकी परीक्षा भी है।
जिस क्षण “मैं” का भाव आ गया कि “यह मेरा है”, उसी क्षण पतन प्रारंभ हो जाता है। इसलिए समझो — सब गुरुदेव का है, मैं केवल मुनीम हूँ। जैसे मुनीम लाखों की गिनती करता है पर मालिक नहीं बनता, वैसे ही व्यवहार करो।
यदि संपत्ति, सम्मान या प्रभाव को सेवा का साधन बना लिया, तो वह कल्याणकारी है। यदि उससे अहंकार बढ़ा, तो वही बंधन बन जाएगा।
इसलिए भीतर से सदा यही भाव रहे — “मैं सेवक हूँ, स्वामी नहीं।” यही सुरक्षा है।
8️⃣ प्रश्न: शिष्य की ओर से गुरु को सबसे बड़ी भेंट क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — गुरु को धन, वस्त्र, पुष्प, माला देने से बड़ी भेंट है — मन की भेंट। तन पास हो और मन संसार में दौड़ रहा हो, तो सेवा अधूरी है।
गुरु को प्रसन्न करना है तो उनकी आज्ञा में चलो। जो मंत्र दिया, उसका जप करो। जो मर्यादा दी, उसे निभाओ।
सबसे बड़ी भेंट है — अपना अहंकार छोड़ देना। “मैं जानता हूँ”, “मैं समझता हूँ” — यह भाव हट जाए।
जब शिष्य कोरा कागज बन जाता है और कहता है — “गुरुदेव, जैसा चाहें वैसा बना लें” — वही सच्ची भेंट है।
मन का समर्पण ही गुरु चरणों में सर्वोच्च अर्पण है।
9️⃣ प्रश्न: सच्चा शिष्य बनने की योग्यता कैसे आती है? समर्पण कम क्यों हो जाता है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — सच्चा शिष्य वही है जो भीतर से झुक जाए। बाहरी नमस्कार से कुछ नहीं होता। जब तक मन की जिद, अपनी बुद्धि का अभिमान और अपनी धारणाएँ नहीं छूटतीं, तब तक शिष्यत्व पूर्ण नहीं।
समर्पण प्रारंभ में प्रबल रहता है, क्योंकि तब भाव नया होता है। धीरे-धीरे संसार का आकर्षण खींचने लगता है, और समर्पण ढीला पड़ जाता है।
इसलिए समर्पण को नित्य पुष्ट करना पड़ता है। गुरु स्मरण, नाम जप और आत्म परीक्षण आवश्यक है।
गुरु कुम्हार हैं, शिष्य मिट्टी। यदि मिट्टी कठोर हो गई, तो आकार नहीं ले पाएगी। कोमलता और विनम्रता ही शिष्य की पात्रता है।
🔟 प्रश्न: बिना औपचारिक दीक्षा भक्ति कैसे बढ़े?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — दीक्षा केवल बाहरी संस्कार नहीं, भीतर की स्वीकृति है। यदि किसी ने हृदय से किसी संत को गुरु मान लिया, उनकी वाणी को जीवन में उतार लिया, तो भक्ति प्रारंभ हो गई।
हाँ, औपचारिक दीक्षा का अपना महत्व है, पर भक्ति का आरंभ श्रद्धा से होता है।
यदि व्यक्ति नियमपूर्वक नाम जप करे, संत वचन सुने, जीवन में पवित्रता लाए — तो भक्ति विकसित होगी।
मुख्य बात है — हृदय की सच्चाई। दिखावा नहीं, भीतर का झुकाव।
1️⃣1️⃣ प्रश्न: गुरु के प्रति विरह की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — गुरु प्रेम इष्ट प्रेम के समान है। जब गुरु सामने न हों, तो हृदय में रिक्तता अनुभव होती है। स्मरण आते ही आँखें भर आती हैं।
यह रोना कमजोरी नहीं, प्रेम का लक्षण है। एकांत में गुरु को याद करना, उनसे मन ही मन बातें करना, उनसे प्रार्थना करना — यही विरह की अवस्था है।
गुरु की कृपा से ही नाम मिला, भक्ति मिली, जीवन की दिशा मिली — यह भाव जितना गहरा होता है, विरह उतना मधुर होता है।
विरह में भी आनंद है, क्योंकि उसमें भी स्मरण है।
1️⃣2️⃣ प्रश्न: गुरु की व्यक्तिगत आज्ञा कब मिलती है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं — व्यक्तिगत आज्ञा कोई साधारण बात नहीं। यह विशेष कृपा का संकेत है। जब गुरु देखते हैं कि यह शिष्य आज्ञा पालन के योग्य है, तब वे विशिष्ट निर्देश देते हैं।
कभी डाँट के रूप में, कभी आदेश के रूप में, कभी संकेत के रूप में — सब कृपा है।
जिसे गुरु शासन करते हैं, उसे अपना मानते हैं।
इसलिए आज्ञा मिलना सौभाग्य है। पर उसका पालन करना और भी बड़ा सौभाग्य है।
1️⃣3️⃣ प्रश्न: गुरु मिलना प्रारब्ध से होता है या कृपा से?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — गुरु मिलना कृपा से होता है। “बिनु हरि कृपा मिलहिं न संता।”
हाँ, पूर्व पुण्य सहायक हो सकते हैं, पर अंतिम कारण भगवान की कृपा है।
संत संग दुर्लभ है। करोड़ों जीव संसार में घूम रहे हैं, पर सबको सत्संग नहीं मिलता।
जब ईश्वर जीव पर प्रसन्न होते हैं, तब उसे संतों का संग देते हैं।
इसलिए गुरु मिलना जीवन की सबसे बड़ी कृपा है।
1️⃣4️⃣ प्रश्न: मन को जीतने में केवल गुरु कृपा पर्याप्त है या पुरुषार्थ भी चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी संतुलित उत्तर देते हैं — दोनों आवश्यक हैं। गुरु आश्रय डोरी है, पर चढ़ना स्वयं पड़ेगा।
यदि केवल कृपा का नाम लेकर आलस्य करोगे, तो उन्नति नहीं होगी। और यदि केवल पुरुषार्थ करोगे, गुरु आश्रय नहीं लोगे, तो अहंकार बढ़ेगा।
इसलिए साधक को परिश्रम भी करना है — नाम जप, साधना, आत्म परीक्षण। साथ ही गुरु चरणों का आश्रय बनाए रखना है।
कृपा और पुरुषार्थ जब साथ चलते हैं, तभी मन पर विजय संभव होती है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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