माला-1190:मन पूर्ण समर्पण से क्यों डरता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1:

महाराज जी, जब आप नौजवान अवस्था में साधना कर रहे थे, तब आपकी सुबह से शाम तक की दिनचर्या क्या थी?

उत्तर (महाराज जी की वाणी के अनुसार)

देखो, उस समय जीवन बिल्कुल साधना प्रधान था। क्रिया प्रधान नहीं, चिंतन प्रधान। रात्रि के लगभग 1 बजे उठना होता था। 1 बजे से 4 बजे तक केवल भगवत चिंतन। कोई इधर-उधर की बात नहीं, कोई बाहरी व्यस्तता नहीं — केवल नाम, मंत्र और आत्म चिंतन।

4 बजे गंगा स्नान। गंगा जी के किनारे ही जीवन बीता। दिन में पुनः स्नान, फिर शाम को भी स्नान। बाहरी शुद्धि के साथ-साथ अंदर की शुद्धि का भी प्रयास। लेकिन मुख्य बात यह थी कि ध्यान बाहरी नियमों पर नहीं, बल्कि इस बात पर था कि भगवत चिंतन कभी छूटे नहीं

उस समय किसी घर में जाकर भोजन नहीं किया। आकाश वृत्ति से जो मिल गया, उसी से शरीर का भरण-पोषण। कई बार भरपेट भोजन नहीं मिला तो गंगाजल पीकर ही संतोष। गंगा ही माता-पिता, मित्र, सब कुछ थीं। जीवन का आधार ही गंगा जी का तट था। बनारस के घाटों पर वर्षों रहे। तुलसी घाट से लेकर दशाश्वमेध तक वही जीवन बीता।

गांवों में प्रवेश नहीं किया। वृक्ष के नीचे, मंदिर में, आश्रम में रात्रि व्यतीत कर ली। कोई स्थायी निवास नहीं। मन को बांधने का एक ही सूत्र था — भगवान का नाम

महाराज जी कहते हैं कि उनकी साधना क्रिया प्रधान नहीं थी। आंतरिक चिंतन प्रधान थी। योग वशिष्ठ, वेदांत, संत वाणी — ये सब साथ रहते थे, लेकिन केवल पढ़ना नहीं, भीतर उतारना था।

और एक बहुत महत्वपूर्ण बात — प्रकृति के प्रति संवेदना। उस समय गंगाजल अमृत समान था। आज की स्थिति देखकर मन व्यथित होता है। जिन नदियों को हम मां कहते हैं, उनमें गंदगी डालते हैं। यह साधक के हृदय को भीतर से पीड़ा देता है।

सार यह है कि जीवन का मूल सूत्र था —
भगवत चिंतन कभी न छूटे।
भोजन मिले या न मिले, स्थान मिले या न मिले, सम्मान मिले या न मिले —
लेकिन नाम न छूटे।

यही यौवन अवस्था की साधना थी — एकांत, वैराग्य, नाम और गंगा तट।


प्रश्न 2:

महाराज जी, मन पूर्ण समर्पण से क्यों डरता है? वह सभी विकल्प खुले क्यों रखना चाहता है?

उत्तर (महाराज जी के अनुसार)

मन का स्वभाव ही विषयों की ओर भागना है। जैसे जल को छोड़ दो तो वह नीचे की ओर बहता है। यदि उसे ऊपर चढ़ाना है, तो यंत्र चाहिए। वैसे ही मन को भगवान की ओर उठाने के लिए मंत्र और नाम-जप की आवश्यकता है।

मन भोगों में आनंद खोजता है। वह मानता है कि भोग से शांति मिलेगी। लेकिन सच्चाई यह है कि भोग केवल अस्थायी सुख देते हैं, फिर वही अशांति। मन कपटी भी है। बाहर से कहेगा — “मैं समर्पित हूँ”, लेकिन भीतर से अवसर मिलते ही विषयों की ओर भाग जाएगा।

भगवत प्राप्ति कठिन इसलिए लगती है कि मन को विषयों से हटाने में जो व्यथा होती है, उसे हम सह नहीं पाते। मन बार-बार खींचता है। और जब साधक थोड़ी सी जलन से डर जाता है, तो भोगों में कूद पड़ता है।

महाराज जी स्पष्ट कहते हैं —
भोगों से शांति नहीं मिलती।
त्याग और नाम-जप से शांति मिलती है।

मन पहले विषय का चिंतन करता है, फिर संग बनता है, फिर काम उत्पन्न होता है, फिर क्रोध, फिर मोह — और पतन शुरू।

इसलिए उपाय क्या है?
सत्संग, कुसंग का त्याग और निरंतर नाम-जप।

महाराज जी उदाहरण देते हैं — एक दृश्य भी साधक को गिरा सकता है। अजामिल जैसा धर्मनिष्ठ व्यक्ति एक दृश्य से पतित हो गया। इसलिए सावधानी आवश्यक है।
जो देखना नहीं चाहिए, मत देखो।
जो सुनना नहीं चाहिए, मत सुनो।
जो वृत्ति भीतर उठती है, उसका आदर मत करो।

मन को पहरा चाहिए। और वह पहरा है — नाम
“नाम पहरू दिवस निश” — दिन-रात नाम का पहरा हो।

समर्पण इसलिए कठिन लगता है क्योंकि मन सब विकल्प खुले रखना चाहता है। लेकिन जो सब विकल्प छोड़कर केवल भगवान को चुनता है, वही मुक्त होता है।


प्रश्न 3:

आत्मा का अनुभव होने पर भी अहंकार और कर्तापन क्यों उभर आते हैं?

उत्तर (महाराज जी के अनुसार)

महाराज जी बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं —
जैसे स्वप्न देखकर जब हम जाग जाते हैं, तो स्वप्न का अस्तित्व रह जाता है, लेकिन वह हमें प्रभावित नहीं करता।
वैसे ही आत्मबोध होने पर भी कुछ संस्कार शेष रह सकते हैं। वह स्वप्नवत हैं।

यदि आप जान गए कि मैं स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से अलग हूँ — तो फिर अहंकार का उठना भी एक स्वप्निक स्पंदन है। धीरे-धीरे वह मिट जाएगा।

लेकिन सावधानी आवश्यक है।
ज्ञान हो गया, इसका मतलब यह नहीं कि हम ढीले पड़ जाएं।
बड़े-बड़े ब्रह्मबोध संपन्न महापुरुष भी निरंतर ध्यान में रत रहते हैं।

क्यों?
क्योंकि अंतःकरण की शुद्धि और स्थिरता बनाए रखना आवश्यक है।

महाराज जी कहते हैं —
असंग रहो।
अकेले रहो।
समता में स्थित रहो।

मन संतुष्ट है तो ठीक।
असंतुष्ट है तो भी ठीक।
आप तो साक्षी हैं।

बंधन कभी था ही नहीं। केवल भ्रम है।
और वह भ्रम नाम-जप और भगवान की कृपा से मिटता है।

इसलिए भले ही आत्म अनुभव हो,
नाम-जप कभी न छोड़ो।
असंगता बनाए रखो।
मन की हर लहर को स्वप्न समझो।

धीरे-धीरे सब शांत हो जाएगा।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

यह भी पढ़ें : माला-1188:“जिसमें तेरी रज़ा है उसी में राज़ी” यह भाव स्थायी कैसे बने? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

Leave a Reply